दक्षिण भारत की राजनीति के लिए अहम है भाजपा की यह जीत

हैदराबाद। निगम चुनाव में जब भाजपा के दिग्गज नेता चुनाव का प्रचार कर रहे थे तो एक ही सवाल चारों ओर से गूंज रहा था कि आखिर इस छोटे से चुनाव को लेकर भाजपा इतनी फिक्रमंद क्यों है? चुनाव में दिग्गज भाजपा नेताओं की फौज को देखकर जितना हैरान आम लोग हुए थे उतना ही अवाक राजनैतिक पंडित भी हुए थे। एक छोटे से चुनाव में बीजेपी ने अपना पूरा दमखम लगा दिया था। इस पर भी सवाल उठ रहा था कि एक छोटे से चुनाव में बीजेपी इतना बड़ा निवेश क्यों कर रही है।

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अब जब परिणाम सामने आ गया है तो बीजेपी के इस निवेश का मतलब भी विपक्षी दलों को आ गया है। भाजपा ने जीएचएमसी चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन कर सभी को ना सिर्फ चौंका दिया है, बल्कि मेयर की गणित भी बिगाड़ दी है।

बीजेपी के वरिष्ठ  नेताओं के चुनाव प्रचार पर तंज कसने वाले ओवैसी और चंद्रशेखर को नुकसान हुआ है। 150 सीटों वाले इस चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। हालत यह है कि मेयर बनाने के लिए किसी दो पार्टी को साथ आना ही होगा।

फिलहाल ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में बड़ी सफलता हासिल कर भाजपा ने दक्षिण भारत में अपने लिए एक और रास्ता खोल लिया है। इस चुनाव के जरिए बीजेपी ने न सिर्फ एआईएमआईएम और टीआरएस के गढ़ में अपनी ताकत बढ़ाई है बल्कि इससे उसे आंध्र प्रदेश में भी लाभ मिलने की उम्मीद दिख रही है।

हैदराबाद के स्थानीय निकाय के चुनाव का ज्यादा महत्व इसलिए भी है कि यहां पर भाजपा की सफलता से दक्षिण भारत के लोगों में एक बड़ा संदेश जाएगा। भाजपा हैदराबाद से तेलंगाना की राजनीति तो करेगी ही, साथ ही वह यहां से आंध्र प्रदेश में भी आगे बढऩे की कोशिश करेगी।

कहने को तो यह एक बड़े स्थानीय निकाय के चुनाव हैं, लेकिन इसका महत्व बीजेपी की दक्षिण भारत की राजनीति के लिए बेहद अहम है। इसीलिए इस चुनाव में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यहां पर प्रचार का मोर्चा संभाला था।

बीजेपी की एक सबसे बड़ी खूबी है कि वह किसी चुनाव को हल्के में नहीं लेती। दरअसल बीजेपी निकाय चुनावों को राज्य की सत्ता हथियाने का जरिया समझती है। बीजेपी का यह प्रयोग अब तक कई राज्यों में सफल रहा है।

बीजेपी ने हैदराबाद का निकाय चुनाव 2018 में हुए हरियाणा के निकाय चुनाव के तर्ज पर लड़ा। वर्ष 2018 के हरियाणा निकाय चुनाव में बीजेपी ने पूरा दम लगाकर करनाल, पानीपत, यमुनानगर, रोहतक और हिसार के पांच नगर निगमों पर कब्जा कर लिया था। इससे बीजेपी को दो फायदा हुआ था, पहला राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव में सत्ता गंवाने वाली भाजपा के कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और दूसरा भाजपा को इसका फायदा वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में मिला।

हैदराबाद के निकाय चुनाव में भी बीजेपी ने यही प्रयोग किया। भाजपा के स्टार प्रचारकों के चुनाव प्रचार करने की वजह से बीजेपी चर्चा में आ गई। बड़े नेताओं की मौजूदगी की वजह से लोगों ने बीजेपी को हल्के में नहीं लिया और परिणाम सबके सामने हैं।

चुनाव परिणाम के हिसाब से ध्रुवीकरण की राजनीति में एआईएमआईएम ने तो अपना प्रदर्शन लगभग बरकरार रखा है, लेकिन टीआरएस को बड़ा झटका लगा है। बीजेपी ने उसके प्रभाव क्षेत्र में बड़ी सेंध लगाकर 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए टीआरएस को बड़ी चुनौती पेश की है।

दो साल पहले तक तेलंगाना में बीजेपी किस स्थिति में थी इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। राज्य में हुए 2018 के विधानसभा चुनाव में उसके सिर्फ दो विधायक चुने गए थे। राज्य की 117 सीटों में से 100 सीटों में भाजपा ने अपनी जमानत गंवाई थी, लेकिन  दो साल के भीतर बीजेपी ने अपनी मेहनत से टीआरएस की प्रमुख प्रतिद्वंदी बन गई।

कुछ दिन पहले हुए एक विधानसभा उपचुनाव में भी भाजपा ने टीआरएस को मात देकर उससे सीट छीनी थी। इसके पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के चार सांसद यहां से चुने गए थे।

पिछले कुछ समय से भाजपा की रडार पर दक्षिण के राज्य है। कर्नाटक की सत्ता में कई बार काबिज होने के बाद भी भाजपा अन्य राज्यों में अपना जनाधार मजबूत नहीं कर पा रही है, लेकिन हैदराबाद की जीत ने भाजपा के कई रास्ता खोल दिया है।

हैदराबाद से भाजपा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की राजनीति में आगे बढऩे की कोशिश तो करेगी ही साथ ही वह यहां से तमिलनाडु और केरल को भी साधने की कोशिश करेगी।

दरअसल भाजपा के लिए दक्षिण भारत में अपनी मजबूत पहचान और विश्वसनीयता को कायम करना है ताकि क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व वाले इन राज्यों में वह पैठ बना सके।

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