लेखक अजित वर्मा
भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच मुद्दों पर राजनैतिक तकरार और टकराव हो, यह स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन इस टकराव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच युद्ध जैसी स्थिति बना रखी है, उसे किसी भी तरह देश के लोकतंत्र और देश के संविधान की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। केन्द्र सरकार एक चुनी हुई राज्य सरकार के विरुद्ध इस तरह युद्ध नहीं छेड़ सकती। युद्ध की यह स्थिति यहां तक पहुँच गई है कि अधिकारों को लेकर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच चल रहे विवाद में केन्द्र सरकार अब देश के तीन बड़े वकील उपराज्यपाल अनिल बैजल और केन्द्र सरकार का बचाव करने के लिए झोंक रही है। दोनों की जंग में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई होनी है। इसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन जारी कर इन तीनों वकीलों को रखने को कहा है। इस बहस में ट्रांसफर-पोस्टिंग का मुद्दा भी उठेगा।
दरअसल, दिल्ली की केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल में पिछले काफी समय से अधिकारों और क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद चलता आ रहा है। इस विवाद के कारण मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उपराज्यपाल आवास में धरना देना पड़ा और पीएमओ तक रैली भी निकालना पड़ी है। लेकिन, मामला अभी तक सुलझा नहीं है। यह मामला अब हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इसमें पहले राउंड की बहस हो चुकी है । इसको देखते हुए केन्द्र सरकार ने उपराज्यपाल की मदद करने के लिए देश के तीन नामी वकीलों हरीश साल्वे, सीए सुन्दरम और राकेश द्विवेदी को अपनी पैरवी करने के लिए नियुक्त करने का निर्देश दिया है। ये वकील दूसरे राउंड की बहस उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार की ओर से करेंगे और उनका पक्ष रखेंगे।
इससे पहले चार जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा था कि उपराज्यपाल स्वतंत्र तौर पर कोई भी निर्णय नहीं ले सकते और वो मंत्री परिषद की मदद और सलाह के लिए बाध्य हैं। वो हर छोटी-छोटी बात पर विरोध नहीं जता सकते और बड़े मसले पर मतभेद होने पर मामले को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे।
पीठ ने ये भी साफ किया था कि जमीन, पुलिस और पब्लिक ऑर्डर को छोड़कर दिल्ली सरकार अन्य विषयों पर कानून बना सकती है। इसमें एलजी की सहमति जरूरी नहीं है। सिर्फ उन्हें सूचित किया जाना काफी है। पीठ ने कहा था कि एलजी राज्यपाल नहीं हैं और ना ही दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया जा सकता है। हम कहना चाहते हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिये जाने पर चल रही बहस अपनी जगह है और उपराज्यपाल और दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधिकारों की सीमा तय होना अपनी जगह। लेकिन केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच चल रही भोंड़ी जंग अशोभनीय और निन्दनीय है। हमारे लोकतंत्र में मोदी सरकार यह कैसी नजीर पेश कर रही है? क्या होगा इसका हश्र?
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