जिस समय दिल्ली के सत्यनिकेतन इलाके में इमारत गिरी और उसमें दर्जनों छात्र मलबे में दब गए, उस समय केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह गोवा में बीजेपी ने नए दफ्तर का उद्घाटन कर रहे थे। जो इमारत गिरी उसे दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए पीजी (पेईंग गेस्ट) के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। सवाल उठना शुरु हुए हैं कि अगर बीजेपी बीते 10 साल के दौरान देश के लगभग हर जिले में बीजेपी का कार्यालय बना सकती है तो क्या दिल्ली में पढ़ने वाले छात्रों के लिए 100 हॉस्टल नहीं बना सकती। इमारत ढहने के बाद बचाव और राहत कार्य में जुटे कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने यह सवाल जोर-शोर से उठाया है।
जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और एनएसयूआई के प्रभारी कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार का कहना है कि इस त्रासदी से एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में छात्रों को संबोधित किया था। उन्होंने कॉलेज के लिए 100 रुपए मूल्य का सिक्का भी जारी किया। लेकिन क्या ही अच्छ होता अगर वे दिल्ली के छात्रों के लिए 100 हॉस्टल बनाने का ऐलान कर देते।
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाले करीब 7 लाख छात्रों में से लगभग आधे यानी कोई 3.5 लाख छात्र दिल्ली से बाहर से पढ़ने आते हैं। और दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारियों का यह भी कहना है कि दिल्ली और बाहर के छात्रों के बीच एक किस्म का दोफाड़ भी है।
राष्ट्रीय राजधानी की दो अन्य यूनिवर्सिटी, जेएनयू और जामिया मिलिया में दिल्ली विश्वविद्यालय के मुकाबले छात्र कम हैं, लेकिन वहां दिल्ली यूनिवर्सिटी से ज़्यादा हॉस्टल सीटें उपलब्ध हैं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में लगभग 10 हज़ार छात्र हैं और यह उनमें से करीब साढ़े पांच हज़ार छात्रों को हॉस्टल की सुविधा देती है।
जामिया मिलिया में भी हॉस्टल में रहने की सुविधा का अनुपात बेहतर है। जहां जेएनयू अपने 55-65 प्रतिशत छात्रों को हॉस्टल में रहने की सुविधा देती है और जामिया भी काफी बड़ी संख्या में छात्रों को हॉस्टल में जगह देती है, वहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी अपने सिर्फ़ एक प्रतिशत छात्रों को ही हॉस्टल की सुविधा मुहैया कराती है।
इस अंतर के चलते दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़्यादातर छात्र नॉर्थ कैंपस के लिए मुखर्जी नगर और साउथ कैंपस के लिए सत्य निकेतन जैसे इलाकों में प्राइवेट पीजी और किराए के फ़्लैट में रहते हैं। सत्य निकेतन में एक ट्विन-शेयरिंग पीजी का किराया ₹14,000 प्रति महीना तक होता है। एक छात्र ने बताया कि उसने वह पीजी इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वहां ‘फ्रेश होने’ के लिए पानी नहीं था। इस किराए में बिजली और पानी का खर्च शामिल नहीं है और खाने का इंतज़ाम छात्रों को खुद करना होता है। कोई रसीद नहीं दी जाती और किराया नकद में लिया जाता है।
एनएसयूआई ने सोमवार को मांग की कि सरकार पीजी अकोमोडेशन के लिए ‘रेंट कंट्रोल एक्ट’ लागू करे और मालिकों द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को रेगुलेट करे। एनएसयूआई ने 18 सितंबर 2026 को होने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (डूसू) चुनावों में इसे एक मुद्दा बनाने का संकल्प लिया है। इसके अलावा रहने का खर्च ज़्यादा होने के साथ ही, दूसरे शहरों से आए छात्रों से ज़्यादा पैसे भी वसूले जाते हैं क्योंकि रेगुलेटेड और स्टैंडर्ड यूनिवर्सिटी हॉस्टल्स के उलट, पीजी अकोमोडेशन में सुरक्षा और सुविधाओं में बहुत अंतर होता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध 10 शीर्ष कॉलेजों में से हर एक में 3,500 से 4,000 छात्र हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ़ तीन कॉलेज (मिरांडा हाउस, इंद्रप्रस्थ कॉलेज और सेंट स्टीफंस) ही अपने लगभग 10 प्रतिशत छात्रों के लिए हॉस्टल की सुविधा देते हैं। हिंदू कॉलेज, हंसराज कॉलेज और दौलत राम कॉलेज में से हर एक में 200 सीटें हैं, जबकि गार्गी कॉलेज में सिर्फ़ 150 छात्रों के रहने की जगह है, जो एसआरसीसी और किरोड़ीमल कॉलेज के बराबर है। लेडी श्रीराम कॉलेज में 300 सीटें और सेंट स्टीफंस में 400 सीटें हैं, और इसके बाद मिरांडा हाउस आता है, जहां हॉस्टल में 370 छात्रों के रहने की व्यवस्था है।










