नरक की ओर जाते रास्ते: ‘टोल’ की मोटी कमाई, पर सड़कों पर मौत के कुएं!

इसी साल 13 जुलाई को 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन बीजेपी के तीन दिग्गजों-उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी-द्वारा बड़े धूमधाम से किया गया था। लेकिन तेरह दिन बाद ही, यानी 26 जुलाई को ही 4,300 करोड़ रुपये की लागत से बने इस एक्सप्रेस-वे पर दरारें उभर आईं।

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मूसलाधार बारिश ने डामर की परत उखाड़ फेंकी और सड़क धंस गई। गीले हिस्सों को सुखाने के लिए पेडस्टल पंखे लगाए गए। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने आनन-फानन में कई ‘सुधारात्मक कदम’ उठाए: मरम्मत पूरी होने तक टोल वसूली रोक दी गई, निर्माण कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक और तीन प्रोजेक्ट इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया।

सोशल मीडिया पर आए वीडियो नुकसान की भयावहता दिखा रहे थे, जहां भारी मशीनें लगातार काम में जुटी थीं और सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सों में यातायात को एक ही लेन तक सीमित कर दिया गया था। एक परेशान यात्री ने कहा, ‘जब हर रोज हमारी जान जोखिम में पड़ रही है, तो टोल वसूली रोकने या इस परियोजना की विफलता की जांच के लिए आईआईटी खड़गपुर को बुलाने का क्या फायदा?’

6 अगस्त 2026 को उधमपुर-चेनानी सेक्टर में चार लेन वाले जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग के दरमथल-देवल हिस्से पर भारी भूस्खलन से यातायात ठप हो गया। जाम में फंसे बारामूला के फल व्यापारी गुलाम अली ने सवाल उठाया, ‘जब हम एक ही लेन का इस्तेमाल कर सकते हैं, तो चार लेन का क्या फायदा?’

17 अगस्त को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 36,000 करोड़ रुपये की लागत वाले 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन के महज साढ़े तीन महीने बाद, उसमें दस मीटर गहरा गड्ढा हो गया। वहीं 12,000 करोड़ रुपये की लागत से बना 213 किलोमीटर लंबा दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे, जिसके बारे में दावा किया गया था कि इसमें अत्याधुनिक जापानी तकनीक का इस्तेमाल हुआ है जो 100 साल से ज्यादा चलेगी, महज दो महीने में ही धंसने लगा और गड्ढों में तब्दील हो गया।

प्रधानमंत्री को टैग करते हुए एक यात्री ने ‘एक्स’ (ट्विटर) पर लिखा, ‘यह दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे है, जिसका उद्घाटन आपके द्वारा (19 अप्रैल को) किया गया था… इसे बनने में करीब पांच साल लगे, लेकिन पहली बारिश भी नहीं झेल पाया। इसकी दयनीय स्थिति देखिए। लोग एक्सप्रेस-वे के बीच में खड़े होकर तेज रफ्तार गाड़ियों को इन बड़े गड्ढों से सचेत करने को मजबूर हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं। भारी टोल वसूलने के बावजूद निजी ठेकेदार कैसी सड़क बना रहे हैं?’

तीर्थयात्रियों की यात्रा सुगम बनाने के नाम पर गढ़वाल के संवेदनशील पहाड़ी रास्तों को 12 मीटर चौड़े डबल लेन हाईवे में बदलने वाली 890 किलोमीटर की बहुप्रचारित ‘चार धाम परियोजना’ को भूस्खलन के खतरों को लेकर विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद आगे बढ़ाया गया। भूस्खलन के स्थानों को मैप करने के एक हालिया सर्वेक्षण में पाया गया कि ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर लगभग हर दो किलोमीटर पर भूस्खलन होता है।

डायनामाइट के अंधाधुंध इस्तेमाल से होने वाले भू-धंसाव के कारण न केवल धार्मिक पर्यटक, बल्कि स्थानीय लोग भी गंभीर खतरे में हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां कभी बरसात के मौसम का मतलब पत्थरों का मामूली गिरना और कभी-कभार भूस्खलन हुआ करता था, वहीं अब ऐसा लगता है मानो पूरे के पूरे पहाड़ ही ढह रहे हैं।

एक और ‘शानदार प्रोजेक्ट’ कहे जाने वाले मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेस-वे को भी लगातार देरी का सामना करना पड़ा है, जिसमें घटिया निर्माण बड़ी चिंता है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को ठेकेदारों के खिलाफ तब कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा, जब एक वायरल वीडियो में पैकेज 9 के पास नवनिर्मित हिस्से पर सड़क के अप्रत्याशित रूप से धंसे होने के कारण कारें हवा में उछलती और जमीन पर गिरकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त होती दिखीं।

फरवरी 2026 में एक कैरिजवे खुलने के बाद, अधिकारियों ने क्रमशः 4 किमी और 3 किमी के दो हिस्सों में सड़क की सतह की खराबी (जिसमें गड्ढे और दरारें शामिल हैं) की पहचान की, जिससे परियोजना की गुणवत्ता और निगरानी पर नए सवाल खड़े हो गए। इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया थी: ‘सड़क की सतह को समतल करने, ड्राइविंग की गुणवत्ता सुधारने और सुरक्षित और निर्बाध यातायात सुनिश्चित करने के लिए प्रभावित हिस्सों पर माइक्रो-मिलिंग का काम किया जा रहा है।’

अटल बिहारी वाजपेयी सेवरी-न्हावा शेवा अटल सेतु, जिसे मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के नाम से जाना जाता है, का क्या हाल है? ‘देश का सबसे लंबा समुद्री पुल’ नवी मुंबई में उल्वे की ओर जाने वाले निकास मार्ग पर दरारें दिखाई देने के बाद जांच के घेरे में है।

केरला में, राज्य के सबसे व्यस्त राजमार्ग गलियारों में से एक, 17 किलोमीटर लंबे एडप्पल्ली-अरूर एनएच 66 बाईपास के किनारे सर्विस रोड की खस्ताहाल स्थिति को लेकर एनएचएआई को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सा – एडप्पल्ली ओवरब्रिज से एडप्पल्ली जंक्शन और पलारीवट्टोम – और भी खराब हो गया है क्योंकि एनएचएआई का फ्लाईओवर-सह-अंडरपास प्रोजेक्ट एक साल से अधिक समय से घिसट रहा है।

एक वरिष्ठ ट्रैफिक पुलिस अधिकारी ने एनएचएआई से कहा, ‘टोल वसूलने वाली एजेंसी ने मरम्मत का काम नहीं किया, जबकि मुख्य मार्ग पर बने गड्ढों और वैटिला रेलवे ओवरब्रिज पर असमान विस्तार जोड़ों के कारण भारी ट्रैफिक जाम लग रहा है। यहां तक कि पलारीवट्टोम फ्लाईओवर के ऊपर भी गड्ढों की भरमार है।’

नितिन गडकरी ने दावा किया था कि ‘अंतरिक्ष तकनीक’ की मदद से भारत की सड़कें 2024 तक अमेरिका जैसी हो जाएंगी। 2014 के बाद से, उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के 0.91 लाख किमी से बढ़कर 1.46 लाख किमी तक विस्तार की निगरानी की है। जाहिर तौर पर, ये हाई-स्पीड हाईवे कॉरिडोर 2047 तक भारत को 30 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में ईंधन का काम करेंगे। क्या यही एनएचएआई को मिल रहे भारी बजट का कारण है? वित्त वर्ष 2025-26 में, इसे 2,38,384 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन प्राप्त हुआ।

कैग ने जुर्माने में कटौती करके और रियायत समझौतों से भटककर ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए बार-बार एनएचएआई को कटघरे में खड़ा किया है। टोल नियमों के उल्लंघन के कारण सड़क पर चलने वालों को 180 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। इससे भी गंभीर बात यह है कि एनएचएआई के अधिकारी कथित तौर पर पसंदीदा फर्मों को अनुबंध देने के एवज में सैकड़ों करोड़ रुपये के फर्जी सर्विस-टैक्स रिफंड में लिप्त रहे।

हाल ही में मीडिया से बातचीत में गडकरी बैकफुट पर दिखे जब उन्होंने कहा, ‘भारत में 72 लाख किलोमीटर सड़कें हैं। मैं केवल 1.5 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए जिम्मेदार हूं। अगर समस्या मेरी सड़क में है, तो मैं ठेकेदार या अधिकारी को नहीं बख्शूंगा। यदि गलती अनजाने में हुई हो तो मैं माफ कर देता हूं। यदि धोखाधड़ी है, तो मैं दंडित करता हूं।’ उन्होंने मानाः ‘हर साल 4.80  लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और 1.8 लाख मौतें होती हैं, जो शायद दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। इनमें से 66.4 फीसद मौतें 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग में होती हैं। इससे जीडीपी में 3 फीसद का नुकसान होता है। युवा डॉक्टरों, इंजीनियरों और प्रतिभाशाली युवाओं को खोना देश के लिए बड़ी क्षति है।’

वह 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को आधा करने के वादे को कैसे पूरा कर पाएंगे? नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड जैसी एजेंसियों पर जिम्मेदारी मढ़ने से क्या होगा, जब ये सभी या तो उनके मंत्रालय के तहत काम करती हैं या एनएचएआई के साथ मिलकर काम करती हैं? अंततः जवाबदेह कौन है? हालांकि निजी ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई के कुछ मामले सामने आए हैं, लेकिन  सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई महज दो मामलों में शुरू की गई है।

गडकरी ने हाल ही में राज्यसभा को बताया कि पिछले पांच सालों में एनएचएआई द्वारा बनाई गई सड़कों, पुलों और राजमार्गों पर संरचनात्मक क्षति या ढहने की 55 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 40 निर्माण के दौरान और शेष काम पूरा होने के बाद हुईं। इसपर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने सवाल किया कि इसके लिए कौन जवाबदेह है।

इस लेखाजोखा में मंत्रालय के तहत अन्य एजेंसियों द्वारा क्रियान्वित परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य लोक निर्माण विभागों और अन्य केन्द्रीय निकायों की परियोजनाओं से जुड़ी घटनाएं शामिल नहीं। लेकिन नवंबर 2023 में उत्तराखंड के सिल्क्यारा सुरंग हादसे का क्या जिसमें 41 मजदूर फंस गए थे? या उत्तराखंड में टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की चमोली सुरंग में 13 अगस्त 2026 को हुए हादसे का क्या, जिसमें नौ मजदूरों की मौत हो गई और दो अब भी लापता हैं?

(रश्मि सहगल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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