स्वतंत्रता दिवस पर बड़ा सवाल- किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?

भारत की स्वतंत्रता हमारे लोगों के ब्रिटिश-विरोधी जनसंघर्ष की बहुत बड़ी सफलता थी। आजादी की लड़ाई में सभी धर्मों, जातियों और लिंगों के लोगों और विभिन्न भाषा-भाषियों ने भाग लिया। इस संघर्ष में  स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के मूल्य हमारे मार्गदर्शक थे। भगत सिंह जैसे लोगों ने जाति और वर्ग की सीमाओं के परे सभी लोगों के अधिकारों और आजादियों पर जोर दिया।

Advertisement

अम्बेडकर ने जाति और वर्ण की दीवारें तोड़ने और सभी लोगों की समानता (सामाजिक न्याय) को सर्वाधिक महत्व दिया। और गांधी, जो संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण नेता थे, का जोर बंधुत्व पर था। नए उभरते वर्गों- उद्योगपति, व्यापारी, कामगार, महिलाओं और आदिवासियों- ने इन नेताओं का साथ दिया। ये तीन महानायक आधुनिक राज्य के तीन मुख्य स्तंभों का प्रतिनिधित्व करते थे और उन्होंने स्वाधीन भारत को गहरे तक प्रभावित किया। स्वतंत्रता आंदोलन के यही मूल्य भारतीय संविधान का आधार हैं।

औद्योगिकरण, संचार साधनों के विकास और आधुनिक शिक्षा के चलते सशक्त हुए नए उभरते वर्गों ने एक ऐसे देश का सपना देखा जिसमें समावेशी राष्ट्रवाद के रास्ते शांति और उन्नति सुनिश्चित होगी। मौटे तौर पर देश का वर्गीय विभाजन यही था, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी थे। आधुनिक भारत की पक्षधर इन ताकतों के विरोध में खड़े थे समाज के अस्त होते वर्ग, जिनमें शामिल थे पुराने राजा, नवाब और जागीरदार और समाज का प्रभुत्वशाली तबका जो जाति एवं लिंग पर आधारित ऊंच-नीच के सामंती मूल्यों में आस्था रखता था।

इन वर्गों में पितृसत्तात्मकता जड़ें जमाए हुए थी और वे राजशाही और सामंतशाही के मूल्यों के बोलबाले वाले दौर का यशोगान करते थे। इन वर्गों के ज्यादातर लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया और भारत के प्राचीन ‘‘गौरवशाली अतीत‘‘ का महिमामंडन करते रहे।

उन्होंने आगे बढ़ते हुए भी पीछे जाने की तरकीबें निकाली। ये तरकीबें जमींदारों, राजाओं आदि के जरिए आईं। वे कामगारों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों को आवाज मिलने से भयभीत थे। वे अपने-अपने धर्मों के शासकों और उनके काल के सामाजिक मूल्यों को सर्वश्रेष्ठ बताते थे। मुस्लिम लीग को मुख्यतः नवाबों और जमींदारों का साथ हासिल था, जबकि हिन्दू महासभा-आरएसएस को राजाओं, जमींदारों और पुरोहित वर्गों का समर्थन मिल रहा था।

ये दोनों वर्ग लोकतांत्रिक समाज के उभरते हुए मूल्यों, सभी की आधुनिक शिक्षा तक पहुंच और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के विरोधी थे। ये वर्ग धर्म को राष्ट्र का आधार मानते थे, जिसे सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘‘हिन्दुत्व ऑर हू इज अ हिन्दू‘’ में स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त किया है। ये दोनों प्रवृत्तियां राष्ट्रीय आंदोलन के ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के खिलाफ थीं, जो बहुत दुखद था। धर्म के आधार पर देश का बंटवारा भारतीय राष्ट्रवाद पर सबसे बड़ा आघात था।

संविधान सभा देश की विविधता का प्रतिनिधित्व करती थी। मनुस्मृति का दहन करने वाले अम्बेडकर को संविधान का मसौदा तैयार करने वाली महत्वपूर्ण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान के तैयार होने के कुछ ही समय बाद आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने इस आधार पर संविधान की तीखी आलोचना की कि उसमें मनुस्मृति के प्राचीन मूल्यों को कोई जगह नहीं दी गई है। इन तत्वों ने अंबेडकर और नेहरू की तस्वीरों को जलाया।

स्वतंत्र भारत को गांधीजी के दो पक्के चेलों- नेहरू और पटेल का नेतृत्व मिला। जहां पटेल ने अधिकांश राजे-रजवाड़ों का भारत में सफलतापूर्वक विलय करवाया, वहीं नेहरू ने संविधान के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करते हुए आधुनिक भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु बनाई गई योजनाओं को अमली जामा पहनाया। ‘एक व्यक्ति एक मत‘ के सिद्धांत पर सफलतापूर्वक अमल किया गया और नेहरू की लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता, जो एक तरह से जुड़वां हैं, के प्रति गहन आस्था के चलते देश में लोकतंत्र की जड़ें गहराई तक जम गईं।

नेहरू के आधुनिक शिक्षा (आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि), सार्वजनिक क्षेत्र और सिंचाई के साधनों के निर्माण पर जोर और आरक्षण की नीति पर अमल से एक हद तक समानता कायम हुई। कुछ दशकों पहले भारत और पाकिस्तान की स्थिति की तुलना करने वाले कुछ टिप्पणीकारों का कहना था कि शिक्षा, औद्योगिकरण आदि के क्षेत्रों में भारत की सफलताओं और पाकिस्तान की असफलता के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इसकी एक मुख्य वजह यह थी कि भारत को जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व हासिल था।

पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा ‘आईडिया ऑफ इंडिया‘ कमजोर हुआ है। जो लोग स्वाधीनता आंदोलन में अपने घरों से बाहर नहीं निकले और आजादी की लड़ाई और समावेशिता और समानता के उसके मूल्य का विरोध करते रहे, वे अब देश पर काबिज हैं।

नतीजे में देश का विकास अवरूद्ध हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है जिससे हमारे समाज से बंधुत्व का भाव गायब हो रहा है। हाल में परीक्षा प्रणाली की असफलता के मुद्दे पर चलाए गए आंदोलन की सफलता ने निश्चित तौर पर वर्तमान सरकार के अहंकार को कुछ हद तक तोड़ा है मगर हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों की दिशा और उनके लक्ष्य अब भी वही हैं। हमारे देश की प्रजातांत्रिक आत्मा और भारतीय संविधान के मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए एक कठिन और लंबे संघर्ष की जरूरत है।

संघ ने समाज में नफरत के बीज बो दिए हैं। उसने राज्यतंत्र के सभी हिस्सों में घुसपैठ कर ली है। संघ की सरकारों की नीतियों के कारण जो असंतोष पैदा हो रहा था उसने हाल में कॉकरोच आंदोलन का स्वरूप ले लिया। इस आंदोलन से यह सुनिश्चित हुआ कि ‘‘निर्वाचित तानाशाह’’ सरकार का डर कुछ समय के लिए ही सही मगर कम हुआ। मगर आरएसएस के कुनबे ने देश को जो गहरे घाव दिए हैं उन्हें भरने में वक्त लगेगा। उन्होंने देश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया है।

हमें हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध इस सरकार की जगह भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित सरकार चाहिए। नफरत फैलाने वाले झूठे नैरेटिव ने हमारी सामूहिक सोच पर कब्जा जमा लिया है। उनका मुकाबला उन नैरेटिव से किया जाना चाहिए जो भारतीयों के बीच सदियों से व्याप्त प्रेम, भाईचारे और दोस्ताना संबंधों पर आधारित हों, उन नैरेटिव से जिन्हें सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित नेहरू ने भारतीयों के मानस में बिठाने का प्रयास किया था। जंतर मंतर में पिछले दिनों जो हुआ वह भारत की सदियों पुरानी सभ्यता को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहला कदम था। इसी पुनर्जीवन से हमें दुनिया के देशों में अपना उचित स्थान हासिल होगा।

अल्पसंख्यकों के साथ ‘समान नागरिक’ के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। सरकार की तानाशाही खत्म होनी चाहिए और हमें तार्किक और वैज्ञानिक आधारों पर राष्ट्र निर्माण का काम फिर से शुरू करना चाहिए। जंतर मंतर एक शुरूआत भर है। गांधी और अंबेडकर, भगत सिंह और सुभाष बोस, मौलाना आजाद और सरदार पटेल के सपनों को पूरा करने के लिए हमें अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here