राम मंदिरः टूट रहा है आरएसएस के सब्र का बांध

लेखक- ओमप्रकाश मेहता

अब ऐसा लगने लगा है कि अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर भारतीय जनता पार्टी के संरक्षक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित सभी भाजपा के अनुषांगी हिन्दू संगठनों के सब्र का बांध अब टूटता नजर आ रहा है, क्योंकि इनकी उम्मीद थी कि केन्द्र में उनकी अपनी सरकार है और इसी सरकार के कार्यकाल में राममंदिर, कश्मीर से धारा-370 की समाप्ति, कश्मीरी पण्डितों की कश्मीर वापसी व हिन्दू राष्ट्र जैसी सभी उम्मीदें पूरी हो जाएगी, किंतु अब चूंकि इस सरकार का सिर्फ छ: महीनें का ही कार्यकाल शेष बचा है इसलिए संघ सहित सभी हिन्दू संगठनों की अधीरता बढ़ती जा रही है और अब शिवसेना, संघ, विश्व हिन्दू परिषद सहित सभी दल व संगठन अपनी ही सरकार के खिलाफत में खड़े होने लगे है, शिवसेना जहां खुलकर भाजपा के सामने आ गई है, वहीं संघ प्रमुख डॉ. मोहनराव भागवत ने भी अपने दशहरें के महत्वपूर्ण सम्बोधन के माध्यम से मोदी सरकार को राममंदिर निर्माण को लेकर अध्यादेश लाने का संदेश दे दिया है, अब इस संदेश को आदेश माना जाए या अनुरोध, यह सरकार पर निर्भर है, लेकिन फिलहाल तो ऐसा ही लगता है कि सरकार व संगठन के मुखिया संघ के संदेश को अनुरोध ही मानकर उसे ठुकरा रहे है और कह रहे है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार किया जाएगा।

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किंतु संघ व उसके साथी हिन्दू संगठनों को आशंका है कि अगले लोकसभा चुनाव तक कोर्ट का फैसला आना नहीं है, और उसके बाद जरूरी नहीं कि इसी सरकार की पुनरावृत्ति हो? और मंदिर का मामला फिर अटक जाएगा? इस माहौल को देखते हुए अब संघ परिवार व अन्य संगठनों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि अपना अनुरोध ठुकरा दिए जाने के कारण संघ विधानसभा व लोकसभा चुनाव प्रचार से कन्नी काटने जैसा सख्त कदम उठा सकता है तथा विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल आदि भी विरोध का शंखनाद कर सकते है, जहां तक शिवसेना का सवाल है, वह तो पहले से ही भाजपा के खिलाफ राजनीतिक रणक्षेत्र में खड़ी है?

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यद्यपि केन्द्र सरकार उम्मीद लगाए बैठी है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही अयोध्या मंदिर विवाद पर फैसला सुना देगा, किंतु केन्द्र शायद यह भूल गया कि सुप्रीम कोर्ट प्रतिदिन इस मामले में सुनवाई का अनुरोध पहले ही ठुकरा चुका है, इसलिए जरूरी नहीं कि इस विवाद पर कोर्ट का फैसला अगले तीन-चार महीने में आ जाए?
इसके साथ ही यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राममंदिर के मसले को लेकर भारतीय जनता पार्टी का एक बहुसंख्यक खेमा संघ के साथ खड़ा है और उसे विश्व हिन्दू परिषद का पूरा समर्थन मिल रहा है, जबकि बहुत ही कम संख्या में कुछ भाजपाई है जो इस मामले में मोदी-शाह के पीछे खड़े है, इस तरह राममंदिर के मसले को लेकर अभी से भाजपा का स्पष्ट विभाजन नजर आ रहा है, जो मोदी-शाह का राजनीतिक भविष्य भी प्रभावित कर सकता है? और कोई आश्चर्य नहीं होगा, अगर इसका असर अगले माह होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर भी नजर आए?

इस प्रकार कुल मिलाकर अयोध्या राममंदिर निर्माण को लेकर अखाड़ा तैयार हो रहा है, जिसमें संघ, विहिप, शिवसेना, बजरंग दल आदि सभी भाजपा के सामने ताल ठोंक कर आ खड़े हुए है। बात सिर्फ भाजपा के विभाजन की नहीं, केन्द्रीय मंत्री परिषद के भी कई सदस्य संघ प्रमुख की मांग को उचित मान रहे है और उनका तो यहां तक कहना है कि यदि केन्द्र सरकार द्वारा राममंदिर निर्माण की दिशा में सार्थक पहल शुरू होती है तो वह पहल भाजपा तथा केन्द्र की मौजूदा सरकार के लिए ”संजीवनी“ सिद्ध हो सकती है, वर्ना कोई सार्थक पहल इस दिशा में नहीं होने पर यह राममंदिर आंदोलन किस दिशा में रूख कर लेगा? यह भी फिलहाल कहना मुश्किल है। क्योंकि शिवसेना का स्पष्ट कहना है कि अभी यदि राममंदिर नहीं बन पाया तो फिर वह कभी भी नहीं बन पाएगा, क्योंकि फिलहाल पूरी स्थिति और माहौल मंदिर के पक्ष में है और यदि मंदिर बनाना तो दूर यदि भाजपा इस दिशा में सार्थक व विश्वसनीय पहल भी शुरू कर देती है तो फिर उसके सामने विधानसभा या लोकसभा चुनावों में कोई खास चुनौती शेष नहीं रह जाएगी? उसे अपनी मंजिल सरलता से हासिल हो जाएगी और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो न सिर्फ संघ व उसके हिन्दूवादी संगठन ही भाजपा की कब्र खोदने में सहयोगी सिद्ध होगें और मोदी-शाह के सभी भावी मंसूबे ध्वस्त हो जाएगें, इसलिए फिलहाल इस दिशा में गंभीर चिन्तन कर सही फैसला लेने का सही वक्त है।

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