असहमत लोगों की आवाज दबाने के लिए सभी कानूनों का हो रहा इस्तेमाल

नई दिल्लीः दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने कहा है कि एक्टिविस्ट और असहमत लोगों की आवाज दबाने के लिए सभी तरह के कानूनों को इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई युवा किसी राजनेता का इस्तीफा मांगता है तो उसे लाठियां खानी पड़ती हैं और उसके खिलाफ केस दर्ज करा दिए जाते हैं।

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बोलने की आजादी लोकतांत्रिक गहराई से जुड़ी है

दिवंगत जस्टिस एचआर खन्ना की स्मृति में गोवा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से आयोजित लेक्चर सीरीज में जस्टिस शाह ने यह बात कही। उन्होंने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना कि बोलने और अपनी बात कहने की आजादी लोकतांत्रिक गहराई से जुड़ी है। राजनीतिक चर्चा से लोगों को जानकारी मिलती है और अदालत अपना काम ठीक से कर पाती है। कोर्ट ने लोकतांत्रिक समाज को बनाए रखने के लिए अलग अलग विचारों के महत्व, उनके सम्मान और सहिष्णुता की जरूरत पर जोर दिया है।’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस एपी शाह ने कहा कि आलोचना का सामना करने का सबसे सही तरीका लोगों से बात करना, सामने बोलने वाले की बात पर प्रतिक्रिया देना होता है। लेकिन लगता है कि अपने देश के सियासतदान शायद यह बात भूल चुके हैं।

दुर्भाग्य से, आज एक्टिविस्ट, असहमति रखने वालों और राजनीतिक कार्टूनिस्टों को चुप कराने और परेशान करने के लिए कई तरह के कानूनों और तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर युवाओं का कोई समूह किसी नेता से जवाबदेही की मांग करते हुए उनके इस्तीफे की मांग करता है, तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं या फिर उनके खिलाफ FIR दर्ज करा दिए जाते हैं।
जस्टिस एपी शाह, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस

 

सवाल करने वाले मीडिया हाउस पर क्या बोले?

जस्टिस एपी शाह ने कहा कि यदि कोई मीडिया हाउस सरकार की आलोचना करता है तो उसके खिलाफ टैक्स के केस लाद दिए जाते हैं या फिर जांच पड़ताल शुरू कर दी जाती है। उन्होंने कहा, ‘कहीं और, कोई स्टैंड-अप कॉमेडियन की बात गलत समझ लेता है… यह बहुत आम बात हो गई है। कोई बुरा मान जाता है, और देखते ही देखते कॉमेडियन जेल पहुंच जाता है। यहां तक कि अगर आप ऐसे कॉमेडियन का शो आयोजित करने वाले ऑर्गनाइजर हैं, तो आपको भी जेल में डाल दिया जाता है। बाहर निकलने में हफ्तों, या महीनों भी लग सकते हैं।’ जस्टिस एपी शाह ने अदालतों की भूमिका पर भी बड़ी बात कही।

सड़कें, कोर्टरूम और संसद, किसी भी समाज के पूरक स्तंभ हैं। जजों को हीरो जैसे एक्टिविस्ट बनने की जरूरत नहीं है। उन्हें बस आजादी और निडरता से अपना काम करने पर ध्यान देना चाहिए, साथ ही कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संवैधानिक नैतिकता के प्रति निष्ठा बनाए रखनी चाहिए।
जस्टिस एपी शाह, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस

 

सीजेपी प्रोटेस्ट ने बताया लोकतांत्रिक भावना जिंदा है

देश भर में NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह आंदोलन नीट जैसी जैसी खास परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतों से कहीं आगे की चीज है। उन्होंने कहा कि ये लोकतांत्रिक ऊर्जा के फिर से जागने का प्रतीक हैं। सालों तक कई लोगों का मानना ​​था कि असहमति की आवाज कमजोर पड़ रही है, सिविल सोसाइटी थक चुकी है, राजनीतिक विपक्ष बेअसर है और आलोचना की गुंजाइश हमेशा के लिए खत्म हो गई है। इन युवा नागरिकों ने दिखाया है कि भारत में लोकतांत्रिक भावना अभी भी मजबूती से जिंदा है, विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे। और उनमें पारदर्शिता व जवाबदेही की वाजिब मांगें थीं

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