ऐसा था हमारे अटल जी का अंदाज ए राजनीति, देखें तस्वीरें…

नयी दिल्ली। अपनी आवाज से लोगों की बोलती बंद कर देने वाले अटल बिहारी बाजपेई अब श्रीहरि के चरणों की सेवा करने रवाना हो चुके है। 1957 में लोकसभा सांसद चुने गए अटल बिहारी वाजपेयी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक करियर में ऐसे कई मानक स्थापित किए जिसे अब तक सराहा जाता है। पूरा देश अटलजी के जाने से शोक में डूबा है। अटलजी नहीं रहे लेकिन उनकी कुछ तस्वीरें ऐसी हैं जो उन्हें देशवासियों की यादों में हमेशा अमर रखेंगी। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने प्रखर भाषणों के लिए जाने जाते थे। उनके भाषण ऐसे होते थे जो लाखों लोगों के अंदर जोश और उत्साह भर देते थे लेकिन बहुत ही कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि एक बार वह निःशब्द हो गए थे।

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यह 1934 का वह दिन था जब वह मध्य प्रदेश के उज्जैन में बारनगर टाउन में हुई वाद-विवाद प्रतियोगिता में वह हिस्सा ले रहे थे। वाद-विवाद के दौरान वह अपने सहपाठियों के सामने मुंह बंद करके खड़े रहे। बाद के दिनों में खुद वाजपेयी ने माना कि इस घटना ने उनका जीवन बदल दिया। 1996 में लोकसभा चुनाव के दौरान एक रैली में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वह अपने जीवन का पहला भाषण पूरा नहीं कर पाए थे लेकिन यह वह क्षण था जिसके बाद उनका जीवन बदल गया। वाजपेयी ने कहा था, ‘मैंने इस घटना के बाद एक पाठ सीखा, जिसने मेरा जीवन बदल दिया। मैंने एक प्रतिज्ञा ली कि अब मैं कभी भी भाषण याद करके नहीं बोलूंगा। यह मेरे जीवन का पहला भाषण था जो मैंने ऐंग्लो वर्नाकुलर मिडल (एवीएम) स्कूल में दिया था।’ वाजपेयी का 1934 में एवीएम स्कूल में ऐडमिशन हुआ था। उनके पिता हेड मास्टर थे। वह उस घटना को कभी नहीं भूले जब उन्हें ब्रिटिशर्स द्वारा भारत में विकसित की गई रेलवे लाइन के बारे में बोलना था।

 

 

सालों पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धी को लेकर इंदिरा गांधी सरकार पर हमला बोला और विरोध जताने के लिए बैलगाड़ी से संसद पहुंच गए थे।

 

जब बैलगाड़ी से संसद पहुंचे थे अटल बिहारी वाजपेयी

 

मोरारजी देसाई, चंद्र शेखर और सुब्रमण्यन स्वामी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी।

 

 

खुशमिजाज़ अटल

 

 

पोखरण में जॉर्ज फर्नांडीस और एपीजे अब्दुल कलाम के साथ अटल बिहारी वाजपेयी।

 

पोखरण में अटलजी

 

 

मुलायम सिंह यादव, देवीलाल से मुलाकात के दौरान वाजपेयी।

 

 

मुलायम सिंह यादव संग अटलजी

 

 

हेमवती नंदन बहुगुणा, फारुक अब्दुल्ला, एनटीआर और एलके आडवाणी के संग वाजपेयी।

 

4 बड़े नेताओं के संग अटलजी

 

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ अटल बिहारी वाजपेयी।

 

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति संग अटलजी

 

 

1977 में भारत के इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित कर अटलजी ने सबको हैरान कर दिया था। विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने 1977 से 2003 तक संयुक्त राष्ट्र महासभा को 7 बार संबोधित किया था।

 

हिंदी बोलकर रचा था इतिहास

 

 

वाजपेयी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक 1999 में हुआ करगिल युद्ध था, जिसमें भारत ने पाकिस्तान को शिकस्त दी थी।

 

 

करगिल में भारत की जीत

 

 

1965 में सिक्किम सीमा पर जो हुआ, वह भारत के प्रति चीन के लड़ाकू रवैये को बयां करने के लिए सबसे अच्छा उदाहरण है। दोनों देशों के बीच चिट्ठियों के जरिए हुई बात से पता लगा कि चीन ने भारतीय सैनिकों पर तिब्बत के चरवाहों की 800 भेड़ें और 59 याक चुराने का आरोप लगाया था। इतना ही नहीं चीन ने अपने जानवर भारत से वापस मांगे और ऐसा न करने की स्थिति में परिणाम भुगतने को तैयार रहने तक की धमकी दी। चीन के बेतुके आरोप का विरोध करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जो उस समय सांसद थे, दिल्ली में चीनी दूतावास में भेड़ों का झुंड लेकर ही चले गए। वहां, प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अब चीन भेड़ों और याक पर विश्व युद्ध शुरू करेगा। प्रदर्शनकारियों के हाथ में तख्ते थे, जिनपर लिखा था, ‘हमें खा लीजिए, लेकिन दुनिया को बचा लीजिए। चीन इससे परेशान हो गया था कि इस प्रदर्शन से उसकी धमकी खुले में आ गई थी। इसके बाद चीन में भारतीय दूतावास को गुस्से से भरी एक चिट्ठी भेजी गई जिसमें शिकायत थी कि वाजपेयी का विरोध प्रदर्शन असल में भारत सरकार द्वारा समर्थित था। इस चिट्ठी में यह भी आरोप लगाया गया कि भारतीय सैनिक चीन के क्षेत्र में घुसे और वहां निर्माण कार्य भी किया।

 

इसके जवाब में भारत सरकार ने लिखा, ‘4 तिब्बतियों के भारतीय सैनिकों द्वारा अपहरण के मामले में 17 और 21 सितंबर को भेजी चिट्ठीयों में जवाब दिया जा चुका है। अन्य तिब्बती शरणार्थियों की तरह ही ये 4 भी अपनी इच्छा से बिना हमारी मंजूरी लिए भारत आए और शरण ली। ये किसी भी समय अपनी मर्जी से तिब्बत वापस जाने के लिए आजाद हैं। 800 भेड़ों और 59 याक के बारे में भी भारत सरकार पहले ही जवाब दे चुकी है। हमें इनके बारे में कुछ नहीं पता। वाजपेयी के ‘भेड़ प्रदर्शन’ पर भारत ने लिखा, ‘चीन ने 26 सितंबर की चिट्ठी में नई दिल्ली स्थित अपने दूतावास में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का विरोध किया है। भारत सरकार का इस प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है। यह चीन के अल्टिमेटम के खिलाफ भारतीय नागरिकों द्वारा शांतिपूर्ण और अच्छे मजाकिया तरीके से किया गया प्रदर्शन था।

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