दिल्ली के सत्य निकेतन में छात्रों को ठहराने वाली एक बहुमंजिला इमारत का ढह जाना किसी एक भवन की त्रासदी भर नहीं है। यह उस शहरी व्यवस्था का आईना है जिसमें हजारों विद्यार्थी ऐसे मकानों, पीजी और कोचिंग परिसरों में रहते-पढ़ते हैं, जिनकी सुरक्षा पर निगरानी का दावा तो किया जाता है, लेकिन उसकी वास्तविकता अक्सर किसी हादसे के बाद ही सामने आती है। 6 सितंबर 2026 को सत्य निकेतन में बेसमेंट और पांच ऊपरी मंजिलों वाली एक इमारत ढह गई। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार उसमें पीजी के रूप में विद्यार्थी रह रहे थे और बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था। हादसे के कारणों की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन संरचनात्मक सुरक्षा, बेसमेंट में चल रहे काम और भवन के वास्तविक उपयोग को लेकर सवाल पहले ही उठ खड़े हुए हैं।
यह घटना इसलिए और गंभीर है क्योंकि सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के निकट स्थित वह इलाका है जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी पीजी और किराये के आवासों में रहते हैं। संकरी गलियों और घनी आबादी वाले ऐसे इलाकों में किसी भवन में आपात स्थिति पैदा होने पर बचाव कार्य भी कठिन हो जाता है। लेकिन इस हादसे को केवल आज की तारीख से पढ़ना भूल होगी।
27 जुलाई 2024 को दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में राऊज IAS स्टडी सर्किल के बेसमेंट में पानी भर जाने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की मौत हुई थी। इस घटना ने देश को झकझोर दिया था। उससे पहले एक अभ्यर्थी ने 26 जून को नगर निगम को शिकायत भी की थी। बाद की न्यायिक कार्यवाही में उस शिकायत और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच का प्रश्न सामने आया। यानी खतरे का संकेत मौजूद था, लेकिन त्रासदी को टाला नहीं जा सका। इससे एक असुविधाजनक सवाल पैदा होता है – क्या हमारी व्यवस्था को किसी खतरे पर कार्रवाई करने के लिए पहले मौतों की जरूरत होती है?
ओल्ड राजेंद्र नगर कोई पहला संकेत भी नहीं था। जून 2023 में मुखर्जी नगर के एक कोचिंग परिसर में आग लगी थी। उस घटना में 61 विद्यार्थी घायल हुए थे और छात्रों को धुएं तथा आग से बचने के लिए इमारत से बाहर निकलने में भारी कठिनाई हुई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने तब स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे संस्थानों की सुरक्षा स्थिति की जांच का निर्देश दिया था। इसके पहले 2022 में मुंडका की एक व्यावसायिक इमारत में लगी आग ने 27 लोगों की जान ले ली थी। भवन में अग्निशमन विभाग की मंजूरी और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
2019 में अनाज मंडी इलाके की अवैध फैक्टरी में आग से 43 लोगों की मौत हुई। इन घटनाओं का चरित्र अलग-अलग था, लेकिन उनमें एक साझा तत्व दिखाई देता है- नियम मौजूद थे, संस्थाएं मौजूद थीं, लेकिन नियमों का वास्तविक अनुपालन और निगरानी पर्याप्त नहीं थी। और यदि हम थोड़ा पीछे जाएं तो 2010 का लक्ष्मी नगर के निकट ललिता पार्क भवन हादसा भी याद आता है। उस दुर्घटना में 67 लोगों की मौत हुई थी। भवन में निर्धारित सीमा से अधिक निर्माण और कमजोर आधार जैसी बातें सामने आई थीं। इतने वर्षों के बाद भी अनधिकृत निर्माण, कमजोर संरचना और नियमों की अनदेखी से जुड़े हादसे समाप्त नहीं हुए हैं।
इस पूरे सिलसिले को देखते हुए “दुर्घटना” शब्द भी कई बार अपर्याप्त लगता है। दुर्घटना वह होती है जिसकी पूरी तरह कल्पना या रोकथाम संभव न हो। लेकिन जब किसी पुराने भवन में अतिरिक्त निर्माण हो, जब स्वीकृत उपयोग और वास्तविक उपयोग अलग हों, जब बेसमेंट में अनुमत गतिविधि के बजाय कोई दूसरा व्यावसायिक काम हो, जब अग्नि-निकास अपर्याप्त हो, जब संरचनात्मक जांच न हुई हो और जब शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न हो- तब हादसे को केवल दुर्घटना कहकर प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
दिल्ली के कोचिंग केंद्रों पर हुई कार्रवाई भी इस विडंबना को सामने लाती है। 2024 की त्रासदी के बाद बड़े पैमाने पर निरीक्षण और सीलिंग की कार्रवाई हुई। बाद की रिपोर्टों के अनुसार फरवरी 2026 तक सैकड़ों इकाइयों पर कार्रवाई की जा चुकी थी और अनेक स्थानों पर बेसमेंट के गलत इस्तेमाल, अग्नि-सुरक्षा की कमी, संकरी सीढ़ियों और अन्य उल्लंघनों की पहचान हुई। लेकिन सवाल है-ये कमियाँ पहले क्यों नहीं दिखाई दीं?
किसी कोचिंग सेंटर या पीजी को सील करना कार्रवाई का अंत नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि वह व्यवस्था पहले से नियमों के अनुरूप नहीं थी। यदि कोई संस्थान वर्षों तक हजारों विद्यार्थियों से फीस लेता रहा और उसी दौरान संबंधित एजेंसियाँ उसकी सुरक्षा की नियमित जांच नहीं कर पाईं, तो जवाबदेही केवल भवन मालिक या संचालक की नहीं हो सकती।
यहां एक दूसरी समस्या भी है। विद्यार्थी और उनके अभिभावक अक्सर भवन की तकनीकी सुरक्षा की जांच स्वयं नहीं कर सकते। वे यह मानकर चलते हैं कि जिस भवन में पीजी चल रहा है, वह वैध होगा; जिस कोचिंग संस्थान में सैकड़ों विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, उसकी अग्नि-सुरक्षा और भवन-उपयोग संबंधी अनुमति ठीक होगी। यह विश्वास स्वाभाविक है। सरकारी संस्थाओं का अस्तित्व ही इसी भरोसे को सुनिश्चित करने के लिए है।
इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं कि “मकान मालिक ने नियम तोड़े।” यह पूछा जाना चाहिए कि नियम तोड़ने की जानकारी किसे थी? निरीक्षण किसने किया? यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? शिकायत आई तो किस अधिकारी ने उसे देखा? यदि उल्लंघन मिला तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? भवन का उपयोग बदलने की अनुमति किस आधार पर मिली? और यदि किसी अधिकारी ने सुरक्षा प्रमाणपत्र या अनुमति दी, तो उस प्रमाणन की जवाबदेही किसकी है?
यही वह बिंदु है जहाँ हमारी प्रशासनिक संस्कृति सबसे अधिक कमजोर दिखाई देती है। हादसे के बाद अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचते हैं। बचाव दल काम करता है। मंत्री या मुख्यमंत्री बयान देते हैं। जांच समिति गठित होती है। मुआवजे की घोषणा होती है। कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं। कभी-कभी कुछ इमारतें सील होती हैं। फिर समाचार चक्र बदल जाता है। लेकिन क्या कोई ऐसी स्थायी व्यवस्था बनती है जो अगली घटना को रोक सके? यदि बनती है तो उसके परिणाम कहाँ दिखाई देते हैं? हर बार “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” कहना आसान है। कठिन यह सुनिश्चित करना है कि दोषी बनने की परिस्थितियाँ ही पैदा न हों। अपराध या लापरवाही होने के बाद दंड आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह संस्थागत व्यवस्था जो संभावित अपराध या लापरवाही को पहले ही रोक दे।
सत्य निकेतन का हादसा इसी कारण केवल एक भवन की संरचनात्मक विफलता का मामला नहीं है। यह उस मॉडल पर भी सवाल है जिसमें शिक्षा और छात्र-आवास एक बड़े बाजार में बदल गए हैं। देश के दूरदराज इलाकों से आने वाले विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं, विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों के लिए महानगरों में आते हैं। उन्हें रहने के लिए सुरक्षित और किफायती जगह चाहिए। इस मांग ने पीजी, हॉस्टल, छोटे किराये के मकानों और कोचिंग परिसरों का विशाल नेटवर्क खड़ा कर दिया है।
इस पूरे तंत्र की सुरक्षा को बाजार की सामान्य गतिविधि मान लेना खतरनाक है। छात्र कोई सामान्य ग्राहक नहीं है। वह उस भवन की संरचनात्मक क्षमता, विद्युत व्यवस्था, अग्नि-निकास या बेसमेंट की वैधता का परीक्षण नहीं कर सकता। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल उस कमरे का किराया लेने वाले व्यक्ति पर नहीं छोड़ी जा सकती।
सरकार को अब हादसों के बाद अभियान चलाने की बजाय पूर्व-सावधानी का स्थायी तंत्र बनाना चाहिए। दिल्ली के सभी छात्र-बहुल क्षेत्रों में पीजी, हॉस्टल और कोचिंग परिसरों का नियमित स्वतंत्र संरचनात्मक ऑडिट हो। भवन का स्वीकृत नक्शा और वास्तविक उपयोग मिलाया जाए। बेसमेंट के उपयोग की अलग से जांच हो। अग्नि-सुरक्षा और आपातकालीन निकास की व्यावहारिक जांच हो। विद्युत व्यवस्था और भवन की भार-वहन क्षमता का परीक्षण हो। और यह सारी जानकारी सार्वजनिक हो, ताकि विद्यार्थी और उनके अभिभावक भी देख सकें कि जिस भवन में वे रह रहे हैं वह वास्तव में सुरक्षित घोषित किया गया है या नहीं।
सिर्फ निरीक्षण पर्याप्त नहीं है। निरीक्षण रिपोर्ट पर कार्रवाई की समयसीमा भी तय होनी चाहिए। शिकायतों के लिए ऐसी डिजिटल व्यवस्था हो जिसमें शिकायतकर्ता यह देख सके कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास है और उस पर क्या कार्रवाई हुई। इससे जवाबदेही किसी अस्पष्ट सरकारी फाइल में खोने से बचेगी। सबसे महत्वपूर्ण है जवाबदेही की दिशा बदलना। अभी हमारा तंत्र प्रायः यह पूछता है कि हादसे के बाद किसे पकड़ा जाए। उसे यह भी पूछना होगा कि हादसे से पहले किसके पास उसे रोकने की जिम्मेदारी थी।
सत्य निकेतन में राहत और बचाव कार्य अपनी जगह अत्यंत जरूरी है। मलबे में फँसे प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन मलबा हट जाने के साथ यह मामला समाप्त नहीं होना चाहिए। इस हादसे की जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि भवन किस तकनीकी कारण से गिरा। यह भी पता चलना चाहिए कि भवन की स्थिति क्या थी, उसमें किस प्रकार का निर्माण या मरम्मत कार्य चल रहा था, उसका उपयोग किस रूप में स्वीकृत था, उसमें कितने लोग रह रहे थे और संबंधित सरकारी एजेंसियों ने उसकी सुरक्षा की निगरानी कब और कैसे की थी। क्योंकि अगर जांच केवल एक मकान मालिक तक पहुँचती है और उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला तक नहीं पहुँचती जिसने इतने लोगों को उस भवन में रहने दिया, तो अगली त्रासदी के लिए जमीन फिर तैयार रहेगी।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि सुरक्षा कोई हादसे के बाद दिया जाने वाला मुआवजा नहीं है। सुरक्षा वह व्यवस्था है जो मुआवजे की जरूरत ही पैदा न होने दे। सत्य निकेतन का मलबा साफ हो जाएगा। कुछ दिनों बाद शायद वहाँ फिर आवाजाही शुरू हो जाएगी। अखबारों के पन्नों से यह खबर भी उतर जाएगी।
लेकिन यदि इस हादसे के बाद भी दिल्ली के पीजी, हॉस्टल और कोचिंग परिसरों का वास्तविक, पारदर्शी और नियमित सुरक्षा ऑडिट नहीं होता, तो यह केवल एक और घटना होगी-उस लंबी सूची में जुड़ी हुई, जिसमें हर हादसे के बाद एक ही वाक्य लिखा जाता है: “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” अब इस रटे-रटाए वाक्य से आगे बढ़ने का समय है। सवाल दोषियों को बख्शने या न बख्शने का ही नहीं है। सवाल यह है कि जिनकी जिम्मेदारी लोगों को मलबे के नीचे पहुँचने से पहले उन्हें बचाने की थी, उनकी जवाबदेही कब तय होगी?













