कोरोना संकट के समय राजनीति कर रहीं है बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ?

कोलकाता। जहां देश इन दिनों कोरोना संकट से जंग में लगा है वहीं कई राज्य सरकारें अपनी राजनीति जक नफा नुकसान देखके काम कर रहीं है। इन दिनों लगातार पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस के आंकड़ों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। ममता बनर्जी सरकार पर आरोप है कि वह कोरोना संक्रमितों या इससे मरने वालों के आंकड़े छिपा रही है?

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विपक्षी राजनीतिक दलों और प्रदेश के राज्यपाल जगदीप धनखड़ की मानें तो ममता सरकार ऐसा कर रही है। हालांकि इन आरोपों को सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस ने सिरे से नकार दिया है।

पश्चिम बंगाल में कोरोना के आंकड़ों की हकीकत चाहे जो हो, राज्य सरकार की गतिविधियों ने संदेह को बल ही दिया है।

यहां कोरोना संक्रमितों और इससे होने वाली मौतों पर आंकड़ों के कथित हेरफेर को इस साल होने वाले नगर निगम चुनावों और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से भी जोड़ा जा रहा है।

पहले तो उसने कोरोना से होने वाली मौतों की पुष्टि के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया और उसके आधार पर अप्रैल के पहले सप्ताह में मौतों की तादाद उस समय के सात से घटा कर तीन कर दी।

इन सबके बाद भी अब तक 72 ऐसी मौतें हुई हैं जो कोरोना वायरस से संक्रमित तो थे लेकिन सरकार का दावा है कि वो लोग दूसरी गंभीर बीमारियों की वजह से मरे हैं।

इन सबको लेकर केंद्र सरकार और ममता सरकार के बीच वाकयुद्ध और तेज हो गया है। 6 अप्रैल को केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने पत्र लिखकर राज्य सरकार को कोरोना से निपटने के लिए व्यापक इंतजाम नहीं करने और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को सही तरीके से लागू नहीं करने पर फटकार लगाई है। 

केंद्रीय गृह सचिव ने पत्र लिखकर कहा है कि राज्य सरकार ने कोविड-19 की रोकथाम के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया ताकि कोलकाता एवं हावड़ा के “विशिष्ट इलाकों में विशिष्ट समूहों” को प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के साथ-साथ पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने की अनुमति मिल सके।

विशेषज्ञ समिति के गठन पर विवाद

ममता सरकार द्वारा गठित किए गए विशेषज्ञ समिति पर लगातार सवाल उठने और सरकार को कठघरे में खड़े करने के बाद अब उसके अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। अब कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों की पुष्टि के लिए उसकी मुहर की जरूरत नहीं है।

इसके साथ ही सरकार ने माना है कि निजी अस्पतालों से समय पर तमाम तथ्य नहीं मिलने की वजह से आंकड़ों में अंतर आ रहा था। अब इसे सुधार लिया गया है। बावजूद इसके सरकार कोरोना से मरने वालों में उन 72 लोगों को शामिल नहीं करने पर अड़ी है जिनकी मौत कथित रूप से दूसरी बीमारियों के चलते हुई है।

कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों पर विवाद बढऩे के साथ राज्य सरकार ने मार्च के आखिर में ही ऐसी मौतों की पुष्टि के लिए एक पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने मृतकों का आंकड़ा सात से घटा कर तीन कर दिया था।

उस समय मुख्य सचिव राजीव सिन्हा ने कहा था, “बाकी चार मरीजों की मौत दूसरी बीमारियों की वजह से हुई है।”
से, इस समिति पर शुरुआत से ही विवाद पैदा हो गया था। विपक्षी दलों का आरोप था कि सरकार ने कोरोना से होने वाली मौतों पर पर्दा डालने के लिए ही इसका गठन किया है।

राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी अपने पत्रों और ट्वीट्स में सरकार पर मौतों का आंकड़ा छिपाने का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीति से प्रेरित आरोप बताती रही है।

सरकार के तर्क से विपक्ष भी संतुष्ट नहीं है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए ही कोरोना के आंकड़ों में पारदर्शिता नहीं बरत रही है।

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष आरोप लगाते हैं, “सरकार कोरोना से संबंधित तथ्य छिपा रही है। शायद उसकी निगाहें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर है। ”

घोष ने इस बारे में कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की है। इसमें विशेषज्ञ समिति के गठन पर भी सवाल उठाया गया है।

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