संजय सक्सेना,लखनऊ,
वरिष्ठ पत्रकार
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बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने एक बार फिर अपने सबसे भरोसेमंद युवा चेहरे आकाश आनंद पर दांव खेला है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के शंखनाद के रूप में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले की सादाबाद सीट पर आयोजित पार्टी कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने जिस आक्रामक अंदाज में वापसी की, उसने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
कुछ समय के राजनीतिक वनवास और मायावती द्वारा किनारे किए जाने के बाद राष्ट्रीय समन्वयक की भूमिका में लौटे आकाश इस बार अधिक परिपक्व, सधे हुए और रणनीतिक रूप से तीखे नजर आए। उन्होंने भाजपा, सपा और कांग्रेस तीनों को एक ही तराजू में तौलते हुए बहुजन समाज के सामने उन्हें जनविरोधी नीतियों वाली ताकतों के रूप में पेश किया। लेकिन इस जनसभा की सबसे बड़ी गूंज किसी नीतिगत घोषणा से नहीं, बल्कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव के लिए इस्तेमाल किए गए एक शब्द से हुई‘अंकल’।
आकाश आनंद ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को ‘भैया’ कहने से इनकार करते हुए कहा कि युवा पीढ़ी के लिए वे ‘अंकल’ हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव लंबे समय से मायावती को ‘बुआ जी’ कहकर संबोधित करते रहे हैं। आकाश ने उसी रिश्ते की राजनीतिक भाषा को पलटते हुए खुद को ‘भतीजे’ की अगली पीढ़ी और अखिलेश-राहुल को पुरानी पीढ़ी के नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की।
हमला उम्र से ज्यादा राजनीतिक ब्रांडिंग पर था।आकाश आनंद की नई राजनीति यहीं दिखाई देती है। लगभग तीस वर्ष की उम्र में वह खुद को ऐसे नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जो युवाओं से उनकी भाषा में बात कर सके। पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं का संकट, महंगी शिक्षा और भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसे सवाल आज उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ‘अंकल’ वाला तंज इसी रणनीति का प्रचारयोग्य हिस्सा है।
बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ भाजपा या समाजवादी पार्टी नहीं, बल्कि उसका अपना सिकुड़ता हुआ सामाजिक आधार है। 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतिहास रचा था। दलित आधार के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़कर बनाई गई वह रणनीति बसपा की सबसे बड़ी चुनावी सफलता बनी। लेकिन 2012 के बाद पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गया।
2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा 19 सीटों पर सिमट गई, जबकि उसका वोट शेयर लगभग 22 प्रतिशत रहा। 2022 में स्थिति और खराब हुई, जब पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर लगभग 12.8 प्रतिशत रह गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला। यह परिणाम संगठन और सामाजिक गठजोड़ के संकट का संकेत था।इस संकट का सबसे बड़ा राजनीतिक असर दलित वोटों के भीतर दिखाई दिया।
खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने दलित युवाओं के बीच एक आक्रामक और प्रतिरोध की राजनीति वाली छवि बनाई। लोकसभा चुनाव में उनकी सफलता ने यह संकेत दिया कि बसपा का पारंपरिक वोट बैंक अब हमेशा अपने पुराने नेतृत्व के साथ स्वतः नहीं रहने वाला। हाथरस जैसे क्षेत्र में पहली बड़ी सभा करना इस बात का संकेत है कि बसपा दलित युवाओं के बीच अपनी जमीन पर सीधी लड़ाई लड़ना चाहती है।
2024 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान आकाश के कुछ आक्रामक बयानों के बाद मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी की भूमिका से हटा दिया था। चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि बिना युवा चेहरे के वह नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचेगी। इसी दबाव ने आकाश की वापसी की जमीन तैयार की। इस बार उन्हें आक्रामकता के साथ अनुशासन का संतुलन साधना होगा। मायावती ने उन्हें मैदान में उतरने की जिम्मेदारी दी है।
2027 के लिए बसपा की रणनीति का पहला लक्ष्य अपने कैडर को फिर से सक्रिय करना है। पार्टी जानती है कि केवल सोशल मीडिया या बड़ी रैलियों से चुनाव नहीं जीते जा सकते। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता, सेक्टर कमेटियां और मतदाता संपर्क उसका असली आधार हैं। इसलिए संगठन को नई ऊर्जा देने के लिए युवाओं को अधिक जिम्मेदारी देने की कोशिश की जा रही है।
आकाश सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान और नई राजनीतिक भाषा के जरिए बसपा की पारंपरिक छवि को बदलने की कोशिश कर सकते हैं। सफल होने पर पार्टी का संदेश पुराने कैडर से आगे जाएगा।दूसरी बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण है। लोकसभा चुनाव में सपा ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ को अपनी राजनीति का केंद्रीय आधार बनाया। बसपा के लिए यह सीधी चुनौती है, क्योंकि दलित वोट उसके सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार रहे हैं।
आकाश आनंद का सपा पर हमला केवल अखिलेश यादव पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है। इसके पीछे संदेश है कि दलित प्रतिनिधित्व का वास्तविक अधिकार बसपा के पास है।कांग्रेस भी बसपा की रणनीति में महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी है। राहुल गांधी के संविधान, सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़े अभियान ने विपक्षी राजनीति में नई जगह बनाई है। ‘अंकल’ कहना उनके राजनीतिक आकर्षण को चुनौती देने की कोशिश है। संदेश साफ है नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व जमीन पर संगठन और बहुजन मुद्दों के साथ खड़े होने से तय होगा।
लेकिन असली परीक्षा भाषण के बाद शुरू होगी। बसपा के सामने तीन मोर्चे एक साथ हैं वोटरों का भरोसा लौटाना, संगठन को बूथ तक मजबूत करना और यह धारणा बदलना कि पार्टी चुनावी मुकाबले में कमजोर पड़ चुकी है। आकाश आनंद की लोकप्रियता तभी राजनीतिक पूंजी बनेगी, जब वह नियमित जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों और मजबूत उम्मीदवारों के जरिए दिखाई दे।मुस्लिम-दलित समीकरण भी बसपा की संभावित रणनीति का अहम हिस्सा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दोनों समुदायों के बीच राजनीतिक दूरी कम करने की कोशिश पार्टी के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। बसपा को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ तीसरा विकल्प नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की वास्तविक ताकत बन सकती है। इसके लिए संगठन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर मेहनत करनी होगी।इसलिए हाथरस से निकला ‘अंकल’ वाला संदेश केवल एक वायरल बयान मानना राजनीतिक भूल होगी। यह बसपा की पीढ़ीगत राजनीति बदलने की कोशिश है।
मायावती अपने अनुभव और नियंत्रण के साथ पार्टी की रीढ़ बनी रहना चाहती हैं, जबकि आकाश आनंद को नई पीढ़ी का चेहरा बनाया जा रहा है। भाजपा के मजबूत संगठन, सपा के पीडीए और कांग्रेस के संविधान वाले विमर्श के बीच बसपा को अपनी अलग जगह बनानी है। 2027 में उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सीटों की संख्या से पहले यह होगा कि क्या वह अपने बिखरे हुए सामाजिक आधार को फिर से एक राजनीतिक पहचान दे सकती है।
यही 2027 में बसपा की वापसी की असली कसौटी होगी। अगर आकाश आनंद युवाओं, दलितों और बहुजन समाज के बीच भरोसा पैदा करने में सफल होते हैं, तो ‘अंकल पॉलिटिक्स’ एक जुमले से आगे बढ़कर बसपा की चुनावी रणनीति का हथियार बन सकती है।













