वॉशिंगटन। कुछ समय पहले अर्थशास्त्री मानते थे कि कोविड-19 महामारी से अमीर देशों में लंबी आर्थिक मंदी आएगी। लेकिन, स्थिति उलटी है। फरवरी में अमेरिकी संसद के बजट ऑफिस ने 2021 में अमेरिका में 3.7% विकास दर की भविष्यवाणी की थी। 1 जुलाई को इसे बढ़ाकर 7.4% कर दिया गया। मई के बाद बैंक ऑफ इंग्लैंड ने अपने अनुमान में संशोधन कर दूसरी तिमाही में ब्रिटेन के जीडीपी में डेढ़ प्रतिशत की बढ़त बताई है।
आर्थिक विकास में उफान के हिसाब से महंगाई भी बढ़ी है। फरवरी में अमेरिका में कंज्यूमर मूल्यों में केवल 1.9% बढ़ोतरी की संभावना जताई गई थी। लेकिन, महंगाई 8.3% हो गई है। यह 1980 के बाद सबसे अधिक है।
अन्य अमीर देशों में महंगाई की दर मध्यम है। लेकिन यह संभावनाओं से अधिक है। यूरोपियन यूनियन में मई के बाद महंगाई 1.9% बढ़ गई। यह केवल अमीर देशों की स्थिति नहीं है। उभरते देशों में महंगाई अप्रैल में 3.9% से बढ़कर मई में 4.5 % हो गई।
महंगाई बढ़ने के कई कारण हैं। पहला- कार, फर्नीचर, घरेलू साज-सामान की मांग में उछाल आया है। कंज्यूमर उन चीजों पर अधिक खर्च कर रहे हैं जिनसे लॉकडाउन के बीच घर अधिक सुविधाजनक बने। दूसरा- इन कुछ वस्तुओं की ग्लोबल सप्लाई में दिक्कत पैदा हुई है। उदाहरण के लिए माइक्रोचिप्स की कमी से कारों की सप्लाई घटी है।
तेल के मूल्यों में बढ़ोतरी से समस्या आई है। तीसरा-सर्विस इंडस्ट्री में कामगारों की कमी हो गई है। महामारी के बाद लोग रेस्तरां, बार, हेयरसैलून और अन्य स्थानों में लौटे हैं लेकिन अमेरिका सहित कई अमीर देशों में कामगारों उतनी तेजी से नहीं लौटे हैं।
अमेरिका में सरकार का सहायता पैकेज सबसे अधिक होने के कारण भी मुद्रास्फीति अधिक है। मई में मूल्य वृद्धि में कार, फर्नीचर, खेल के सामान सहित कई चीजों की हिस्सेदारी 20% रही। यूरोप में कार, फर्नीचर जैसे ड्यूरेबल गुड्स के मूल्य केवल 1.5% बढ़े हैं। उधर जिन देशों में कम वैक्सीनेशन होगा वहां आर्थिक विकास की गति अमीर देशों के मुकाबले धीमी होगी।
महंगाई का खुशी पर असर
लगातार महंगाई बढ़ना नुकसानदेह है। 1970 और 1980 में जीवन संतुष्टि सर्वे में पाया गया कि महंगाई में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी से औसत प्रसन्नता औसतन घट गई और बेरोजगारी में 0.6 प्रतिशत वृद्धि हुई। कम वेतन पाने वालों को सबसे अधिक नुकसान होता है। अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर असर पड़ता है।