लद्दाख के लेह क्षेत्र में 11500-16500 ऊंचाई पर युद्धाभ्यास में शामिल हुए लड़ाकू विमान

नई दिल्ली। पूर्वी लद्दाख की सीमा का सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे और वायुसेना प्रमुख आरकेएस भदौरिया दौरा करके अपने-अपने सैनिकों को चीन से मोर्चा संभालने के लिए तैयार कर चुके हैं। इसके बाद दोनों सेनाओं ने आपस में तालमेल बढ़ाने के मकसद से शुक्रवार को लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर साझा युद्धाभ्यास किया जिसमें लड़ाकू और परिवहन विमान भी शामिल हुए।
चीन के साथ चल रहे तनाव को देखते हुए वायुसेना प्रमुख ने 17 जून को लेह और 18 जून को श्रीनगर एयरबेस का दौरा किया था। यह दोनों ही हवाई बेस पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के पास स्थित हैं और इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी लड़ाकू विमान वाले अभियान को सुचारू रूप से चलाने के लिए सक्षम हैं। उनके दौरे के बाद से ही एलएसी पर नजर रखने के लिए लद्दाख में लड़ाकू विमान मल्टी रोल कम्बैक्ट, मिराज-2000, सुखोई-30 एस और जगुआर विमान तैनात हैं। कम्बैक्ट एयर पेट्रोल विमान लगातार उड़ान भरकर निगरानी कर रहे हैं।
इसके अलावा चिनूक हेलीकाप्टरों को लद्दाख में तैनात सैनिकों को खाद्य और रसद सामग्री पहुंचाने में लगाया गया है। पूर्वी लद्दाख सेक्टर में भारतीय सेना के जवानों को हवाई सहायता प्रदान करने के लिए अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टरों को उन क्षेत्रों के करीब के इलाके में तैनात किया गया है, जहां जमीनी सैनिक तैनात हैं। इसके अलावा एमआई-17वी5 मीडियम-लिफ्ट हेलिकॉप्टर भी सैनिकों और सामग्री परिवहन के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के दो दिवसीय लेह-लद्दाख दौरे से लौटने के दूसरे दिन आज सेना और वायुसेना ने एलएसी पर साझा युद्धाभ्यास किया। लद्दाख के लेह क्षेत्र में 11500-16500 ऊंचाई पर हो रहे इस युद्धाभ्यास में लड़ाकू विमान सुखोई-30 एस एमकेआई, चिनूक और मी-17 हेलिकॉप्टर शामिल हुए।
इसी के साथ सेना के मालवाहक विमानों ने रसद, तोपें और सिपाहियों को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाने का अभ्यास किया। इस अभ्यास में सी-130 हरक्यूलिस और अलग-अलग मालवाहक विमान हिस्सा ले रहे हैं। दरअसल अभी भी गलवान घाटी, पैंगॉन्ग झील और दौलत बेग ओल्डी इलाके में चीनी सेना की तैनाती पहले जैसी बनी है। ऐसे में भारत किसी स्तर पर अपनी तैनाती को कम नहीं रखना चाहता है।
युद्धाभ्यास के दौरान सुखोई-30 ने आसमान में सुरक्षा घेरा बनाया। एलएसी पर चीन से तनाव के बीच भारतीय सेना और वायुसेना का यह युद्धाभ्यास काफी अहम माना जा रहा है। वायुसेना के सूत्रों का कहना है कि सेना का ऐसा अभ्यास यहां निरंतर चलता रहेगा।
भारत को एलएसी पर लंबी दौड़ के लिए तैयार होने की जरूरत है क्योंकि चीन को सीमा से पीछे हटाने की प्रक्रिया में सर्दियों के मौसम तक महीनों लग सकते हैं। भारत और चीन के बीच सीमा पर गतिरोध तब तक बना रह सकता है जब तक कि दोनों सेनाएं एलएसी से दूर न हो जाएं। दोनों देश फिलहाल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव का समाधान खोजने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर की बातचीत कर रहे हैं।​ भारत का पहला उद्देश्य एक हद तक निर्माण कार्य रोकना है और फिर विघटन प्रक्रिया शुरू होगी।
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