लेखकः डा. हिदायत अहमद खान
अमेरिका में जब राष्ट्रपति चुनाव का दौर चल रहा था, तभी जोर-शोर से इस बात की आशंकाएं भी व्यक्त की जा रहीं थीं कि कहीं न कहीं इन चुनावों में रुस का हस्तक्षेप हो रहा है। यही कारण था कि लोकप्रियता में पीछे रहने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव जीतने में सफल रहे। इसे देखते हुए ही अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों जाते-जाते तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसकी उच्चस्तरीय जांच की भी घोषणा कर दी थी। बहरहाल इस मामले में जनवरी 2017 के आंकलन में शीर्ष अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस निष्कर्ष पर पहुंचीं थीं कि रूस ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हस्तक्षेप किया था। बावजूद इसके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब रुस यात्रा पर पहुंचे तो उन्होंने ऐसे तमाम आरोपों और दावों को खारिज करते हुए बयान दे दिया कि रुस ने अमेरिकी चुनाव में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। उनके इस बयान को लेकर अमेरिका समेत दुनियाभर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया कि क्या कोई राष्ट्रप्रमुख अपनी ही जांच एजेंसी के खिलाफ बयान दे सकता है? इससे पहले कि ट्रंप के बयान को लेकर कोई अंतर्राष्ट्रीय राय कायम की जाती अमेरिका लौटते ही उन्होंने अपने बयान को पलट दिया और कहा कि जो अमेरिका की खुफिया एजेंसियां कह रही हैं वही सही है, रुस ने कहीं न कहीं चुनाव में हस्तक्षेप किया ही किया है, लेकिन यह बात अलग है कि उससे चुनाव के परिणाम प्रभावित नहीं हुए।
संभवत: इससे पहले किसी शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस कदर असमंजस की स्थिति में पड़ते हुए नहीं देखा गया था। यह सब चल ही रहा था कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सोशल मीडिया विशेषज्ञों ने यह कहकर सभी को गहरी नींद से जगा दिया कि भारत और ब्राजील जैसे देशों के चुनाव में रुस हस्तक्षेप कर सकता है। अब चूंकि भारत के आम चुनाव 2019 में होने जा रहे हैं तो यह खबर हमारे लिए विशेष महत्व रखती है। वैसे भी पिछले कुछ समय से विपक्ष लगातार ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता चला आ रहा है, ऐसे में यह खबर और भी चिंता को बढ़ाने जैसा है। दरअसल अमेरिकी सांसदों के समक्ष रिपोर्ट को रखते हुए दावा किया गया है कि चुनाव प्रभावित करने के लिए रूस वहां की मीडिया को निशाना बना सकता है जहां हाल ही में चुनाव होने हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट एंड बेलियोल कॉलेज के प्राध्यापक फिलिप एन. हॉवर्ड ने सोशल मीडिया मंचों पर विदेशी प्रभाव के मामलों पर सीनेट की खुफिया कमेटी की सुनवाई में यह बात रखकर सभी को बाखबर तो कर दिया, लेकिन इसके प्रभाव को कैसे रोका जा सकता है या इसकी मारक क्षमता को किस तरह से कम किया जा सकता है, इस बारे में कोई ठोस बात सामने नहीं आई है। यह जरुर कहा जा रहा है कि सजगता और इसकी संपूर्ण जानकारी ही इसके हस्तक्षेप को रोक सकता है। चूंकि इस रिपोर्ट में यह भी आशंका जाहिर की गई है कि यदि रुसी हस्तक्षेप को नहीं रोका गया तो इन देशों के हालात चुनाव के दौरान और भी खराब हो सकते हैं।
मतलब इस समय जो अविश्वास, आक्रामकता और अफरातफरी का माहौल देश में बनता जा रहा है, उसमें और भी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसी के जरिए मतदाताओं के रुझान को किसी विशेष राजनीतिक दल या नेता के प्रति बदला जा सकता है। वैसे इस मामले में खुद हॉवर्ड ने विस्तार के साथ और अधिक ब्यौरा प्रस्तुत नहीं किया है, इसलिए इन्हें आरोपों से ज्यादा कुछ माना नहीं जा सकता। बावजूद इसके यहां हॉवर्ड की आशंका इसलिए निर्मूल नहीं है क्योंकि हमारे देश में मीडिया अमेरिका जितना पेशेवर नहीं है। इसलिए सीनेटर सुसान कोलिंस के एक सवाल का जवाब देते हुए हॉवर्ड जब यह कहते हैं कि भारत और ब्राजील के चुनावों में मीडिया के जरिए हस्तक्षेप की संभावना बनती ही बनती है, तो सचेत रहने की आवश्यकता तो जान पड़ती ही पड़ती है। अपनी बात की पुष्टि में उन्होंने हंगरी का उदाहरण जरुर दिया, लेकिन हंगरी के अंदरुनी हालात और हमारे देश के हालात में जमीन-आसमान का अंतर है, इसलिए आशंकाओं को बल मिलने में अभी और भी तथ्यों और उदाहरणों की आवश्यकता है। बकौल हॉवर्ड, ‘मैं यहां यह कह सकता हूं कि हमारे लोकतांत्रिक सहयोगी देशों में अधिक चिंताएं हो सकती हैं।
मेरा मानना है कि रूस हमें निशाना बनाने से आगे बढ़ते हुए ब्राजील, भारत जैसे अन्य लोकतांत्रिक देशों को भी अपना निशाना बना सकता है, जहां अगले कुछ बरसों में चुनाव होने हैं।’ बात सीधी और स्पष्ट है, लेकिन इस मामले को और जांचने की आवश्यकता है, ताकि हवा में तीर चलाने या फिर लकीर को सर्प समझकर धूल में लाठी मारने से बचा जा सके। इसके लिए देश के तमाम मीडिया संस्थानों को सीखने और विकसित करने की आवश्यकता तो है ही, लेकिन उससे ज्यादा जरुरी है कि हम जमीनी हकीकत से खुद को जोड़कर रखें ताकि किसी प्रकार के बहकावे में न आ सकें। वैसे भी भारतीय मीडिया पर चुनाव के दौरान विशष पैकेज लेकर समाचार चलाने, पेडन्यूज के जरिए मतदाताओं को रिझाने और खुद के बिकने या फिर किसी खास विचारधारा के तहत समाचारों को मैनेज करने के आरोप आरोप पहले से ही लगते रहे हैं, फिर ऐसे में रुस क्या खाक हस्तक्षेप करने की स्थिति में होगा?