अजय कुमार,
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ ( उ. प्र.)
मो-9335566111
उत्तर प्रदेश में चुनाव अभी आया नहीं है, लेकिन राजनीति ने मतदाताओं की जातियां गिननी शुरू कर दी हैं। नेताओं के पास बेरोजगारी का आंकड़ा हो या न हो, महंगाई का हिसाब हो या न हो, स्कूलों और अस्पतालों की हालत पर जवाब हो या न हो, लेकिन किस जाति की कितनी आबादी है, किस सीट पर कौन-सा समीकरण बैठेगा और किस समाज को कौन-सा नारा सुनाना है इसका हिसाब खूब तैयार है।
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यही उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। पांच साल सरकार चलाने के बाद भी चुनाव आते-आते जनता नागरिक नहीं रहती, जातियों का जोड़ बन जाती है।2027 के विधानसभा चुनाव में 403 सीटों का मैदान है। 2022 में भाजपा ने 255 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत लिया था और समाजवादी पार्टी 111 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनी थी। बसपा सिर्फ एक सीट पर सिमट गई, लेकिन उसके खाते में 12.88 प्रतिशत वोट फिर भी रहे। यानी हाथी हार गया था, लेकिन उसकी परछाईं पूरी तरह गायब नहीं हुई थी।
यही परछाईं अब हर राजनीतिक दल को डराती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर कुछ हजार वोट किसी की सरकार बना सकते हैं और किसी की राजनीतिक दुकान बंद कर सकते हैं।2024 ने सत्ता के आत्मविश्वास में पहली बड़ी दरार दिखाई। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में भाजपा 33 पर रह गई, जबकि सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई और कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। यह परिणाम सत्ता के लिए सिर्फ सीटों की कमी नहीं था। यह चेतावनी थी कि जिसे स्थायी वोट बैंक समझ लिया गया है, वह उतना स्थायी नहीं है। मतदाता को हमेशा एक ही खाने में रखकर राजनीति करने का भरोसा 2024 में टूट चुका है।
अब सत्ता की रणनीति को समझिए। चुनावी राजनीति में जब विकास की भाषा कमजोर पड़ती है तो जातीय प्रतिनिधित्व की भाषा तेज हो जाती है। मंत्री कौन बना, संगठन में किस जाति को कितनी जगह मिली, किस समाज का सम्मेलन हुआ, किस नेता ने किस महापुरुष की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया ये सब अचानक राजनीतिक उपलब्धियां बन जाते हैं। जनता से पूछा जाना चाहिए कि पांच साल में उसके जीवन में क्या बदला, लेकिन चुनावी मौसम में उससे पूछा जा रहा है कि वह किस जाति के साथ खड़ा है।
यही वह जगह है जहां विपक्ष सत्ता को घेर सकता है, लेकिन विपक्ष खुद भी उसी जाल में फंसा हुआ है। समाजवादी पार्टी अब ‘पीडीए’ में पंडितों के लिए जगह तलाश रही है। यानी जो राजनीति कभी पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की एकजुटता का दावा कर रही थी, अब उसे ब्राह्मणों तक विस्तार देना पड़ रहा है। यह विस्तार अगर सामाजिक न्याय की वास्तविक राजनीति है तो स्वागत योग्य है, लेकिन अगर यह केवल चुनावी गणित है तो जनता को यह फर्क समझने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।क्योंकि ब्राह्मण को सम्मान का पोस्टर दिखाना आसान है, लेकिन उसे सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी देना कठिन।
पासी को सम्मेलन में बुलाना आसान है, लेकिन उसके गांव में रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा पहुंचाना कठिन। दलित महापुरुषों की प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाना आसान है, लेकिन दलित परिवार को यह भरोसा देना कठिन है कि सरकारी व्यवस्था उसके खिलाफ खड़ी नहीं होगी। राजनीति में नारे सस्ते होते हैं, शासन महंगा।बसपा इस खेल की सबसे पुरानी खिलाड़ी है। कांशीराम ने जिस भाषा में राजनीतिक बहुजन को संगठित किया, मायावती ने समय के साथ उसी भाषा को सोशल इंजीनियरिंग में बदला।
कभी ‘तिलक, तराजू और तलवार’ सत्ता-विरोधी आक्रोश की पहचान बना, तो बाद में ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ उसी पार्टी के सामाजिक विस्तार का प्रतीक बन गया। 2007 में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। लेकिन 2022 में वही पार्टी सिर्फ एक सीट पर पहुंची। इतिहास का यह व्यंग्य बहुत साफ है जातीय नारा सरकार बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन सरकार बचाने के लिए सिर्फ नारा काफी नहीं होता।
और अब इस पुराने खेल में चिराग पासवान की लोजपा-रामविलास भी उतर रही है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों को ध्यान में रखकर संगठन विस्तार की तैयारी शुरू की है। अरुण भारती का ‘पंडित-पासी-पासवान’ नारा इस रणनीति को और स्पष्ट करता है। बिहार की राजनीतिक पहचान रखने वाली पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने लिए जमीन खोज रही है और उसकी शुरुआत जातीय सामाजिक गठजोड़ की भाषा से हो रही है।इसमें भाजपा के लिए भी एक असहज सवाल छिपा है। लोजपा-रामविलास एनडीए का सहयोगी है।
ऐसे में अगर वह उत्तर प्रदेश की हर सीट पर अपना संगठन खड़ा करने और चुनाव लड़ने की बात करती है तो इसे केवल विस्तार की सामान्य कवायद मानना भोलेपन जैसा होगा। सहयोगी दल चुनाव में जितने बड़े होते हैं, सीट बंटवारे की मेज पर उनकी आवाज उतनी तेज होती है। और अगर वे अलग-अलग सामाजिक समूहों में अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो मुख्य दल के सामने सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, वोटों के हस्तांतरण का भी होता है।
भाजपा की समस्या यह है कि 2024 के बाद उसे यह साबित करना होगा कि उसका सामाजिक गठबंधन अभी भी उतना ही मजबूत है। सपा की समस्या यह है कि उसे साबित करना होगा कि उसका पीडीए केवल चुनावी संक्षिप्त नाम नहीं है। बसपा की समस्या यह है कि उसे अपने पुराने वोट आधार को फिर से राजनीतिक शक्ति में बदलना होगा। कांग्रेस की समस्या यह है कि उसे गठबंधन की सीटों से आगे अपना स्वतंत्र संगठन खड़ा करना होगा।
और छोटे दलों की समस्या यह है कि पोस्टर लगाने और वोट दिलाने के बीच जमीन-आसमान का फर्क होता है।उत्तर प्रदेश का मतदाता अब सिर्फ जाति नहीं देखता। वह जाति के साथ उम्मीदवार भी देखता है, उम्मीदवार के साथ स्थानीय काम भी देखता है और स्थानीय काम के साथ सरकार की विश्वसनीयता भी। आज का युवा जाति की पहचान के साथ नौकरी का सवाल भी लेकर चलता है। किसान जातीय पहचान के साथ फसल और लागत का हिसाब भी पूछता है। शहर का मतदाता धार्मिक पहचान के साथ महंगाई और रोजगार पर भी सोचता है। यानी राजनीति जितनी पुरानी है, मतदाता उतना पुराना नहीं रहा।
यही सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर सरकार चुनाव को सिर्फ जातीय सम्मेलन, नारों और प्रतिनिधित्व के आंकड़ों में बदल देती है तो वह असली सवालों से बच तो सकती है, उन्हें खत्म नहीं कर सकती। पांच साल बाद जनता को फिर से यह बताना पड़ेगा कि किस जाति का मंत्री कितना है, तब सवाल उठेगा कि उस जाति के बेरोजगार युवक को मिला क्या?विपक्ष के लिए भी रास्ता आसान नहीं है।
सत्ता की आलोचना करना सबसे आसान राजनीतिक काम है। कठिन यह बताना है कि सत्ता में आने के बाद वह क्या अलग करेगा। अगर विपक्ष भी वही जातीय कैलकुलेटर लेकर बैठ गया, केवल जातियों के नाम बदल दिए और नारों की भाषा बदल दी, तो जनता के सामने दो विकल्प नहीं होंगे दो संस्करण होंगे उसी राजनीति के।2027 का उत्तर प्रदेश इसलिए असली परीक्षा नारों की नहीं, नीयत की करेगा। ‘पंडित-पासी-पासवान’ हो या पीडीए, हिंदुत्व हो या सामाजिक न्याय हर नारा अंततः वोट की मशीन में जाकर आंकड़ा बनेगा।
और आंकड़ा ही बताएगा कि किसने जाति को सम्मान दिया और किसने जाति को सिर्फ चुनावी टिकट समझा।सत्ता को यह भ्रम छोड़ना होगा कि हर चुनाव पिछले चुनाव की कॉपी है। विपक्ष को यह भ्रम छोड़ना होगा कि सत्ता-विरोध अपने आप सत्ता में बदल जाता है। 2024 ने भाजपा को चेताया है, लेकिन विपक्ष को भी कोई खाली चेक नहीं दिया है।उत्तर प्रदेश में अब जातियों की गिनती से ज्यादा आकांक्षाओं की गिनती होगी।
जिस दिन मतदाता ने चुनावी मंच से उतरकर अपने घर की चौखट पर सवाल पूछ लिया नारा बहुत सुन लिया, अब हिसाब बताओ उस दिन जातीय राजनीति के सबसे बड़े उस्तादों की भी परीक्षा शुरू हो जाएगी। और शायद 2027 की असली लड़ाई यही होगी: कौन जनता को फिर जाति में बांटता है और कौन उसे नागरिक मानकर वोट मांगता है।