लखनऊ के शहीद पथ स्थित ओमेक्स आर-2 सोसायटी से पकड़े गए अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। गिरोह के अधिकांश सदस्य ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। कोई छठी पास है तो कोई आठवीं, दसवीं। इंटर से ज्यादा पढ़ा कोई नहीं है।
सभी को अमेरिकी लहजे में अंग्रेजी बोलने की ट्रेनिंग दी गई थी। वो खुद को माइक्रोसॉफ्ट और फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) का अधिकारी बताकर अमेरिकी नागरिकों को झांसा देते थे। इसी तरीके से करोड़ों रुपए की साइबर ठगी को अंजाम दिया जाता था।

हर सफल ठगी पर मिलता 10% कमीशन
क्राइम ब्रांच की जांच के मुताबिक, गिरोह के मास्टरमाइंड अहमदाबाद निवासी यश चंद्र और प्रकाश वर्मा हैं। दोनों विदेश में बैठे नेटवर्क और हवाला के जरिये आने वाले पैसों का लेन-देन करते थे। उनकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है। वहीं, लखनऊ में पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी पुनीत वर्मा और दीपेन पटेल संभाल रहे थे।
जांच में सामने आया कि कॉल हैंडलिंग और ठगी की डील फाइनल करने के लिए कोलकाता से कर्मचारियों को बुलाया गया था। हर सफल ठगी पर उन्हें करीब 10% कमीशन दिया जाता था, जिसे गिरोह के भीतर ‘साइबर क्लोजर’ कहा जाता था।

डॉलर का हिसाब 72-73 रुपए की दर से होता था
पुलिस के अनुसार, ठगी की रकम सीधे बैंक खातों में नहीं आती थी। अमेरिका में मौजूद गिरोह के सदस्य पहले गिफ्ट कार्ड और नकदी के जरिये रकम इकट्ठा करते थे, फिर हवाला नेटवर्क के माध्यम से भारत भेजते थे। डॉलर का हिसाब 72 से 73 रुपए की दर से किया जाता था।

ओमेक्स और समिट बिल्डिंग के कनेक्शन की जांच
क्राइम ब्रांच ने ओमेक्स आर-2 के चार फ्लैटों 1902, 1904, 1301 और 901 में छापेमारी की थी। जांच के दौरान पता चला कि समिट बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 1301 में संचालित संदिग्ध कॉल सेंटर का प्रोग्राम मैनेजर विक्रम सिंह किराये पर रहता था। इसके बाद पुलिस ओमेक्स और समिट बिल्डिंग के बीच संभावित कनेक्शन की गहराई से जांच कर रही है।
डीसीपी क्राइम अनिल यादव ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों में दो छठी पास, एक आठवीं पास, एक दसवीं पास और तीन इंटरमीडिएट तक शिक्षित हैं। गिरोह के फरार सरगनाओं और पूरे नेटवर्क की तलाश में जांच जारी है।











