वक्फ बिल पर नीतीश ने BJP का साथ क्यों दिया: 3 वजहें

अपनी छवि और राजनीति को करीने से साधने वाले नीतीश कुमार ने चुनावी साल में बोल्ड डिसीजन लिया है, जो चर्चा का विषय बन गया है। अब तक जानकारों का मानना था कि चुनावों के मद्देनजर JDU मुस्लिम वोटर्स को नाराज नहीं कर सकती, इसलिए वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती, जहां उसे मुस्लिम वोटर्स को साधने की जरूरत महसूस होती है।

Advertisement

बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव हैं। 2023 की जातीय गणना के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 17.7% मुस्लिम हैं। जिनका राज्य के करीब 47 सीटों पर प्रभाव है। ऐसे में नीतीश कुमार ने वक्फ बिल पर मोदी का साथ दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पार्टी अध्यक्ष ने अपने सांसदों को स्पष्ट संदेश दिया कि आप मुस्लिम वोटों की चिंता ना करें।

सबसे पहले जानिए, भाजपा ने नीतीश को कैसे भरोसे में लिया

  1. बिल के मूल ड्राफ्ट में प्रावधान था कि नया कानून लागू होने के 6 महीने के अंदर एक सेंट्रल पोर्टल पर सभी वक्फ प्रॉपर्टीज का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। 6 महीने बाद प्रॉपर्टी को लेकर कानून के तहत कोर्ट में कोई सुनवाई नहीं की जा सकेगी। JDU के सांसद दिलेश्वर कामत ने इस प्रावधान में संशोधन का सुझाव दिया था, जिसे JPC ने स्वीकार कर लिया। अब वक्फ ट्रिब्यूनल किसी वक्फ प्रॉपर्टी के रजिस्ट्रेशन की टाइमलाइन बढ़ा सकता है। इसके लिए प्रॉपर्टी के मुतवल्ली यानी केयरटेकर को ट्रिब्यूनल के सामने इसकी उचित वजह बतानी होगी।
  2. भाजपा की टॉप लीडरशिप ने बिल के एक-एक पॉइंट को क्लियर किया। शाह ने ललन सिंह और संजय झा के साथ मीटिंग की।
  3. सूचना है कि गृह मंत्री अमित शाह ने अपने हाल के बिहार दौरे के दौरान नीतीश कुमार से बात की। उनको समझाया कि बिल गरीब और पसमांदा मुसलमानों के पक्ष में है। वो बिल पारित होने के बाद हमारे साथ आ सकते हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 29-30 जनवरी को बिहार दौरे पर थे। 30 जनवरी को उन्होंने सीएम हाउस में NDA के घटक दल के नेताओं के साथ बैठक की थी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 29-30 जनवरी को बिहार दौरे पर थे। 30 जनवरी को उन्होंने सीएम हाउस में NDA के घटक दल के नेताओं के साथ बैठक की थी।

अब 3 पॉइंट में जानिए, आखिर ऐसा क्या हुआ कि नीतीश कुमार का मुस्लिमों से मोह भंग हो गया?

1. मुस्लिमों के लिए काम किया, लेकिन उन्होंने साथ नहीं दिया

2013 में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के विरोध में 17 साल पुराना NDA का गठबंधन तोड़ दिया। 2014 लोकसभा चुनाव उन्होंने अपने दम पर लड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि अपने कोर वोट बैंक के अलावा मुस्लिमों का भी साथ मिलेगा, लेकिन ये उनका भ्रम साबित हुआ। उन्होंने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन मात्र 2 सीट ही जीत सके। इनमें एक नालंदा और एक पूर्णिया की सीट थी। बाकी 36 सीटों पर उनकी हार हो गई।

JDU सूत्रों की मानें तो उसी साल से नीतीश कुमार का दिल टूट गया था। नीतीश कुमार ने वक्फ संशोधन बिल पर खुलकर सरकार को समर्थन करने की अपनी सहमति दे दी थी। उनका मानना था कि हम उनके लिए काम करते हैं, लेकिन वे हमारा सपोर्ट नहीं करते हैं।

जदयू के एक नेता ने दैनिक भास्कर को बताया कि पॉलिटिक्स करने के लिए कपड़ा जरूरी है न। ऐसे में जो पार्टी हमें पद और कद दोनों दे रही है, हम उनके एजेंडे का विरोध क्यों करें। इसलिए हमारे नेतृत्व ने इस बिल पर सपोर्ट देने का निर्णय लिया।

2. JDU मान चुकी है उसे मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला

JDU के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नीतीश कुमार ने 2005 से लेकर अब तक बहुत प्रयास किया कि उन्हें मुस्लिम वोट मिले। 2010 तक थोड़ा बहुत सपोर्ट मिला भी। इसके बाद मुस्लिम इनसे दूर होते चले गए।

ऐसे में अब JDU की टॉप लीडरशिप ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि बिहार में मुस्लिम वोट एकतरफा है। ये कुछ भी कर लें, बीजेपी से अलग हो जाएं, आरजेडी के साथ आ जाएं। इन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला है। ऐसे में इन्होंने बीजेपी को साथ देने का निर्णय लिया।

CSDS-लोकनीति के पोस्ट-पोल सर्वे 2020 के मुताबिक, RJD और कांग्रेस के महागठबंधन को 75% मुस्लिम वोट मिले थे। वहीं, BJP और JDU वाले NDA को 5% और चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) को 2% मुस्लिम वोट मिले।

3. कमजोर नीतीश को 2025 के लिए बीजेपी का साथ जरूरी

2020 विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर की बन गई थी। 2005 विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था जब नीतीश कुमार को बीजेपी से भी कम सीटें हासिल हुई थीं। इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार चिराग पासवान को माना गया।

2020 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार भले सीएम बने रहे, लेकिन उन्हें दो बार पाला बदलना पड़ा। पहले बीजेपी का साथ छोड़कर वे राजद के साथ गए। इसके बाद दोबारा वे बीजेपी के साथ आए।

बिहार में अगले 6 महीने में विधानसभा का चुनाव होना है। नीतीश कुमार की सेहत पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। जदयू को बिहार में अपनी स्थिति को मजबूत रखने के लिए एक पुराने और भरोसेमंद साथी की जरूरत है। ऐसे में बीजेपी से ज्यादा भरोसेमंद उनके लिए कोई और पार्टी नहीं हो सकती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here