नई दिल्ली। कांग्रेस के उम्मीदवारों की दूसरी सूची में तीन सत्य छुपे हैं। दोनों लिस्ट में एक अंक(3) आपको चौंका सकता है। दोनों सूचियों में टिकटों की संख्या में आखिरी नंबर 33, 43 हैं। ये नंबर बार-बार कुछ चीजों की तरफ इशारा कर रहे हैं। अन्यथा जो कांग्रेस 106 और इससे ज्यादा नामों की घोषणा करने वाली थी, उसे अंकगणित के ये नंबर क्यों देखने पड़े। दरअसल, राजनीति का पूरा भूगोल और अर्थशास्त्र मैसेज पर टिका है। अब वो भले ही नंबर हो या कुछ और।
पहली सूची के करीब 30 घंटे बाद जब 43 नामों की दूसरी सामने आई तो सबसे बड़ा सवाल ये ही था कि आखिर इस सूची में नया क्या है? वही पुराने चेहरे तो हैं? ये तो पहली सूची में भी शामिल हो सकते थे।
दोनों सूचियों को डीकोड करने पर तीन सच आईने की तरह साफ नजर आने लगे। पहला तीन नेता- धारीवाल, राठौड़ और जोशी को हाईकमान ने आंख दिखाई। दूसरा, पायलट-गहलोत गुट के नेताओं की टिकट क्लियर कर दोनों के एक होने (दिखाने) की तथाकथित कोशिश करना। तीसरा और परम सत्य। तीन नेताओं को छोड़ प्रत्याशियों के चयन में गहलोत फॉर्मूला ही चलेगा।
पहली सूची की तरह दूसरी में भी वही घोड़े हैं और वही मैदान है। संभवत: कांग्रेस ने तय कर लिया है कि राजस्थान में वो जो रिवाज बदलना चाहती है, उसमें उसके लिए पुराने चेहरे ही मददगार हैं, भले उन्हें लेकर जनता में कितना ही आक्रोश हो।
दूसरा, दोनों सूचियों में आलाकमान के सभी फॉर्मूले भी फेल हो गए हैं। भले वो युवाओं को टिकट देने का हो या दो बार हारे हुए प्रत्याशियों को टिकट नहीं देने का हो।
आज की सूची में कांग्रेस की क्या रणनीति रही, इसे यूं समझते हैं…

1. कांग्रेस की सूची की तीन प्रमुख बातें क्या हैं?
पहली : इस लिस्ट में कुछ सीट को छोड़ दें तो ज्यादातर वे नाम हैं, जिन्हें टिकट मिलना तय माना जा रहा था। करीब 30 सीटों को होल्ड पर रख लिया गया है। वर्ष 2018 में राजस्थान में कांग्रेस की पहली ही सूची 152 सीटों की थी। इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की पहली सूची 144 नामों की रही। ऐसे में ये मैसेज जा रहा है कि यहां पर स्थितियां वहां जैसी नहीं हैं। पार्टी अभी प्रत्याशियों को लेकर क्लियर नहीं है।
दूसरी : आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व विवादित नेताओं और बागियों को मौका नहीं देना चाह रहे।
तीसरी: छोटी सूचियों से ये मैसेज भी जा रहा है कि कांग्रेस मैदान में पुराने घोड़ों पर ही सवार होना चाह रही है।
2. धारीवाल, जोशी और राठौड़ फैक्टर कितना असरदार है?
हाईकमान को आंख दिखा चुके इन नेताओं को अब आलाकमान इंतजार करा-कराकर आंख दिखा रहा है। उम्मीद है कि अंतिम सूचियों तक इनके नाम ऐसे ही घसीटे जाएंगे।
अगर ऐसा नहीं होता तो इनके नाम भी घोषित हो चुके होते, क्योंकि मौजूदा 28 में से 21 मंत्रियों को टिकट दिए जा चुके हैं।
शांति धारीवाल गहलोत कैबिनेट में सीएम के बाद नंबर 2 के मंत्री माने जाते हैं। गहलोत के सबसे खास हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं देना इस बात की पुष्टि करता है।
दूसरा, धर्मेंद्र राठौड़ पहले जिस पुष्कर सीट पर दावेदारी कर रहे थे, वहां नसीम अख्तर इंसाफ को टिकट दिया जा चुका है। अब उनके पास एक ही सीट अजमेर उत्तर बची है।
हालांकि, वहां भी पायलट समर्थक महेंद्र सिंह रलावता की प्रबल दावेदारी है। वहीं, जोशी को लेकर कयास लगने लगे हैं कि वे शायद 2024 के चुनाव में दिख सकते हैं।

3. 124 सीटों पर प्रत्याशी घोषित नहीं करने के पीछे कोई रणनीति है?
भाजपा के प्रभाव वाले इलाकों में कांग्रेस ने सीटों को क्लियर नहीं किया है। यहां पर टिकट कटने पर विरोध का भी डर है।
हाड़ौती को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। यहां 17 सीटों में से कांग्रेस ने केवल 2 पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां 7 और भाजपा ने 10 सीटें जीती थीं। कांग्रेस इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
मेवाड़-वागड़ की 28 सीटों में से कांग्रेस ने केवल 13 पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां 28 में से केवल 11 सीटें ही जीती थी। भाजपा के पास 15 सीटें थीं।
शेखावाटी के सीकर, झुंझुनूं और चूरू में 21 विधानसभा सीटों में से पिछले चुनावों में कांग्रेस ने 16 सीटें जीती थीं। बीजेपी केवल 3 सीटें जीत पाई थीं। एक सीट बसपा और एक निर्दलीय की झोली में गई थी, लेकिन अपनी दो लिस्ट में कांग्रेस ने यहां केवल 8 सीटों पर ही प्रत्याशी घोषित किए हैं।
शेष 8 जीती हुई सीटों पर भी कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित नहीं किए। इसका प्रमुख कारण है कि शेखावाटी में इस बार बीजेपी मजबूती से आगे बढ़ती दिख रही है।
चूरू जिले में बीजेपी के पास पहले से दो सीटें हैं। अब राजेन्द्र राठौड़ के सीट बदलने से तारानगर सीट पर भी मुकाबला कड़ा हो गया है। ऐसे में यहां भी कांग्रेस मजबूत प्रत्याशी उतारना चाहती है।
4. क्या छोटी-छोटी सूची जारी कर कोई टेस्ट किया जा रहा है?
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस 99 उम्मीदवारों को फाइनल कर चुकी है। दो सूचियों में 76 नाम आ गए हैं। तीसरी सूची में 23 नाम होने की संभावना है। भाजपा में दो सूचियों में उपजे विरोध के बाद कांग्रेस बड़ी सूची जारी करने से भी डर रही है। पहली सूची के बाद कोई विरोध नहीं हुआ। हालांकि विरोध इसलिए भी नहीं हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के अलावा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित 5 मंत्री व अन्य दिग्गज नेताओं के नाम शामिल थे। दूसरी सूची में भी विरोध जैसा कुछ नहीं है।

5. कांग्रेस के पहले के सर्वे का क्या? जिनमें विधायकों और मंत्रियों से नाराजगी थी? टिकट कटने की बातों का क्या हुआ?
आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व की ओर से करवाए गए सर्वे में साफ कहा गया था कि 60-70 प्रतिशत सीटों पर लोग स्थानीय विधायक से नाराज हैं। स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं ने सर्वे में कहा था कि विधायकों में अहम आ गया है। मुलाकात आसान नहीं हो रही। साथ ही, तबादलों को लेकर बताए गए काम भी नहीं हो रहे।
सर्वे के बाद प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहले नेताओं के टिकट कटने जैसे कुछ बयान दिए थे, लेकिन दोनों सूचियों को देख कर लग रहा है कि पार्टी ने सॉफ्ट कॉर्नर अपना लिया है।
इसके दो कारण प्रमुख हैं। एक तो पार्टी मौजूदा विधायकों की नाराजगी से दूर रहना चाह रही है, दूसरा यह कि भाजपा को मुद्दा नहीं देना चाह रही कि एंटी इनकम्बेंसी के कारण टिकट काटे जा रहे हैं।
6. क्या इस सूची में भी गहलोत-पायलट दोनों की बराबर चली?
जब से कांग्रेस गहलोत और पायलट खेमों में बंटी नजर आ रही है, तब से ही हर निर्णय को इसी कसौटी पर परखा जा रहा है कि किसकी ज्यादा चली। हां, बिलकुल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों की बराबर चली। दोनों ही नेता अपने अपने गुट के नेताओं का ध्यान रख रहे हैं और भरपूर पैरवी भी कर रहे हैं। गहलोत ने अपने खेमे के कांग्रेसी मंत्री-विधायकों के अलावा निर्दलीय संयम लोढ़ा, बाबूलाल नागर, लक्ष्मण मीणा, खुशवीर सिंह को भी टिकट दिलवाए हैं।
नए चेहरे में पूर्व मुख्य सचिव व सीएम के सलाहकार निरंजन आर्य जैसों के नाम हैं। वहीं, पायलट के गुट के कोटे से मंत्री बने बृजेंद्र ओला, विधायक सुरेश मोदी जैसे नाम भी हैं। पायलट की समर्थक नसीम अख्तर इंसाफ पिछले दो चुनाव हारी थीं, इसके बावजूद उन्हें टिकट दिया है।
पहली सूची में पायलट के समर्थकों में शामिल इंद्राज सिंह गुर्जर, मुकेश भाकर, रामनिवास गावड़िया, विवेक धाकड़ जैसे चेहरों को टिकट मिला था। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गहलोत और पायलट दोनों ही नेताओं ने अपने समर्थकों के टिकट कटने नहीं दिए हैं।

7. निर्दलीयों को टिकट क्यों, पिछले चुनाव में ये कांग्रेस प्रत्याशियों के हार के कारण बने थे?
पिछली बार प्रमुख दावेदारों के टिकट कटे थे और तब उन्होंने बगावत कर चुनाव लड़ा, तो कांग्रेस के प्रत्याशियों को ही हरा दिया। वहीं निर्दलीयों ने जीत के बाद कांग्रेस सरकार को समर्थन दे दिया।
एकाध को छोड़ दें, तो अधिकतर निर्दलीयों की विचारधारा भी कांग्रेस की ही थी। सीएम के सलाहकारों में शामिल बाबूलाल नागर, संयम लोढ़ा की गहलोत से नजदीकियां किसी से छिपी हुई नहीं रही हैं।
सियासी संकट में कांग्रेस सरकार को बचाने में निर्दलीयों ने भी मुख्य भूमिका निभाई थी। गहलोत ने भी इनसे कमिटमेंट किया हुआ था कि अगले चुनावों में पार्टी पूरा ध्यान रखेगी।
8. क्या विधानसभा चुनाव 2018 से पार्टी ने कोई सबक लिया है?
पार्टी ने दोनों ही सूचियों में 76 सीटों पर जिस तरह से अधिकतर पुराने चेहरों को ही रिपीट किया है, उससे लग रहा है कि पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में हुई बगावत को इस चुनाव में फेस नहीं करना चाह रही।
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए 125 से 130 सीटों पर जीत दर्ज करने का अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन बागियों ने 25 सीटों पर कांग्रेस को सीधे नुकसान पहुंचाया था। इनमें 13 निर्दलीय भी शामिल थे, जो पार्टी का बैकअप नहीं होने के बावजूद अपने दम पर जीते थे।
पिछले चुनाव से सबक लेते हुए पार्टी ने इस बार पुराने चेहरों और निर्दलीय विधायकों को अपने साथ रखा है, जिससे विरोध की गुंजाइश से बचा जा सके।
9. नए चेहरों में सबसे अधिक चर्चित दो ही क्यों?
रामेश्वर डूडी जब से कोमा में गए थे, तभी से नोखा की सीट पर सभी की निगाहें थीं। यहां इनकी पत्नी सुशीला डूडी को नए चेहरे के रूप में मौका दिया।
इधर, गहलोत के सलाहकार पूर्व मुख्य सचिव निरंजन आर्य को भी टिकट दिया गया है। ये गहलोत के कट्टर समर्थकों में गिने जाते हैं। पहले इनकी पत्नी को आरपीएससी का सदस्य बनाया और अब सोजत से निरंजन आर्य को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस पहले भी आर्य की पत्नी को सोजत से प्रत्याशी बना चुकी है, लेकिन वे चुनाव हार गई थीं।
10. दूसरी सूची में महिलाओं का कितना प्रतिनिधित्व नजर आ रहा है?
पहली सूची में 33 में 9 महिलाएं शामिल थीं। इस बार 43 की सूची है और 3 महिलाएं ही शामिल हैं। दोनों सूचियों के हिसाब से 76 में से 12 महिलाएं चुनावी मैदान में हैं। यदि प्रतिशत निकाला जाए, तो ये 16 प्रतिशत ही निकलता है।
11. क्या पायलट और गहलोत समर्थक विधायकों के भी टिकट कटे हैं?
8 नेताओं के टिकट कटे हैं, लेकिन गहलोत और पायलट समर्थक मंत्री-विधायकों में से एक का भी टिकट अब तक नहीं कटा है। अन्य नेताओं को देखें तो पायलट के समर्थकों के जरूर टिकट कटे हैं। इनमें बस्सी से दौलत मीणा, दूदू से रितेश बैरवा, सोजत से शोभा सोलंकी व महुवा से अजय बोहरा शामिल हैं।
इन नेताओं ने पिछला चुनाव कांग्रेस से लड़ा था और हार गए थे। गहलोत खेमे के दो लोगों के टिकट कटे, लेकिन वे उन्हीं परिवार को ही मिल गए। गहलोत खेमे की सफिया जुबेर का टिकट काटकर पति वरिष्ठ कांग्रेस नेता जुबेर खान को और रामेश्वर डूडी की जगह पत्नी सुशीला डूडी को टिकट दिया गया।
12. मुस्लिम चेहरों पर कांग्रेस ने कितना फोकस रखा है?
कांग्रेस ने की दोनों ही सूची में 6 चेहरे मुस्लिम वर्ग से हैं। हालांकि, वे प्रबल दावेदारों में ही गिने जा रहे थे। पहली सूची में शामिल दानिश अबरार हों या ताजा सूची में विधायक रफीक खान, अमीन कागजी, जुबेर खान और पिछला चुनाव हारी नसीम अख्तर इंसाफ, इनकी सीटों पर कार्यकर्ताओं से लेकर मतदाताओं तक को लगभग मालूम ही था कि यही चेहरे घोषित किए जाएंगे।