सिंधु जल संधि पर मोदी का आक्रामक रुख़ एक और कूटनीतिक भूल ?

पिछले साल अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने जब सिंधु जल संधि पर रोक लगाई, तो मोदी सरकार ने इस फ़ैसले को रणनीतिक दृढ़ता के तौर पर पेश किया। संदेश यह था कि पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद का समर्थन करते हुए साझा नदियों पर सहयोग का फ़ायदा नहीं उठा सकता। यह नारा राजनीतिक रूप से आकर्षक हो सकता है, लेकिन इसके पीछे की नीति कानूनी तौर पर संदिग्ध, व्यावहारिक रूप से बेअसर और रणनीतिक रूप से अदूरदर्शी थी। हेग में आर्बिट्रेशन कोर्ट के हालिया फ़ैसले और उसे मानने से भारत के साफ़ इनकार ने इस आत्मघाती फ़ैसले को गंभीर कूटनीतिक भूल में बदल दिया है।

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कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 1960 की सिंधु जल संधि पूरी तरह से लागू है और भारत अपनी ज़िम्मेदारियों पर एकतरफ़ा तौर पर रोक नहीं लगा सकता। कोर्ट ने कश्मीर में रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट के निर्माण कार्य पर भी अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया है। विश्व बैंक द्वारा नियुक्त निष्पक्ष विशेषज्ञ का फ़ैसला भी जुलाई 2027 तक आने की उम्मीद है और इसके 90 दिनों तक भारत को बांध की दीवार या पावर इनटेक स्ट्रक्चर को तय सीमा से ज़्यादा ऊंचा न करने को कहा गया। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया में कहा है कि ट्रिब्यूनल का गठन ग़ैर-क़ानूनी तरीके से किया गया है। भारत ने ज़ोर देकर कहा है कि इसके फ़ैसलों का भारत के प्रोजेक्ट्स पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

भारत लंबे समय से इस संधि के तहत ‘कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन’ और ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट प्रोसेस’ को एक साथ शुरू करने का विरोध करता रहा है। उसे यह कानूनी तर्क देने का अधिकार है। लेकिन इसमें शामिल होने से इनकार करने पर कार्यवाही खत्म नहीं हो जाती, और न ही किसी प्रतिकूल फैसले को संप्रभुता पर हमला बताने से भारत की संधि संबंधी जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं। संप्रभुता में बाध्यकारी समझौतों को करने की क्षमता शामिल होती है। यह किसी देश को ऐसी आज़ादी नहीं देती कि जब भी उनका पालन करना राजनीतिक रूप से असुविधाजनक हो, तो वह उनकी अनदेखी कर दे।

सिंधु जल संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी भी पक्ष को इसे एकतरफ़ा तौर पर रोकने या टालने की इजाज़त दे। असल में, इसकी मज़बूती का कारण यह था कि पानी के मामले में सहयोग को भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में आने वाले उतार-चढ़ाव से अलग रखा गया। यह संधि 1965 और 1971 की लड़ाइयों, कारगिल संघर्ष और बार-बार हुए सैन्य संकटों के बावजूद कायम रही। अगर युद्ध भी इस संधि को खत्म नहीं कर सका, तो इसके कामकाज को पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को पूरी तरह खत्म करने की ऐसी शर्त से जोड़ना, जिसकी कोई समय-सीमा तय नहीं है, असल में पानी के इस समझौते को राजनीतिक मनमर्जी का एक अनिश्चित साधन बना देता है।

आतंकवाद, भारत के लिए उसकी सुरक्षा से जुड़ी एक गंभीर और जायज़ चिंता है। सीमा पार हिंसा फैलाने वाले समूहों को किसी भी तरह की मदद देने के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। लेकिन सज़ा कानूनी, उचित और रणनीतिक रूप से फ़ायदेमंद होनी चाहिए। पाकिस्तान की खेती को सहारा देने वाली संधि को रद्द करने का फैसला इन पैमानों पर खरा नहीं उतरता। इससे ध्यान आतंकवाद से हटकर भारत के रवैये पर चला जाता है, पाकिस्तान को खुद को अंतरराष्ट्रीय कानून का रक्षक बताने का मौका मिलता है, और लाखों आम लोगों के लिए भोजन और आजीविका के लिए ज़रूरी संसाधन को लेकर अनिश्चितता पैदा हो जाती है।

इस संधि को स्थगित करने से भारत को मिलने वाले भौतिक लाभों को भी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है। पश्चिमी नदियों को रोकने या उनका मार्ग बदलने के लिए भारत के पास आवश्यक भंडारण और जल-मोड़न की बुनियादी संरचना नहीं है। पहाड़ी भूभाग के कारण इन नदियों के पानी को कहीं और ले जाना अत्यंत कठिन है, जबकि भारतीय कश्मीर के अधिकांश हिस्से में पहले से ही सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध है। भारत आंकड़े साझा करने में खेल कर सकता है, जलाशयों के संचालन में बदलाव कर सकता है और कृषि संबंधी संवेदनशील समयों के दौरान चिंता पैदा कर सकता है। लेकिन, वर्षों के निर्माण, भारी खर्च और गंभीर पर्यावरणीय एवं सुरक्षा जोखिमों के बिना सिंधु नदी प्रणाली को बंद करना संभव नहीं है।

ऐसी नीति जो बिना किसी काम के दबाव बनाए भारी कानूनी और कूटनीतिक कीमत चुकाने पर मजबूर करे, वह सिर्फ़ राजनीतिक दिखावा है, न कि रणनीतिक सख्ती। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अपने घोषित सैन्य मकसद पूरे न कर पाने के बाद, संधि को ठंडे बस्ते में डालने से नरेंद्र मोदी को अपनी दृढ़ता दिखाने में मदद मिलती है। फिर भी, सिर्फ़ दिखावे के लिए की गई जवाबी कार्रवाई एक ठोस क्षेत्रीय रणनीति की जगह नहीं ले सकती। पानी को हथियार बनाने से सज़ा की घरेलू मांग तो पूरी हो सकती है, लेकिन इससे पाकिस्तान को ठीक वही अंतरराष्ट्रीय मंच मिल जाता है जिससे भारत ने उसे हमेशा दूर रखने की कोशिश की है।

पाकिस्तान ने विश्व बैंक से संपर्क किया है और यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने रखा है। इस समझौते में कुछ खास प्रक्रिया संबंधी ज़िम्मेदारियों के लिए विश्व बैंक के हस्ताक्षर हैं, और इसके विवाद सुलझाने का तरीका इसी संस्था द्वारा की गई नियुक्तियों पर निर्भर करता है। इसलिए, भारत का टकराव अब सिर्फ़ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। मध्यस्थता की प्रक्रिया को पूरी तरह से खारिज करके, भारत उस अंतरराष्ट्रीय ढांचे को चुनौती दे रहा है जिसे उसने दशकों तक स्वीकार किया और इस्तेमाल किया। इससे एक ज़िम्मेदार ताकत के तौर पर भारत का दावा कमज़ोर होता है, जो बहुपक्षवाद और नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है।

वैसे भी जिस समय यह फैसला आया है, वह बहुत नुकसानदेह है। पाकिस्तान के अमेरिका के साथ रिश्ते बेहतर हुए हैं, जबकि चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी बहुत मज़बूत बनी हुई है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान, चीन ने पाकिस्तान को सैन्य उपकरण और ऑपरेशनल व इंटेलिजेंस सपोर्ट दिया। अब पाकिस्तान, अमेरिकां में अपनी कूटनीतिक पहुंच और चीन से मिलने वाले रणनीतिक समर्थन के साथ अपनी कमज़ोरियों को भी मिला सकता है। पाकिस्तान को अलग-थलग करने के बजाय, भारत की सिंधु नीति ने एक ऐसा मुद्दा खड़ा कर दिया है जिस पर पाकिस्तान बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति हासिल कर सकता है।

उधर चीन यारलुंग त्सांगपो नदी के ऊपरी हिस्से पर नियंत्रण रखता है, जो भारत में ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है। भारतीय सीमा के पास ‘ग्रेट बेंड’ के नजदीक चीन का विशाल पनबिजली प्रोजेक्ट, चीन को भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बेहद अहम इस नदी के बहाव को नियंत्रित करने की ज़्यादा क्षमता देगा। हो सकता है कि चीन ब्रह्मपुत्र के बहाव को पूरी तरह रोक न पाए, क्योंकि नदी के पानी का एक बड़ा हिस्सा तिब्बत के आगे के इलाकों से आता है। फिर भी, जलाशय के संचालन, पानी से जुड़े डेटा को न देने और अचानक पानी छोड़े जाने से गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। भारत चीन से पारदर्शिता और संयम बरतने की मज़बूती से मांग नहीं कर सकता, जबकि वह खुद अपने निचले बहाव वाले पड़ोसी देश के प्रति अपनी बाध्यकारी ज़िम्मेदारियों की अनदेखी करने का अधिकार जताता हो।

इसके असर बांग्लादेश तक भी पहुंचते हैं। गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में खत्म हो रही है। भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते खराब हुए हैं और चीन व पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश का जुड़ाव बढ़ा है। अगली संधि को लेकर बातचीत में पहले से ही कई रुकावटें हैं, जैसे सूखे के मौसम में पानी की कमी, फरक्का बैराज और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक आपत्तियां आदि। सिंधु नदी को लेकर भारत का रवैया निश्चित रूप से बांग्लादेश की उम्मीदों पर असर डालेगा। अगर भारत सुरक्षा संकट के बाद किसी एक नदी संधि को रोक सकता है, तो बांग्लादेश को यह भरोसा क्यों होना चाहिए कि कोई दूसरी संधि राजनीतिक दबाव से बची रहेगी?

अच्छी साख कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सिर्फ़ दिखावे के लिए हो या जिसे नज़रअंदाज़ किया जा सके। इसी से तय होता है कि पड़ोसी देश भारत के भरोसेमंद होने पर यकीन करते हैं या नहीं, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत के कानूनी दावों को मानती हैं या नहीं, और छोटे देश भारत की लीडरशिप को सहयोग करने वाली मानते हैं या दबाव डालने वाली। भारत एक ही समय में यह नहीं कह सकता कि जब चीन उसकी सीमाओं का उल्लंघन करे तो संप्रभुता का सम्मान किया जाए, जब संधि की शर्तें भारत के हितों की रक्षा करें तो उनका पालन किया जाए, और जब किसी मध्यस्थता के फैसले से कोई पाबंदी लगे तो उसे खारिज कर दिया जाए। चुनिंदा बहुपक्षवाद से विश्वसनीयता कम होती है, खासकर ऐसे समय में जब भारत दुनिया में ज़्यादा प्रभाव और सुरक्षा परिषद में स्थायी जगह पाना चाहता है।

सिंधु जल संधि को अपडेट करने की ज़रूरत है। 1960 में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों की कमजोरी, नदियों के बदलते बहाव और ऊर्जा की नई ज़रूरतों का ठीक से अंदाज़ा नहीं लगाया गया था। पश्चिमी नदियों से मिलने वाले अपने तय हिस्से को लेकर भारत की चिंताएं भी जायज़ हैं। लेकिन बदलाव बातचीत और संधि की प्रक्रियाओं के ज़रिए ही होना चाहिए, न कि एकतरफ़ा तौर पर इसे रोककर। भारत को अंतरिम उपायों का पालन करना चाहिए, स्थायी सिंधु आयोग के साथ फिर से जुड़ना चाहिए और तकनीकी व जलवायु से जुड़े पहलुओं पर व्यवस्थित बातचीत करनी चाहिए। संधि पर वापस लौटना आतंकवाद के लिए किसी ‘इनाम’ जैसा नहीं होगा, बल्कि यह एक ऐसे देश का आत्मविश्वास दिखाएगा जो उन नियमों को छोड़े बिना अपनी सुरक्षा की रक्षा कर सकता है, जिनके पालन की उम्मीद वह दूसरों से करता है।

भारत के मूल फ़ैसले से कोई खास फ़ायदा नहीं हुआ, बल्कि इससे विवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल गया और पाकिस्तान का कूटनीतिक पक्ष मज़बूत हो गया। अब कोर्ट के फ़ैसले को न मानने से वह गलती और बढ़ गई है। नदियां देशों को जोड़ती हैं, भले ही राजनीति उन्हें अलग-अलग कर दे। सिंधु नदी को हथियार की तरह इस्तेमाल करके मोदी सरकार ने भारत की कानूनी स्थिति कमज़ोर कर दी है, नदी के बहाव की दिशा में पड़ने वाले पड़ोसी देशों को डरा दिया है और चीन को एक ऐसी मिसाल दे दी है जिसका इस्तेमाल भविष्य में हमारे ही ख़िलाफ़ किया जा सकता है।

(अशोक स्वेन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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