पुण्यतिथि: गायकी के खिलाफ हुए पिता तो तोड़ लिया परिवार से रिश्ता

तलत महमूद उन गायकों में से हैं जिनके गाने सुनकर किशोर कुमार ने कहा था कि मुझे लगता है मुझे गायकी छोड़ देनी चाहिए। 15 साल की उम्र में सिंगिंग के लिए घर और परिवार को छोड़ देने वाले तलत काफी चुलबुले किस्म के भी थे। जब नौशाद को गाने से पहले किसी का सिगरेट पीना पसंद नहीं था, तब तलत ने सिगरेट पीकर उन्हीं के मुंह पर धुआं छोड़ दिया था।

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संगीत की दुनिया का शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जो इनकी गायकी का दीवाना न हो। तलत भले ही आज गजल की दुनिया के शहंशाह हों, लेकिन उनके लिए इंडस्ट्री में जगह बनाना आसान नहीं था। जिंदगी में एक पड़ाव ऐसा भी आया, जब तलत अपमान के डर से गायकी छोड़ना चाहते थे। अपनी बेहतरीन गायकी से दुनियाभर में अलग पहचान रखने वाले तलत महमूद की आज 24वीं डेथ एनिवर्सरी है। उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आइए जानते हैं तलत की जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने और दिलचस्प किस्से-

जब पिता ने कहा घर या गायकी, तब तलत ने चुनी थी गायकी

तलत महमूद का जन्म 24 फरवरी 1924 को एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ था। हालांकि उन्हें गाने का हमेशा से शौक था। कम उम्र में ही रात भर वो म्यूजिक कॉन्सर्ट में बैठा करते थे। उनकी आवाज में एक अलग ही जादू था, लेकिन पिता मंजूर महमूद को उनका गाने गाना समाज में बेइज्जती लगता था।

एक दिन जब तलत की उम्र 14 साल रही होगी, उनके पिता ने उनसे बोल दिया- घर या गाने में से किसी एक को चुन लो। तलत ने उस वक्त गाने को तवज्जो दी और हमेशा के लिए परिवार से रिश्ता तोड़ लिया। फिर क्या था, पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया और 10 सालों तक चेहरा नहीं देखा। ये नाराजगी तब खत्म हुई जब तलत फेमस हो गए और फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें इज्जत से देखा जाने लगा।

ऑडिटोरियम में हुए अपमान के बाद किया गायकी छोड़ने का फैसला

एक बार तलत को अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोग्राम में गाना गाने का मौका मिला। 15 साल की उम्र में तलत स्टूडेंट्स और शिक्षकों से भरे हुए ऑडिटोरियम में पहुंचे। स्टेज पर पहुंचने के बाद उन्हें मिर्जा गालिब की गजल सुनाने की फरमाइश आई। गजल ‘नुक्ता-चीं है गम-ए-दिल उस को सुनाए न बने, क्या बने बात जहां बात बनाए न बने’ सुनाने के दौरान ही तलत गजल की लाइन ‘गैर फिरता है लिए यूं तिरे खत को कि अगर, कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने’ गाने के बाद चुप हो गए। दरअसल इसके बाद की लाइन वो भूल गए थे।

ऑडिटोरियम में मौजूद लोग स्टेज पर बैठे तलत को खरी-खोटी सुनाने लगे। तलत बुरी तरह टूट गए। इस वाकये से तलत के जेहन पर ऐसा गहरा असर पड़ा कि उन्होंने हमेशा के लिए गायकी छोड़ने का फैसला किया।

बुआ ने दिया सहारा तो फिर शुरू किया गाना

तलत तो गायकी छोड़ने की जिद पर अड़ गए थे, लेकिन इनकी बुआ को ये मंजूर नहीं था। बुआ ने खूब समझाया और उन्हें गाना गाने की हिम्मत दी। तलत की बुआ की बदौलत ही उनका एडमिशन मॉरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक में हुआ जो अब भातखंडे विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। यहां लिखित परीक्षा में तो तलत फेल हो गए थे, लेकिन जब उनके गाने की परीक्षा हुई, तब मात्र उनके आलाप गाने पर ही शिक्षकों ने बिना किसी सवाल के उन्हें एडमिशन दे दिया था। कदम-कदम पर उनकी बुआ ने उन्हें गाने की प्रेरणा दी। इसी की बदौलत तलत “शहंशाह-ए-गजल” कहलाए।

6 रुपए में किया पहला एल्बम

तलत महमूद की गायकी में अलग ही जादू था। वो महज 15 साल की उम्र में ही ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ स्टेशन पर मीर तकी मीर, जिगर मुरादाबादी, दाग देहलवी की गजलें गाने लगे थे। उनकी गायकी का जादू बहुत जल्द ही म्यूजिक कंपनी एचएमवी पर भी हो गया। उन्होंने तलत के साथ 1941 में एक एल्बम रिलीज किया। एल्बम का नाम था “सब दिन एक समान नहीं”। एल्बम हिट रहा और तलत को इसमें काम करने के 6 रुपए मिले।

एक गाने से रातों-रात मिल गई पहचान

तलत अब तक सिंगिग की दुनिया में खुद को स्थापित कर चुके थे। अब उनका अगला पड़ाव था कलकत्ता। वहां उन्होंने अपना नाम तपन कुमार रखकर कई बंगाली फिल्मों के लिए गाने गाए। उनकी कद काठी भी अच्छी थी तो वहां उन्होंने तीन बंगाली फिल्मों में एक्टिंग भी की। उनकी ये तीनों ही फिल्में हिट रहीं, जिसके बाद वो बॉम्बे यानी मुंबई आ गए।

यहां आकर उन्होंने एक एल्बम के लिए गीत गाया। जिसने उन्हें पूरे भारत में एक अलग पहचान दिलाई। ये गीत था “तस्वीर तेरी मेरा दिल बहला न सकेगी”। फैयाज हाशमी द्वारा लिखी ये गजल बच्चे-बच्चे की जुबान पर छा गई थी, लेकिन अब भी उन्हें वो मुकाम नहीं मिल रहा था जिसकी उन्हें तलाश थी। उनकी आवाज के कंपन की वजह से फिल्म इंडस्ट्री से लगातार उन्हें रिजेक्शन ही मिल रहा था।

क्रिश्चियन लड़की से की शादी

तलत ने कलकत्ता में ही एक ईसाई लड़की से शादी कर ली। जिसे 20 फरवरी 1951 को नसरीन नाम दिया गया। दोनों के दो बच्चे भी हुए- खालिद और सबीना।

तलत महमूद के लिए दिलीप कुमार की फिल्म में जोड़ा एक अलग गाना

अनिल बिस्वास एक दिन एक कॉन्सर्ट में गए हुए थे वहीं उनकी नजर तलत पर पड़ी। तलत की आवाज की लरजिश को फिल्म इंडस्ट्री में अब तक कोई नहीं पहचान पा रहा था, लेकिन तलत की यही लरजिश संगीतकार अनिल बिस्वास को मंत्रमुग्ध कर गई। उस वक्त तक अनिल बिस्वास दिलीप कुमार की फिल्म ‘आरजू’ में म्यूजिक देने का काम कर चुके थे, लेकिन तलत की आवाज उन्हें इतनी पसंद आई थी कि वो इसे फिल्म से जोड़ना चाहते थे।

अनिल बिस्वास ने डायरेक्टर को इस फिल्म में एक और गाना जोड़ने के लिए मना लिया। जिसके बाद मजरूह सुल्तानपुरी से एक गाना लिखवाया गया जिसे तलत से गंवाया गया। दिलीप कुमार पर फिल्माया गया गाना जल्द ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया जिसके बाद तलत ने दिलीप साहब के लिए कई गाने गाए।

रफी की जगह तलत की आवाज के लिए मदन मोहन ने जेब से खर्च किए पैसे

फिल्म ‘जहांआरा’ के समय एक अजीब स्थिति पैदा हो गई। इस फिल्म के गाने म्यूजिक कंपोजर मदन मोहन तलत महमूद से गंवाना चाहते थे, लेकिन प्रोड्यूसर ओम प्रकाश चाहते थे कि इस फिल्म के गीत मोहम्मद रफी ही गाएं, लेकिन मदन मोहन जिद पर अड़े थे और जब डायरेक्टर मानते नजर नहीं आए तो मदन मोहन ने अपनी जेब से पैसे खर्च करके इस फिल्म के गाने तलत महमूद से गंवाए। मोहम्मद रफी इस बात से काफी नाराज हुए। लेकिन तलत के गाए इस फिल्म के गाने सुपरहिट रहे। फिर चाहे ‘तेरी आंख के आंसू पी जाऊं हो’ या ‘फिर वही शाम’ या ‘मैं तेरी नजर का सुरूर हूं’।

जब नौशाद के मुंह पर छोड़ा सिगरेट का धुआं

संगीतकार नौशाद रिकॉर्डिंग से पहले सिगरेट पीने वाले सिंगर्स के सख्त खिलाफ थे, लेकिन तलत महमूद को सिगरेट पीने की आदत थी। उस समय ‘बाबुल’ फिल्म के गाने ‘मेरे जीवनसाथी’ की रिकॉर्डिंग होनी थी, लेकिन इसके ठीक पहले तलत महमूद ने नौशाद को चिढ़ाने के लिए जानबूझकर उनके सामने सिगरेट पी और धुंआ उनके मुंह पर छोड़ दिया। इस वाकये के बाद नौशाद ने तलत के साथ कभी काम नहीं किया।

16 फिल्मों में की एक्टिंग, पर हुए शर्मिंदा

गायकी के अलावा नौशाद ने 16 फिल्मों में एक्टिंग भी की। उनकी पहली फिल्म 1945 में आई राज लक्ष्मी थी। उन्होंने तुम और मैं, ठोकर, दिल ए नादान और वारिस जैसी फिल्मों में काम किया। इस फिल्मों में उन्होंने नूतन, माला सिन्हा, सुरैया जैसी बड़ी एक्ट्रेस के साथ काम किया, लेकिन जब उन्हें बात बनती नजर नहीं आई तो उन्होंने एक्टिंग छोड़ दी।

कई सालों बाद जब 1985 में एक इंटरव्यू में उनसे उनके एक्टिंग करियर के बारे में पूछा गया तब उन्होंने कहा, “जनाब, क्या आप उस गलती को भूल नहीं सकते। हम भी खतावार हैं, और कौन है जिसकी ख्वाहिश नहीं है कि वो दिलीप कुमार बने”। साफ था कि तलत की फिल्में फ्लॉप रहीं जिसके चलते अपने एक्टिंग करियर पर वो हमेशा शर्मिंदा रहे।

तलत को देख जब किशोर कुमार ने मन्ना डे और रफी से कहा- चलो भाग चले

पचास के दशक में जब भी संगीत की कोई महफिल होती थी तो संगीत की दुनिया के दिग्गज मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार मौजूद रहते थे। इस महफिल के सबसे आखिर में तलत महमूद को गाने के लिए बुलाया जाता था। इसी बीच एक शाम किशोर कुमार ने तलत महमूद से जाकर कहा था, ‘मैं समझता हूं मुझे गाना छोड़ देना चाहिए। उर्दू जुबान पर जो आपकी पकड़ है, उसका मुकाबला, मैं भला कैसे कर पाऊंगा?’

जब तलत को पहचानते ही किशोर ने अपने साथ बैठने के लिए बुलाया

एक इंटरव्यू में तलत महमूद की बेटी सबीना तलत महमूद ने बताया था कि, ‘एक बार मैं शणमुखानंद हॉल में किशोर कुमार के एक कॉन्सर्ट में जाना चाहती थी। जब मैंने ये बात अपने पापा को बताई तो न सिर्फ उन्होंने उस कॉन्सर्ट का टिकट खरीदा और तो और मेरे साथ किशोर कुमार को सुनने खुद शणमुखानंद हॉल गए।

बीच कॉन्सर्ट में किसी ने उन्हें पहचान लिया और किशोर कुमार तक ये खबर पहुंच गई कि तलत महमूद अपनी बेटी के साथ हॉल में मौजूद हैं। किशोर ने फौरन मंच से घोषणा की कि हमारे बीच तलत साहब बैठे हुए हैं। उन्होंने पापा को मंच पर बुलवाया और कहा कि ‘तलत साहब आपकी जगह वहां नहीं, यहां है। आप मेरे साथ बैठिए।’

गजल गायकी में सबसे ऊंचा मुकाम

मानिक प्रेमचंद ने हिंदी फिल्म संगीत पर कई किताबें लिखी हैं। उनमें से एक है तलत महमूद की जीवनी, ‘द वेल्वेट वॉयस’। मानिक बताते हैं कि तलत से वो 1958 में मिले थे। हिंदी फिल्मों में जब भी गजलों पर बात होगी, तब तलत का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। गजल गायकी में बेहद नाम कमा चुके जगजीत सिंह और पंकज उधास जैसे गायक उन्हें अपना आदर्श मानते हैं।

पाकिस्तानी सिंगर सज्जाद अली भी उन्हें अपना गुरु मानते हैं। तलत महमूद ऐसे पहले भारतीय सिंगर हैं, जिनका विदेश में कॉन्सर्ट हुआ। 1956 में ईस्ट अफ्रीका दौरे से शुरू हुआ ये सिलसिला अमेरिका, ब्रिटेन, वेस्ट इंडीज जैसे देशों तक चला। तलत 1991 तक कॉन्सर्ट में गाते रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 800 गाने गाए। जिनमें से कई सारे आज भी वैसे ही सुने जाते हैं, जितना उनका क्रेज उनके रिलीज के वक्त था। तलत को उनकी गायकी के लिए 1992 में पद्म भूषण पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।

गायकी का शाहजहां आखि्री वक्त चुप रहा

तलत की मौत 9 मई 1998 में पार्किंसन बीमारी से हुई थी। आखिरी समय में तलत एक-एक शब्द बोलने के लिए कड़ी जद्दोजहद कर रहे थे। मानिक प्रेमचंद ने तलत पर लिखी अपनी किताब में लिखा था, उस वक्त रह रह कर तलत महमूद का गाया एक गीत याद आता था, “मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, न जी को जलाना, मुझे भूल जाना”।

उनकी 20वीं पुण्यतिथी पर प्रसिद्ध पत्रकार और उनकी भतीजी सहर जमां ने जश्न-ए-तलत नाम से कार्यक्रम की शुरुआत की, जो तलत महमूद को समर्पित है।

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