उन्नाव। जहां एक तरफ भाजपा सरकार बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ मुहिम चला रही है वहीं दूसरी तरफ उन्नाव में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये अल्ट्रासाउंड सेन्टर चंद पैसों के लालच में देवी जैसी कन्याओं की बलि लेने से गुरेज नहीं कर रहे है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए बनाये गये कानून की धज्जियाॅं शहर के अल्ट्रासाउन्ड सेन्टरों के मालिकों द्वारा धड़ल्ले से उड़ाई जा रही हैं। केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये कानून को स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी खाउू-कमाउू नीति के चलते इन अल्ट्रासाउन्ड सेन्टरों को नजरन्दाज कर रहे हैं, जिसका मुख्य कारण यह है कि सेन्टर मालिकों द्वारा तय रकम निर्धारित तिथि पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों तक पहुॅच जाती है।
उल्लेखनीय हो कि शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे अल्ट्रासाउन्ड सेन्टर चल रहे हैं, जिनमें भ्र्र्रूण जाॅचकर उनकी हत्या करने का सिलसिला बेधड़क जारी है। ऐसा नहीं है कि विभागीय अधिकारी इन सेन्टरों को नहीं जानते, लेकिन वह अंजान बने हुए हैं। इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय कार्यक्रमों में जन प्रतिनिधियों एवं विभागीय अधिकारियों तथा जिला प्रशासन के उच्च अधिकारियों को भाषण देते तो सुना गया, लेकिन उसका सही तरीके से पालन करवाने या उनको सच कर दिखाने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाये गये? धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं के चलते पुत्र की लालसा में लोग कन्या भ्र्रूण हत्या करने में कतई गुरेज नहीं कर रहे, जो खुलेआम गैर कानूनी ढंग से चल रहा है।
यह अपराध अब अधिक लाभ कमाने वाले व्यवसाय में तब्दील हो गया है। चिकित्सक भी इन्सानियत को ताक पर रख सिर्फ पैसा कमाने में डटे हुए हैं। डाॅक्टर उपाधि पाने के बाद लिये गये शपथ को चिकित्सक भूल कर निजी नर्सिंग होम खोल बैठे हैं और दोनों हाथों से रूपये बटोरने का काम कर रहे हैं। इस गैर कानूनी धन्धे में शासकीय अस्पतालों, निजी नर्सिंग होमों व झोलाछाप डाॅक्टर भी पूरी तरह से लिप्त हैं। जिम्मेदारी का बोझ लेने वाले विभाग के कुछ अधिकारियों के इस गोरख धन्धे में शामिल होने के कारण इस जघन्य अपराध पर अंकुश नहीं लगाया जा पा रहा है।
डाॅक्टरी कोर्स करने के बाद फिजीशियन एवं सर्जन अपने निजी नर्सिंग होम खोलकर गरीब जनता को लूटने में इस तरह मशगूल हो जाते हैं, जैसे उन्हें कुछ भी दिखाई हीं नहीं पड़ता। गैर कानूनी कारोबार को रोकने के लिए स्वैच्छिक एवं समाज सेवी संगठनों द्वारा विरोध किया गया, लेकिन उनकी एक न चली। सोनोग्राफी कर जनम पूर्व गर्भस्थ शिशु के लिंग की पहचान कर इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दिया जा रहा है। अनाधिकृत तरीके से हो रहे परीक्षणों एवं गर्भपातों पर प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग असहाय बना है, जिसके चलते पुरूषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या दिन-ब-बदन घटती जा रही है।
इन सबके दोषी अल्ट्रासाउन्ड सेन्टर ही हैं। गर्भस्थ शिशु के लिंग का परीक्षण करने एवं भ्रूण हत्या की संज्ञेय अपराध की श्रेणी देने वाली सरकारें पूरी तरह बेमानी साबित हो रही हैं। भ्रूण हत्या निरोधी कानून के तहत दोषी चिकित्सकों को तीन से पाॅच वर्ष का कारावास एवं पचास हजार से एक लाख तक का जुर्माना दिये जाने का प्रावधान है, लेकिन बदकिस्मती यह है कि सब कुछ मात्र कागजों पर ही सिमट कर रह गया है। वैसे तो अल्ट्रासाउन्ड सेन्टरों के मालिकों द्वारा अपने साइन बोर्ड में खुलेतौर पर लिख दिया जात है कि भ्रूण परीक्षण नहीं होता है, लेकिन इसका पूरा उल्टा ही शहर में चल रहा है। सेन्टर मालिक चोरी छिपे लिंग परीक्षण कर भ्रूण हत्या जैसी जघन्य हत्यायें कर रहे हैं, इसमें चिकित्सकों का भी कमीशन बंधा होता है, जो अपने नाम से मरीजों को सेन्टरों में भेजते हैं।