पणजी। गोवा कांग्रेस के 11 में से 8 विधायकों ने बुधवार को पार्टी छोड़ दी। सभी विधायक मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के साथ विधानसभा पहुंचे और स्पीकर रमेश तावड़कर को अलग होने का पत्र सौंपा। गोवा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सदानंद तनवड़े ने सभी विधायकों को भाजपा की सदस्यता दिलाई।
कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों में पूर्व CM दिगंबर कामत, माइकल लोबो, देलिया लोबो, केदार नाइक, राजेश फलदेसाई, एलेक्सो स्काइरिया, संकल्प अमोलकर और रोडोल्फो फर्नांनडिज का नाम शामिल है। बागी विधायकों की संख्या 2 तिहाई से ज्यादा होने की वजह से इन विधायकों पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा।
3 गलती और 7 महीने में टूट गई कांग्रेस
10 मार्च 2022 को गोवा का चुनाव परिणाम आया, जिसमें कांग्रेस को 40 में से 11 सीटें मिली, लेकिन 7 महीने के भीतर ही पार्टी टूट गई। इसके पीछे की वजह कांग्रेस की 3 बड़ी गलतियां है।
1. बाहर से आए लोबो का कद बढ़ाना- चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने बाहर से आने वाले माइकल लोबो को नेता प्रतिपक्ष बनाया। लोबो चुनाव से पहले ही पार्टी में शामिल हुए थे। नेता प्रतिपक्ष की रेस में शामिल दिगंबर कामत कांग्रेस हाईकमान के इस फैसले के खिलाफ हो गए थे। इसके बाद से ही माना जा रहा था कि कांग्रेस में टूट होगी।
2. अध्यक्ष पर एक्शन, प्रभारी पर कार्रवाई नहीं- गोवा में हार के बाद कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष गिरीश चोडनकर से इस्तीफा ले लिया, लेकिन प्रदेश प्रभारी दिनेश गुंडूराव पर कोई कार्रवाई नहीं की। गुंडूराव से पार्टी के कई सीनियर चुनाव से पहले से नाराज चल रहे थे। इसी वजह से पार्टी ने पी चिदंबरम को कांग्रेस का ऑब्जर्वर बनाकर भेजा था।
3. नए अध्यक्ष पर गुटबाजी हुई तो कदम नहीं उठाया- नए अध्यक्ष अमित पाटकर को लेकर भी पार्टी में गुटबाजी तेज हो गई, जिसका असर राष्ट्रपति चुनाव में दिखा। पार्टी के करीब 4 विधायकों ने उस वक्त क्रॉस वोटिंग की थी। कांग्रेस ने इस पर भी डैमेज कंट्रोल का कदम नहीं उठाया।
कामत और लोबो पर कांग्रेस ने की थी कार्रवाई
इसी साल जुलाई में कांग्रेस ने पार्टी विरोधी साजिश में शामिल होने का आरोप लगाकर दिगंबर कामत और माइकल लोबो पर कार्रवाई की थी। उस वक्त कांग्रेस टूट से बचने के लिए अपने 5 विधायकों को चेन्नई शिफ्ट कर दिया था।
जुलाई में भी की थी कोशिश, पर फेल हो गया था प्लान
इससे पहले जुलाई में भी कांग्रेस के कुछ विधायकों ने दलबदल की कोशिश की थी, लेकिन उनके ग्रुप में ही मतभेद होने के चलते प्लान फेल हो गया था। हालांकि उसके कुछ सप्ताह बाद से ही माइकल लोबो और दिगंबर कामत एक बार फिर से विधायकों को अपने साथ लाने की कोशिश में जुट गए थे।
हाल ही में माइकल लोबो दिल्ली आए थे और गोवा पहुंचने पर कहा था कि वह महंगाई के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शन में हिस्सा लेने गए थे। हालांकि उन्हें दिल्ली में कांग्रेस के प्रोटेस्ट के दौरान नहीं देखा गया था। इसके अलावा कामत को लेकर भी जानकारी सामने आई थी कि वह दिल्ली गए थे।
कामत और लोबो पर पहले से ही कांग्रेस को था शक
बता दें कि कांग्रेस पहले ही कामत और लोबो पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए स्पीकर से उन्हें अयोग्य ठहराने की मांग कर चुकी है। कांग्रेस की याचिका फिलहाल स्पीकर के समक्ष लंबित है। बता दें कि 40 सदस्यीय गोवा विधानसभा में भाजपा के 20 विधायक हैं, जो बहुमत से एक कम है।
ऐसे में पार्टी को लगता है कि कांग्रेस के विधायकों को साथ लेकर वह अपनी सरकार को मजबूती दे सकती है। भाजपा को अभी 3 निर्दलीय और 5 महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के विधायकों का भी समर्थन हासिल है। कांग्रेस के कुल 11 विधायक चुने गए थे, जिनमें से 8 विधायक यदि टूटते हैं तो फिर दलबदल कानून भी लागू नहीं होगा क्योंकि टूटने वालों की संख्या दो तिहाई से ज्यादा है।
गोवा में लंबा है दलबदल का इतिहास, 12 साल में देखे थे 13 सीएम
बता दें कि गोवा में दलबल का एक लंबा इतिहास रहा है। 1989 से 2000 के दौरान महज 12 सालों में ही राज्य में 13 मुख्यमंत्री रहे हैं। दलबदल के चलते लगातार गोवा ने सरकारों के आने और जाने का दौर देखा था। यही नहीं पिछले विधानसभा कार्यकाल में कांग्रेस के 10 विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके अलावा राज्य के 27 ऐसे विधायक थे, जो 2022 के चुनाव आते तक उस दल में नहीं रहे, जिससे उन्होंने 2017 में जीत हासिल की थी।