बिजली कानूनों में संशोधन जनहित के खिलाफ और पूंजीपतियों के पक्ष में

नई दिल्ली। वर्ष 2003 के बिजली अधिनियम पर सरकार जो संशोधन करना चाह रही है, उनपर चर्चा जोर पकड़ रही है। इन संशोधनों की मुख्य दिशा यह है कि बिजली आपूर्ति करवाने वाली निजी कंपनियों के कारोबार और मुनाफे को तेजी से बढ़ाया जाए। विशेष चिंता की बात यह है कि इसके साथ ही सरकारी क्षेत्र की कंपनियों की कठिनाईयां बढ़ने वाली हैं और इसके साथ सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध करवाने की उनकी क्षमता भी घट जाएगी।

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यह सब जानते हैं कि बिजली आपूर्ति की जिम्मेदारी निभाने के लिए विभिन्न राज्यों में सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियां अरबों रुपए का निवेश नेटवर्क पर कर चुकी हैं। बस, अब इसी नेटवर्क का उपयोग कर आसानी से मुनाफा बटोरने की संभावनाएं निजी क्षेत्र के लिए खोल दी जाएंगी। इनका बहुत कम खर्च पर उपयोग कर निजी कंपनियां उन उद्योगों और व्यवसायिक ठिकानों को बिजली उपलब्ध करवा सकेंगी जिनसे मोटा मुनाफा अर्जित होता है।

सरकारी क्षेत्र की कंपनियों पर सभी को बिजली देने की जिम्मेदारी है जिसमें निर्धन परिवार भी हैं, स्लम निवासी भी है, किसान भी हैं। यदि इन्हें सस्ती या निशुल्क बिजली देने में उन्हें घाटा होता है तो वे इसकी पूर्ति कुछ इस तरह मुनाफा देने वाले ग्राहकों से कर लेती हैं।

अब अधिक मुनाफे वाले ग्राहकों को निजी कंपनियां हथिया लेंगी, तो सरकारी क्षेत्र की कंपनियों का घाटा बढ़ने लगेगा। इसके साथ ही राज्य सरकारों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ने लगा, जबकि पहले से ही अनेक राज्य सरकारों के लिए वित्तीय स्थिति चिंताजनक हो रही है। इस स्थिति में उनके लिए अधिक जरूरतमंद उपभोक्ताओं को, गरीब परिवारों को और किसानों को सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध करवाना कठिन हो जाएगा।

इसी कारण अनेक किसान संगठनों ने भी बिजली कानून में प्रस्तावित संशोधनों का विरोध किया है। उन्होंने इस संदर्भ में इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि बिजली कानून के संदर्भ में सरकार ने जो वायदे किसान आंदोलन की समाप्ति के बाद किए थे उन्हें पूरा किया जाना चाहिए। अखिल भारतीय बिजली इंजीनियर फेडरेशन के बिजली क्षेत्र संबंधी सुझावों को प्रायः बहुत महत्त्व दिया जाता है। इस फेडरेशन ने भी बिजली कानून में प्रस्तावित संशोधनों का खुलकर विरोध किया है।

वर्ष 2003 में जब बिजली का कानून बना था (जिसके संशोधन की बात इस समय चल रही है) उस समय कानून को अंतिम रूप देने से पहले 2001 से 2003 तक लगभग दो वर्षों तक विमर्श हुआ था, सभी पक्षों और विशेषज्ञों के विचारों को जाना गया था। वर्ष 2001 में जो कानून और प्रस्ताव था, उसे बिजली पर जो संसदीय समिति थी उसे सौंपा गया था ताकि इस मंच से भी विभिन्न विचार प्राप्त किए जा सके।

इस अनुभव से सीखते हुए कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इन संशोधनों को भी पहले संसदीय समिति में भेजना चाहिए ताकि इस तरह से सामने आए विचारों पर पर्याप्त ध्यान दिया जा सके। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारों के विचार भी खुलकर सामने आने चाहिए और उनके विचार प्राप्त करते समय उन पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए ताकि अपनी सही स्थितियों और विचारों के आधार पर जो वास्तविक जरूरत है उसे केन्द्रीय सरकार के सामने रख सकें।

यदि पारदर्शिता और खुलेपन के माहौल में इन प्रस्तावित संशोधनों पर विचार होता है तो निश्चय ही इन महत्त्वपूर्ण विषय पर सही निर्णय लेने की संभावना कहीं बढ़ जाएगी। कुछ समय पहले देश को कोयले की कमी के कारण अनेक क्षेत्रों को बिजली संकट झेलना पड़ा जबकि उचित नियोजन से बचा जा सकता था।

इतना ही नहीं, इस दौर में कुछ राज्यों पर यह दबाव बनाया गया कि वह बहुत महंगी कीमत पर कोयला आयात करें जिससे कुछ बड़े पूंजीपतियों को बहुत लाभ हुआ। अतः वैसे भी बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता की आवश्यकता अब बढ़ रही है और इन प्रस्तावित संशोधनों के कारण तो यह आवश्यकता और भी बढ़ गई है।

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