हाल के दिनों में कलाप्रेमियों के लिए बैक टू बैक दो बड़ी प्यारी पेशकश आई हैं। एक ‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ और दूसरी अब ‘गुल्लक2’। दोनों के कथा केंद्र में मिडिल क्लास परिवार की अधूरी हसरतें, मीठी नोकझोंक, गैर इरादतन आपसी कड़वाहटें हैं। ‘गुल्लक2’ में एक कदम आगे बढ़कर परिवार की जिम्मेदारियों से न भागने वाला मिजाज है।
वो भी उन लोगों का, जिन्हें कायनात ने जरा किफायत में ही सुविधाएं और संसाधन से बख्शा है। इसके मेकर्स वही हैं, जिन्होंने पिछले साल ‘पंचायत’ की सौगात दी थी।
कहानी नॉर्थ इंडिया के मिश्रा परिवार की है। घर की हेड शांति मिश्रा है। उनके पतिदेव संतोष मिश्रा बिजली विभाग के क्लर्क हैं। दो बेटे अन्नू और अमन मिश्रा हैं। एक पड़ोसन बिट्टू की मम्मी भी हैं, जिनके पतिदेव ने घूस की कमाई से काफी पैसा कमाया है।
अन्नू मिश्रा बेरोजगार हैं। कोई वैसी डिग्री भी नहीं है, जिससे कहीं नौकरी हासिल कर सकें। लोकल नेता की चाकरी में दिन बीत रहे हैं, ताकि गैस एजेंसी मिल जाएं। अमन मिश्रा को घर में सबने कम आंका हुआ है, पर वह रट्टा मारकर एक अलग ही कहानी गढ़ देता है। यह कुल मिलाकर मिडिल क्लास के उन प्रयासों की गाथा है, जो उनके तरफ से असाधारण हैं, लेकिन दुनिया की दौड़ में साधारण पड़ जाते हैं।
सुनने में यह बड़ी सरल सी कहानी महसूस होती है, लेकिन किरदारों की खूबियों, खामियों, अरमान, कर्तव्य और अपराध बोध के चलते यह बड़ी प्यारी और दिलचस्प बन जाती है। शांति मिश्रा उन तमाम मिडिल क्लास की मांओं का पक्ष रखती है, जो अंतहीन बरसों से रात दिन घर के चूल्हे- चौके में बिना खुद की सेहत का ख्याल रखे जुटी रहती है।
वह नाराज भी है। लेकिन घर के मर्द काम करें तो अखरता भी है। बेटे मां की मदद करना चाहते हैं, मगर घर के कामों में मन जरा कम लगता है। यहां उनकी कथित आन टांग अड़ा देती है। संतोष मिश्रा घर की माली हालत ठीक करने को रिश्वत लेने का रिस्क लेते हैं, मगर फिर डर और जमीर के चलते ऐसा करने से रह जाते हैं।
डायरेक्टर पलाश वासवानी के साथ मिलकर दुर्गेश सिंह ने फिर से फिक्शन राइटिंग की ताकत का एहसास दिलाया है। उनकी राइटिंग को जमील खान, वैभव राज गुप्ता, हर्ष मयार, सुनीता राजवार और बाकी कलाकारों ने जस का तस स्क्रीन पर उतारा है। वैभव राज गुप्ता ने कॉमेडी और इमोशन दोनों के सुर सधे हुए तरीके से पकड़े हैं। उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। हर्ष मयार ने वैभव के साथ मिलकर दोनों भाइयों की केमिस्ट्री को सतरंगी छटा प्रदान की है।
जमील खान ने संतोष मिश्रा को घोल मट्ठे की तरह पिया और जिया है। उनकी अदायगी की खूबसूरती ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में लोग देख चुके हैं। गीतांजलि कुलकर्णी का नॉर्थ इंडिया से कम ही नाता होगा, पर वो शांति मिश्रा के रंग में पूरी तरह रंगी हुई हैं। राइटिंग में पॉलिटिकल सटायर और वन लाइनर्स की आमद से शो चुटीला बन पड़ा है।













