नई दिल्ली। कोहिनूर को लेकर समय समय पर भारत में इसे वापस लाने के लिए आवाजें उठती रहीं है। केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद इसे वापस लाने की कोशिशें की जा रहीं हैं लेकिन अब तक इसमें सफलता नहीं मिल पायी है। दुनियाभर में मशहूर कोहिनूर हीरा न तो ईस्ट इंडिया कंपनी को तोहफे में दिया गया था और न ही चोरी हुआ था। बल्कि लाहौर के महाराजा दलीप सिंह को हीरा दबाव में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के सामने सरेंडर करना पड़ना था। यह खुलासा एक आरटीआई के जवाब में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने किया है। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, एएसआई ने जवाब के लिए लाहौर संधि का जिक्र किया। इसमें बताया गया कि 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी के लॉर्ड डलहौजी और महाराजा दलीप सिंह के बीच संधि हुई थी। इसमें महाराजा से कोहिनूर सरेंडर करने के लिए कहा गया था।
केन्द्र सरकार के दावों से उलट बयान देते हुए एएसआई ने साफ किया है कि संधि के दौरान दलीप सिंह (जो कि उस वक्त सिर्फ नौ साल के थे) ने अपनी मर्जी से महारानी को हीरा भेंट नहीं किया था, बल्कि उनसे कोहिनूर जबरन लिया गया था। 2016 में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कोहिनूर हीरा न तो अंग्रेजों ने जबरदस्ती लिया था और न ही यह चोरी हुआ था। सरकार ने कहा था कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी ने एंग्लो-सिख युद्ध के खर्च के बदले ‘स्वैच्छिक मुआवजे’ के रूप में अंग्रेजों को कोहिनूर भेंट किया था।
उल्लेखनीय है कि कोहिनूर पर जानकारी के लिए कार्यकर्ता रोहित सभरवाल ने आरटीआई डाली थी। उन्होंने इसका जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से मांगा था। आरटीआई में पूछा था कि आखिर किस आधार पर कोहिनूर ब्रिटेन को दिया गया। पीएमओ ने उनकी अपील भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भेज दी। आरटीआई एक्ट के मुताबिक, एक लोक प्राधिकरण जानकारी के लिए आरटीआई को दूसरे प्राधिकरण के पास ट्रांसफर कर सकता है। भारत में कई संगठन कोहिनूर को भारत की सम्पत्ति बताते हुए इसे वापस लाने के लिए केन्द्र सरकार को ब्रिटेन सरकार से बात करने का दबाव डाल रहे है।