ऑपरेशन सिन्दूर: यही भारत का न्यू नार्मल

लेखक:डा मनमोहन प्रकाश 

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22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर किए गए 26 निर्दोष पर्यटकों के नृशंस नरसंहार ने भारतीय नारी के माथे के सिंदूर को मिटा कर सम्पूर्ण भारत को झकझोर दिया। यह क्रूरता केवल मानवता पर नहीं, अपितु भारत की सहिष्णुता और धैर्य की सीमाओं पर भी सीधा प्रहार था।

इस बर्बर हमले के प्रतिउत्तर में भारत सरकार ने तत्काल प्रभाव से सिंधु जल समझौते को स्थगित किया, पाकिस्तान के राजनयिकों को देश से बाहर निकाला, व्यापारिक संबंध तोड़े और पाकिस्तानी नागरिकों के वीज़ा रद्द कर उन्हें वापस भेजा। इसके पश्चात 6-7 मई 2025 की रात को भारतीय सेना को “ऑपरेशन सिन्दूर”  प्रारंभ करने का निर्देश दिया गया। यह एक सुनियोजित, सीमित, परंतु निर्णायक सैन्य कार्रवाई थी। इसका उद्देश्य न केवल आतंकवादियों को दंडित करना था, बल्कि उन्हें पनाह और समर्थन देने वाले पाकिस्तानी आकाओं को भी स्पष्ट संदेश देना था।

निर्णायक सैन्य सफलता:

सिर्फ चार दिनों में ही यह ऑपरेशन भारतीय सैन्य रणनीति, गोपनीयता, तकनीकी कौशल और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गया। ऑपरेशन सिन्दूर के तहत पाकिस्तान के भीतर स्थित 9 प्रमुख आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया और 100 से अधिक आतंकवादियों का सफाया हुआ। पाकिस्तान ने इसे अपने विरुद्ध युद्ध घोषित मानते हुए प्रतिक्रिया दी, लेकिन उसकी सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी। भारत की सतर्कता, साहस और तकनीकी श्रेष्ठता ने पाकिस्तान को एक बार फिर मात दी, और भारत मां के माथे विजय तिलक किया।

पाकिस्तान को सैन्य स्तर पर गहरी क्षति:

ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई सैन्य एयरबेस, लड़ाकू विमान, सैकड़ों ड्रोन , मिसाइलों को नष्ट किया तथा एयर डिफेंस सिस्टम  को निष्क्रिय कर दिया और दर्जनों सैनिकों की जानें गईं। पाकिस्तान और उनके देश में रह रहे आतंकियों को यह स्पष्ट संकेत था कि भारत अब “घर में घुसकर मारने” की नई सैन्य नीति अपना चुका है।

क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव:

इस अभियान के चलते पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था और अधिक चरमराई। महंगाई, *बेरोजगारी* और जनाक्रोश चरम पर पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने आतंकवाद पर पाकिस्तान के दोहरे मापदंडों को भली-भांति देखा। बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों को नई ऊर्जा मिली। बलूच नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र से स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता की अपील भी की। पीओके में “हमें पाकिस्तान नहीं, भारत चाहिए” जैसे नारों ने पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ा दीं।

भारत की नीति और वैश्विक संदेश:

ऑपरेशन सिन्दूर ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब “टेरर और टॉक”,  “टेरर और सिंधु जल समझौता”,टेरर और व्यापार जैसी नीतियों को एक साथ नहीं चलने देगा। अब भारत की विदेश नीति, रक्षा नीति और आतंकरोधी नीति “शून्य सहिष्णुता” पर आधारित है।

मित्र और शत्रु राष्ट्रों की पहचान:

इस कार्रवाई ने भारत को यह भी स्पष्ट कर दिया कि कौन मित्र है और कौन छद्म शत्रु। चीन, तुर्की और अज़रबैजान ने पाकिस्तान का समर्थन किया, जिससे भारत को भविष्य में इनसे सतर्क रहने की चेतावनी मिली। वहीं फ्रांस, जापान, इज़रायल, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत की कार्रवाई का समर्थन किया।

अमेरिका का रुख एक बार फिर निराशाजनक रहा। यदि वह चाहता, तो आईएमएफ के जरिए पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक सहायता रोक सकता था या आतंकियों के प्रत्यर्पण की शर्त रख सकता था — विशेषकर तब, जब 9/11 के दोषी ओसामा बिन लादेन को भी पाकिस्तान ने शरण दी थी।पर अमेरिका ने ऐसा नहीं किया।इस स्पष्ट हो गया कि अमेरिका को विश्व से आतंकवाद मिटाने में कोई रुचि नहीं।

स्वदेशी सैन्य तकनीक की विजय:

ऑपरेशन सिन्दूर में तीनों सेनाओं ने जिन स्वदेशी हथियार प्रणालियों का उपयोग किया, उन्होंने दुश्मन को चकित कर दिया, संभलने तक का मौका नहीं दिया। इन हथियारों की सटीकता, मारक क्षमता  ने  भारतीय सेना को भरोसा दिया कि इनके होते हम और हमारा देश सुरक्षित है। वहीं शौध और नवाचार में लगे रक्षा वैज्ञानिकों और उद्योगों को आत्मबल दिया तथा “मेक इन इंडिया” के तहत बने रक्षा उत्पादों की वैश्विक मांग बढ़ाई।

राष्ट्रीय एकता और सामाजिक संदेश:

इस अभियान के दौरान भारत के भीतर अभूतपूर्व एकता दिखाई दी। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने एक स्वर में सरकार का समर्थन किया। संदेश स्पष्ट था कि भारत विविधता में एकता रखता है, और जब बात देश की हो “राष्ट्र सर्वोपरि है”,”राष्ट्र धर्म सर्वप्रथम है” और कोई भी विदेशी शक्तियां भारत में रहने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों को आपस में नही लड़ा सकती।

रणनीतिक सैन्य उपलब्धि:

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित समय के बाबजूद इस  मिशन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारतीय सेना ने जिस सूझबूझ, संयोजन, गोपनीयता और संकल्प के साथ ऑपरेशन को अंजाम दिया, वह सैन्य इतिहास में एक स्वर्णाक्षरी अध्याय बन गया है। यह अभियान निकट भविष्य में सैन्य अकादमियों और कूटनीति पाठ्यक्रमों में अध्ययन के लिए आदर्श बन जाएगा।

निष्कर्ष:

निस्संदेह, ऑपरेशन सिन्दूर में भारत ने अपने कुछ वीर सैनिकों और नागरिकों को खोया होगा, परंतु उनके बलिदान ने भारत की आतंक-विरोधी नीति को वैश्विक मान्यता दिलाई। यह सिन्दूर अब भारत माता के मस्तक का विजय तिलक बन चुका है।

भारत का स्पष्ट संदेश :

“अब आतंक का उत्तर मौन नहीं — चुन-चुन कर प्रतिशोध लेना है और यही  भारत का न्यू नार्मल है।”

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