काठमांडू: नेपाल की बालेन शाह सरकार ने भारत की मानसरोवर यात्रा के रूट पर ऐतराज जताया है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच दशकों पुराना लिपुलेख विवाद फिर से सुर्खियों में आ गया है। दरअसल, भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने पर सहमति जताई है। कोविड महामारी के दौरान बंद हुआ रास्ता जून से अगस्त तक फिर खुलने वाला है। बालेन शाह की सरकार का कहना है कि काठमांडू की सहमति के बिना भारत इस यात्रा को आयोजित नहीं कर सकता, क्योंकि लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है।
बालेन शाह के नेतृत्व में आई नेपाल की नई सरकार ने भारत के साथ ही चीन को भी राजनयिक नोट भेजा है और इस बैठक पर आपत्ति जताई है। भारत पहले से ही नेपाल के दावे को खारिज करता रहा है लेकिन दिलचस्प बात है कि चीन ने भी नेपाल की स्थिति को स्वीकार करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।
विश्लेषकों का मानना है कि इसकी वजह नेपाल ही है, जिसने पिछले कुछ सालों में लिपुलेख विवाद पर ऐसे कदम उठाए जिसने यह मामला पर काफी बिगड़ गया है। पूर्व मंत्रियों और राजनयिकों ने नेपाल को इसके लिए लीक से हटकर रचनात्मक कूटनीति पर चलने की सलाह दी है।
भारत-नेपाल के बीच क्या है विवाद?
- इस विवाद की जड़ लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के त्रिकोणीय जंक्शन में है, जो भारत का हिस्सा हैं और उसका नियंत्रण भी है।
- नेपाल इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है और 1816 की सुगौली संधि का हवाला देता है।
- नेपाल का कहना है कि भारत या चीन में से कोई भी उसकी सहमति के बिना लिपुलेख के रास्ते व्यापार या आवागमन नहीं कर सकता।
भारत शुरुआत में बातचीत को था तैयार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआती कार्यकाल में भारत इस पर बात करने को तैयार था। पीएम मोदी ने 2014 में नेपाल यात्रा की, उस दौरान दोनों देशों के विदेश सचिवों को समाधान पर बातचीत का काम सौंपा गया। हालांकि, बाद में ऐसी परिस्थितियां बनीं, जिसके चलते ऐसी एक भी बैठक नहीं हो सकी। फिर मई 2020 में नेपाल की केपी शर्मा ओली की सरकार ने ऐसा कदम उठाया जिससे स्थितियां बिगड़ती चली गईं।
केपी शर्मा ओली ने बिगाड़ी बात
ओली सरकार ने एक नक्शा जारी कर इन तीनों क्षेत्रों को नेपाल की सीमाओं के भीतर दिखाया। संसद ने इस नक्शे को मंजूरी दे दी। इसके बाद जून 2020 में नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन किया जिससे नक्शे को राष्ट्रीय प्रतीक में शामिल किया जा सके। भारत ने इसका कड़ा विरोध किया। प्रदीय ग्यावली उस समय नेपाल के विदेश मंत्री थे।
ग्यावली ने काठमांडू पोस्ट से बातचीत में कहा कि भारत ने नेपाल से कहा था कि वह संविधान में क्षेत्रीय विवाद को शामिल न करे। इसके बदले में राजनीतिक स्तर की बातचीत का प्रस्ताव दिया। ओली सरकार नहीं मानी और संशोधन भारी बहुमत से पारित हो गया। इसके बाद नई दिल्ली ने अपना रुख कठोर कर लिया।
संविधान में शामिल करने से बढ़ा गतिरोध
नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत रंजीत राय का कहना है कि नेपाल के संवैधानिक संशोधन के कारण यह मुद्दा पेचादा हो गया है। अधिकांश एक्सपर्ट का यही मानना है कि इससे स्थिति उस शुरुआती बिंदु से भी बदतर हो गई, जहां से शुरू हुई थी। नेपाल के पूर्व राजनयिक शंभू राम सिमखडा के अनुसार, 2020 से पहले यह विवाद काफी हद तक यथास्थिति वाला था, लेकिन संविधान का हिस्सा बनाने के बाद यथास्थिति पहले वाली हो गई है। कुछ पूर्व नेपाली राजनयिक इसके लिए काठमांडू को ही जिम्मेदार मानते हैं।
चीन भी नेपाल के साथ नहीं
इस विवाद में चीन भी एक पक्ष है और उसके साथ भी नेपाल का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। काठमांडू ने 2015 से बार-बार लिपुलेख के रास्ते व्यापार या आवागमन न करने का अनुरोध किया है, लेकिन बीजिंग वैसा ही कर रहा है। पिछले साल प्रधानमंत्री ओली जब चीन गए तो तियानजिन में शी जिनपिंग के साथ मुलाकात के दौरान इस मुद्दे को उठाया। लेकिन शी ने साफ कहा कि नेपाल को इस मामले को भारत के साथ सुलझाना चाहिए।
उस बैठक में शामिल रहे एक अधिकारी ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि शी ने ओली से कहा, हमें नेपाल के दावे पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस मुद्दे को द्विपक्षीय रूप से ही सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन इस विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहता है। प्रदीप ग्यालवी चीन पर झूठे आश्वासन का आरोप लगाते हैं। उन्होंने कहा कि चीन ने वादा किया था कि वे भारत के साथ कोई नई सहमति नहीं बनाएंगे, लेकिन उनके लिए भारत के साथ संबंध और व्यापार महत्वपूर्ण हो गया। वे समय के साथ नई-नई सहमतियां बनाते रहे हैं।
नेपाल को भारत से रिश्ते सुधारने की जरूरत
पूर्व राजदूत शंभू राम सिमखड़ा नेपाल को भारत के साथ संबंध ठीक करने की सलाह देते हैं। उन्होंने पोस्ट से कहा, हम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक सूझबूझ को समझने में नाकाम रहे, जो इसे सुलझाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारतीय राजनीति और ज्यादा दक्षिणपंथी होती जा रही है, नेपाल को इस जमीनी हकीकत को समझना होगा। सिमखडा ने कहा कि जनवरी 2024 में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्णा समारोह के दौरान अयोध्या जाने जैसा कोई कदम सद्भावना पैदा कर सकता था।











