कोरोना ट्रीटमेंट के 6 हफ्ते के दौरान मरीज को ब्लैक फंगस का खतरा ज्यादा : एम्स

नई दिल्ली। एम्स के एक सीनियर न्यूरोसर्जन का दावा है कि कोरोना के इलाज के 6 सप्ताह के अंदर मरीजों को ब्लैक फंगस का सबसे ज्यादा खतरा होता है। डॉ. पी शरत चंद्र के मुताबिक, इसके संक्रमण के सबसे अहम कारणों में बेकाबू डायबिटीज, टोसिलिजुमैब के साथ स्टेरॉयड का इस्तेमाल, मरीजों का सप्लीमेंटल ऑक्सीजन लेना है। कोरोना के इलाज के 6 सप्ताह के दौरान यदि मरीज के साथ इनमें से एक भी मसला है तो उसे ब्लैक फंगस का सबसे ज्यादा खतरा होता है।

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उन्होंने आगाह किया कि सिलेंडर से सीधे ठंडी ऑक्सीजन देना मरीजों के लिए काफी खतरनाक हो सकता है। ब्लैक फंगस के मामले कम करने के लिए ज्यादा जोखिम वाले मरीजों को एंटी-फंगल दवा पॉसकोनाजोल दी जा सकती है।

कपड़े का मास्क हर दिन धोएं
मास्क के इस्तेमाल पर डॉ. चंद्रा ने कहा कि एक ही मास्क को लंबे समय तक इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। कपड़े के मास्क अगर नमी वाली जगह पर रखा है तो इससे फंगस लग सकता है। कपड़े के मास्क को हर दिन धोना चाहिए। एन-95 मास्क को भी 5 बार ही इस्तेमाल करना चाहिए। मास्क को बदल-बदलकर पहनना चाहिए। हफ्ते के हर दिन के लिए एक मास्क रखें और उन्हें बदलकर पहनते रहें।

15 राज्यों में मिले मरीज
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश समेत 15 राज्यों में ही अब तक ब्लैक फंगस के 9,320 मामले सामने आ चुके हैं। वहीं 235 लोगों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा 5000 हजार मामले तो अकेले गुजरात में ही सामने आए हैं। इस संक्रमण के चलते कुछ मरीजों की आंख तक निकालनी पड़ रही है।

अब तक 12 राज्यों में ब्लैक फंगस महामारी घोषित
ब्लैक फंगस को हरियाणा ने सबसे पहले महामारी घोषित किया था। उसके बाद राजस्थान ने भी इस संक्रमण को महामारी एक्ट में शामिल कर लिया। फिर केंद्र सरकार ने भी सभी राज्यों के कहा कि ब्लैक फंगस को पेन्डेमिक एक्ट के तहत नोटिफाई किया जाए।

इसके बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तराखंड और तमिलनाडु भी ब्लैक संक्रमण को महामारी घोषित कर चुके हैं।

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