क्या सिर्फ सर्वगुणसम्पन्न मेला बन गए हैं दीक्षान्त समारोह !

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किसी भी शैक्षणिक संस्थान का सबसे महत्वपूर्ण समारोह दीक्षांत समारोह होता है। विश्वविद्यालय एक शिक्षा का संस्थान है जहां पर विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है, उच्चतम शिक्षा दी जाती है । विश्वविद्यालय के लिए शोध कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। यह शोध कार्य करने के लिए शोधार्थी  मेहनत करते हैं और शोध के माध्यम से नए विचार लाते हैं जो देश की समृद्धि और विकास के लिए बहुत अच्छा होता है ।

विगत वर्षों में देखा गया है कि दीक्षांत समारोह में  डिग्री प्राप्तकर्ता विद्यार्थियों को कम से कम संख्या में बुलाया लाया जाता है या केवल जिनको गोल्ड मेडल मिलता है उन्हीं को बुलाया जाता और कहा जाता है कि बहुत भीड़ हो जाती है। इसके लिए कितनों को बुलाएं,  उसके लिए समाधान होने चाहिए, लेकिन यह नहीं उसकी जगह स्कूल के बच्चों को बुलाएं, उनके संबंधित व्यक्ति को बुलाएं और फिर एक आंगनबाड़ी  का कार्यक्रम करें।

आप सब जानते हैं कि दीक्षांत समारोह एक नियम, कानून और एक्ट के तहत होता है । प्रश्न यह उठता है कि जब दीक्षांत कार्यक्रम के दौरान आंगनबाड़ी कार्यक्रम हो रहा है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या कुलाधिपति जिम्मेदार है? क्या जितने भी विश्वविद्यालय से संबंधित प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक या विद्यार्थी जिम्मेदार हैं? इस बात का जवाब स्वयं विश्वविद्यालय अपने आप में ढूंढेगा तब इसका समाधान लगेगा।

विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को एक गरिमामाय अकादमिक समारोह बनाना चाहिए ना कि एक सर्व संपन्न मेला या मनोरंजन का स्थान बनाना चाहिए। यह एक मनोरंजन का स्थान नहीं है। यह एकेडमिक का स्थान है। यहां दीक्षांत समारोह का महत्व होना चाहिए क्योंकि दीक्षांत समारोह उत्सव से भरा होता है, उल्लास से भरा होता है जो कि आने वाले समय में विद्यार्थियों को भी प्रशासन से जोड़ता है, विद्यार्थियों को भी विश्वविद्यालय से जोड़ता है।

जब तक विद्यार्थी, कर्मचारी और अधिकारी विश्वविद्यालय को अपना संस्थान ही समझेंगे तभी भी किसी भी विश्वविद्यालय का उन्नति नहीं हो सकती और भारतीय संस्कृति में यह है कि शिक्षा का सम्मान होना चाहिए, शिक्षक को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसी भी ऐसे कार्यक्रम को आंगनबाड़ी कार्यक्रम करना है, सम्मानित करना हैतब विश्वविद्यालय ने जिन गांव को गोद लिया उनका सम्मान करना चाहिए लेकिन वह सम्मान जिस प्रकार से विभिन्न विश्वविद्यालयों में एक सप्ताह का दीक्षांत समारोह मनाया जाता है तो उसी दीपोत्सव में यह कार्यक्रम करने चाहिए ।

मैं अपनी ओर से सभी प्रशासनिक अधिकारियों , विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों को इस बात का विनम्र अनुरोध करता हूं कि इस विषय को गंभीरता से सोचें और इसको एक विस्तृत चर्चा का विषय बनाएं और दीक्षांत समारोह को महज़ औपचारिकता या दिखावे का उत्सव बनाने के बजाय उसकी मूल अकादमिक गरिमा, पवित्रता और छात्र-केंद्रित स्वरूप को हर हाल में पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।

समाधान और सुधार की दिशा में निम्नलिखित बिंदुओं पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है:

दीक्षांत समारोह का वास्तविक अकादमिक स्वरूप छात्रों की प्रत्यक्ष भागीदारी: दीक्षांत समारोह केवल कुछ चुनिंदा स्वर्ण पदक विजेताओं (Gold Medalists) तक सीमित न रहकर, अपनी कठिन मेहनत और शोध कार्यों को पूरा करने वाले समस्त शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए गौरव का क्षण होना चाहिए।

भीड़ प्रबंधन के व्यावहारिक विकल्प: यदि संख्या अधिक होने पर प्रबंधन की समस्या आती है, तो इसका प्रबंधन करना चाहिए ।

विश्वविद्यालयों द्वारा सप्ताह भर मनाए जाने वाले ‘दीक्षोत्सव’ के दौरान सामाजिक सरोकार के कार्यक्रम (जैसे गोद लिए गए गाँवों का सम्मान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आदि) स्वागत योग्य हैं, किंतु इन्हें मुख्य दीक्षांत समारोह के मुख्य आकर्षण को विस्थापित नहीं करना चाहिए। इन गतिविधियों को उत्सव के अन्य दिवसों पर आयोजित किया जाना चाहिए।

 जब तक विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक और विद्यार्थी इस संस्थान को केवल नौकरी या पढ़ाई का स्थान न मानकर अपना स्वयं का परिवार और मंदिर समझेंगे, तब तक संस्था उन्नति नहीं कर सकती। दीक्षांत समारोह इसी भावनात्मक और अकादमिक जुड़ाव को मजबूत करने का सबसे बड़ा सेतु है।

यह समय आत्ममंथन का है कि हम अपनी गौरवशाली परंपराओं को व्यावसायिकता या दिखावे की भेंट न चढ़ने दें, बल्कि विश्वविद्यालयों को सच्चे अर्थों में ज्ञान, विवेक, शोध और अकादमिक उत्कृष्टता का सर्वोच्च केंद्र बनाए रखें।

(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और कानपूर, गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे हैं)

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