दुनिया की खतरनाक उमस भरी गर्मी का आधा बोझ अकेले भारत पर

नई दिल्ली। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (IITM) और गुवाहाटी यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में पाया गया है कि खतरनाक नमी वाली गर्मी के संपर्क में आने के मामले में भारत दुनिया का सबसे ज्यादा प्रभावित देश बनकर उभरा है।

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‘जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: एटमॉस्फियर्स’ में प्रकाशित इस स्टडी में 1950 से 2020 तक के वैश्विक डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर (WBGT) और ह्यूमिडेक्स का इस्तेमाल किया गया। स्टडी में 33°C से ज्यादा WBGT को बहुत ज्यादा नमी वाली गर्मी माना गया है, जो हीट स्ट्रेस का बेहद खतरनाक स्तर है।

IITM के वैज्ञानिक सुबोध कुमार साहा ने बताया, वैश्विक स्तर पर ऐसी गर्मी के संपर्क में आने की दर 1950 के दशक की शुरुआत से लगभग 16 गुना बढ़ी है। यह 12 बिलियन पर्सन-आवर से बढ़कर 2020 के दशक में करीब 195 बिलियन पर्सन-आवर हो गई है। भारत में यह बढ़ोतरी करीब 19 गुना है, जो वैश्विक बढ़ोतरी का लगभग आधा हिस्सा है।

रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक 33°C से ज्यादा WBGT के संपर्क में रहने से, खासकर शारीरिक काम के दौरान, सेहत और जान को गंभीर खतरा हो सकता है।

कामकाजी लोगों पर सबसे ज्यादा असर

स्टडी में संभावित व्यावसायिक उत्पादकता नुकसान (POPL) की भी जांच की गई। इसमें पाया गया कि भारत की कामकाजी उम्र की आबादी का नमी वाली गर्मी से संपर्क तेजी से बढ़ा है।

1950 के दशक में यह संपर्क सालाना करीब 12 आठ-घंटे के कार्य-दिन के बराबर था, जो 2020 के दशक में बढ़कर लगभग 65 कार्य-दिन हो गया।

उत्तर-पश्चिम भारत में तेजी से बढ़ा अनुभव

सुबोध कुमार साहा ने बताया, दिल्ली समेत उत्तर-पश्चिम भारत में नमी वाली भीषण गर्मी का अनुभव तेजी से बढ़ रहा है। असल तापमान 45°C से नीचे रहने के बावजूद, तापमान और नमी का असर 45°C के करीब पहुंच रहा है।

शोधकर्ताओं ने 1980 के दशक में इस बढ़ोतरी में अचानक और तेज बदलाव पाया। इसे बढ़ते तापमान, इंडो-पैसिफिक वार्म पूल में बदलाव और आबादी में वृद्धि से जोड़ा गया। 1950 के बाद भारत की कामकाजी उम्र की आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी है।

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