भारतीय कृषि को करना होगा अमेरिकी टैरिफ का मुकाबला

हिमाचल की राजधानी शिमला से 100 किलोमीटर दूर रोहड़ू के सेब बागानों में फूल खिलने लगे हैं, लेकिन बागान मालिकों के चेहरे मुरझाए हैं। उनका ध्यान फूल खिलने नहीं, टैरिफ को लेकर चल रही भारत-अमेरिका की बातचीत पर है। खबर कि भारत जवाबी टैरिफ की परेशानियों के बचने के लिए अमेरिकी उत्पादों पर लगने वाला आयात शुल्क कम करने को तैयार हो रहा है, जो यहां के किसानों और बागवानों की नींद हराम किए हुए है। 

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टैरिफ को लेकर उनके अनुभव अच्छे नहीं हैं। 2023 में सरकार ने सेब पर लगने वाला आयात शुल्क 70 से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। नतीजतन वाशिंग्टन एप्पल का आयात बीस गुना बढ़ गया। दूसरी तरफ गैर-प्रीमियम सेब के बाजार के बड़े हिस्से पर ईरान और तुर्की के सेब का कब्जा हो गया। प्रोग्रेसिव ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लोकिंदर सिंह बिष्ट कहते हैं कि प्रीमियम सेब के मामले में हम वाशिंग्टन एप्पल से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। वहां फैक्ट्री स्तर पर खेती है। उनके उत्पाद एक जैसी गुणवत्ता के होते हैं। सेब  बागवानी की लागत कुछ साल में तेजी से बढ़ी है। आयात शुल्क कम होता है, तो यह काम गुजारे लायक भी नहीं रहेगा।

टैरिफ को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की जिद जारी रहती है, तो दो अप्रैल के बाद सेब समेत भारत के बहुत से बाजार डिस्रप्ट हो सकते हैं। अगर अमेरिका रेसीप्रोकल टैरिफ की नीति को अपनाते हुए भारतीय उत्पादों पर ज्यादा शुल्क लगाता है तो निर्यात में भारी कमी आ सकती है। दूसरी तरफ अगर भारत अमेरिका से आयात पर टैरिफ कम कर देता है, तो भारतीय बाजार में बहुत से अमेरिकी उत्पादों की बाढ़ आ सकती है। 

ज्यादा समस्या कृषि उत्पादों को लेकर आ सकती है। भारत से अमेरिका को होने वाला कुल निर्यात 120 अरब डाॅलर से ज्यादा है। इसके सबसे बड़े मद हीरे-जवाहारात, बल्क ड्रग्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, टैक्सटाइल और रेडीमेड कपड़े हैं। पूरे निर्यात में कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी 48 अरब डाॅलर है। जबकि भारत में अमेरिका से होने वाला कृषि उत्पादों का आयात दो अरब डाॅलर से भी कम ही है। वह भी तब जब पिछले कुछ समय में भारत ने सेब, क्राॅयनबेरी, ब्लूबेरी, टर्की जैसे बहुत से कृषि उत्पादों पर टैरिफ की दर काफी कम कर दी है। दो अप्रैल से कृषि उत्पादों के आयात और निर्यात का यह समीकरण काफी बदल सकता है।

भारत कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करे, इसके लिए अमेरिका की निर्यात लाॅबी दबाव बनाती रही है। कुछ ही समय पहले अमेरिकी कृषि उत्पादकों के कईं संगठनों ने यूएस ट्रेड रिप्रजेंटेटिव को लिखा था कि भारत पर टैरिफ में भारी कटौती करने का दबाव बनाया जाए। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह लाॅबी और भी सक्रिय हो गई है। 

ट्रंप लगातार कह रहे हैं कि भारत अमेरिकी सामानों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाता है। हालांकि ऐसा सिर्फ गिने-चुने उत्पादों पर ही है। कृषि उत्पादों पर भारत औसतन 39 प्रतिशत आयात शुल्क लगा रहा है जो अलग-अलग उत्पादों पर भिन्न-भिन्न है। जैसे सेब पर 50 और डेयरी उत्पादों पर 60 प्रतिशत।

इस बीच भारत में भी निर्यात करने वाले संगठन सक्रिय हो गए हैं। वे ऐसा बीच का रास्ता निकालने पर जो दे रहे हैं जिससे उनके कारोबार पर असर न पड़े। फरवरी के चौथे हफ्ते में वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल इनवेस्ट केरला ग्लोबल समिट में भाग लेने कोच्चि गए तो वहां झींगा निर्यातकों ने उनसे मुलाकात करके आग्रह किया कि झींगा आयात पर लगने वाला 30 प्रतिशत आयात शुल्क भारत खत्म कर दे। अभी तक भारत से निर्यात होने वाले झींगा पर अमेरिका 5.77 प्रतिशत काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाता है। 

भारत से 2023-24 में कुल 7,16,004 मीट्रिक टन झींगा का निर्यात हुआ था। इनमें सबसे बड़ा ग्राहक अमेरिका था जहां 2,97,571 मीट्रिक टन झींगा भेजा गया। अमेरिकी बाजार में भारत के ब्लैक टाईगर श्रिंप की काफी मांग है जो लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ अमेरिका से या दुनिया के किसी भी और बाजार से भारत में श्रिंप का आयात लगभग न के बराबर ही होता है। 

यही हाल भारत से निर्यात होने वाले कई दूसरे कृषि उत्पादों का भी है। काजू, मसाले, आम, चाय जैसे ये ज्यादातर उत्पाद कीमत के मामले में अन्य देशों के स्पर्धा करते हैं। उन्हें अमेरिका में अच्छा बाजार इसी वजह से मिल पाता है क्योंकि अमेरिकी उपभोक्ताओं को वे काफी सस्ते पड़ते हैं। वे ऐसे कृषि उत्पाद नहीं हैं जिनके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे विकल्प मौजूद नहीं हैं। 

जहां अमेरिका के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं, वहां भी टैरिफ का मामला समस्या खड़ी कर सकता है। चावल के निर्यात को ही लें। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। बासमती या दूसरे एरोमेटिक चावल के मामले में अमेरिकी बाजार के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। इसके बावजूद भारत ने चावल पर 70 प्रति आयात शुल्क का प्रावधान रखा है। अगर अमेरिका भी इतना ही टैरिफ लगा देता है, तो दाम बढ़ जाने से उसकी मांग में कमी आएगी ही। 

दूसरी तरफ भारत रेसीप्रोकल टैरिफ से बचने के लिए आयात शुल्क को कम करता है, तो बड़ी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। मसलन अखरोट। अभी भी अमेरिका से अखरोट का बड़े पैमाने पर आयात होता है। अगर इस पर आयात शुल्क में भारी कटौती की जाती है, तो आयातित सस्ते अखरोट भारतीय उत्पादकों के लिए समस्या खड़ी कर देंगे।

आयात शुल्क कम करने से बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी और भाारतीय किसानों की उपज की खरीद कम हो जाएगी। किसानों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

सबसे बड़ा खतरा यही है कि अमेरिका के बहुत बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले सस्ते कृषि उत्पाद कईं भारतीय बाजारों को ध्वस्त कर सकते हैं। भारत में ज्यादातर कृषि छोटी जोत में होती है, यहां कृषि को अमेरिका की तरह इकाॅनमी ऑफ स्केल का कोई फायदा नहीं मिलता। सस्ते होने के कारण अगर भारतीय बाजारों में अमेरिकी कृषि उत्पादों की बाढ़ आती है, तो यह हमारी उस कृषि व्यवस्था के लिए नई मुसीबत होगी जो पहले ही कई दबावों में है। अध्यन बताते हैं कि भारत में किसानी घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में यह घाटा बढ़ सकता है।

एक दबाव कपास के आयात शुल्क को कम करने पर भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक और निर्यातक देश है। आयात शुल्क कम होता है, तो अमेरिकी कपास भारतीय बाजार को डिसरप्ट कर सकता है। भारतीय कपास उत्पादकों पर दबाव को इसी से समझा जा सकता है कि कुछ सालों में पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र किसानों की आत्महत्याओं की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं उनमें सबसे ज्यादा कपास की खेती करने वाले ही थे।

भारत और अमेरिका में कृषि उत्पादों की कीमतों में अंतर का एक कारण अमेरिकी किसानों को बड़ी मात्रा में दी जाने वाली सब्सिडी भी है। रूरल वाॅयस के हरवीर सिंह ने यूएस गवर्नमेंट एकाउंटिबिलटी ऑफिस के आंकड़ों के आधार पर यह गणना की है कि एक औसत अमेरिकी किसान को हर साल औसतन 30,782 डाॅलर यानी लगभग 26.78 लाख रुपये की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत में किसान सम्मान निधि के नाम पर महज छह हजार रुपये साल के ही मिलते हैं। 

मनमोहन सिंह सरकार के समय जब कमलनाथ वाणिज्य मंत्री थे, टैरिफ पर उन्होंने कहा था, “अमेरिकी किसानों से स्पर्धा करने में हमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन हम अमेरिकी सरकार की वित्तीय ताकत से स्पर्धा नहीं कर सकते।” 

ट्रंप सब्सिडी के बारे में चुप हैं। अगर आयात शुल्क कम करके भारतीय बाजार को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोला जाता है, तो अमेरिका की इस सब्सिडी का भुगतान भारतीय उपभोक्ताओं और किसानों की जेब से ही होगा। अभी तक भारत और अमेरिका का व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में झुका है। भारत निर्यात ज्यादा करता है, आयात कम। दो अप्रैल के बाद यह समीकरण भी बदल सकता है।

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