‘चुनाव आयोग कैसे गलत है, साबित तो करो…’, बिहार वोटर लिस्ट मामले में कड़े सवाल

नई दिल्ली। बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसे लेकर राजनीतिक पार्टियां अपनी तैयारियों में जुट गई है। इस बीच चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ विपक्षी पार्टियों ने मोर्चा खोल दिया है।

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9 जुलाई विपक्षी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी सड़क पर उतरे और चक्का जाम किया। इस विरोध प्रदर्शन में तेजस्वी यादव, राहुल गांधी और दीपांकर भट्टाचार्य जैसे शीर्ष नेता भी शामिल हुए।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू

विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन के बाद अब लीगल बैटल की बारी है। वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है और सर्वोच्च न्यायालय में इस पुनरीक्षण देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हो गई है।

बता दें, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफर्मस (ADR) ने चुनाव आयोग के इस फैसले को चुनौती देते हुए 5 जुलाई को याचिका दायर की थी। ADR के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस समेत 9 राजनीतिक पार्टियों ने भी सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी है।

विपक्षी दलों और ADR की ओर से दायर की गई याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था। इन याचिकाओं में 5 बड़े सवाल उठाए गए हैं। आईए जानते हैं, क्या-क्या हैं सवाल…

पांच बड़े सवाल

पहला सवाल:- संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन

  • विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि चुनाव आयोग का यह फैसला जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल 1960 के नियम 21A के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का भी उल्लंघन है।

दूसरा सवाल:- नागरिकता, जन्म और निवास पर मनमानी

  • एक्टिविस्ट अरशद अजमल और रूपेश कुमार की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया नागरिकता, जन्म और निवास से संबंधित असंगत दस्तावेजीकरण लागू करने की मनमानी है।ॉ

तीसरा सवाल:- लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर करने वाला फैसला

  • सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में चुनाव आयोग के वोटर वेरिफिकेशन के फैसले को लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर करने वाला बताया गया है।

चौथा सवाल:- गरीबों पर असमान बोझ

  • सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि चुनवा आयोग की यह प्रक्रिया गरीब, प्रवासी के साथ ही महिलाओं और हाशिए पर पड़े अन्य समूहों पर असमान बोझ डालने वाली है।

पांचवां सवाल:- गलत समय पर शुरू की गई प्रक्रिया

  • राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ओर से दायर की गई याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये प्रक्रिया गलत टाइम पर शुरू की गई है। मनोज झा ने कहा कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में गलत समय पर शुरू की गई है, जिसकी वजह से करोड़ों वोटर मताधिकार से वंचित हो जाएंगे।

चुनाव आयोग का बयान

विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम 1 जनवरी, 2003 को जारी की गई वोटर लिस्ट में हैं, उन्हें कोई दस्तावेज देने की जरूरत नहीं होगी।

चुनाव आयोग ने बताया कि वे सभी लोग संविधान के अनुच्छेद 326 के तगत प्राथमिक तौर पर भारत के नागरिक माने जाएंगे। जिन लोगों के माता-पिता के नाम तब की मतदाता सूची में दर्ज है, उनको केवल अपनी जन्म तिथि और जन्म स्थान से संबंधित दस्तावेज देने होंगे।

बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है। इस बीच आज सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुनवाई करेगी। विपक्ष और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के इस फैसले को चुनौती दी है।

कांग्रेस समेत 9 अन्य विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि इस प्रक्रिया में “दुर्भावनापूर्ण और मनमानी प्रक्रिया की वजह से भारी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की पूरी आशंका है।” कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग लोगों से ऐसे दस्तावेज दिखाने को कह रहा है, जिनमें आधार कार्ड और वोटर आईडी शामिल नहीं हैं, जिससे लाखों मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने का खतरा है।

इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल और रूपेश कुमार ने भी एक नई याचिका दायर की है। उनकी याचिका में कहा गया है कि आयोग का यह फैसला जन्म, निवास और नागरिकता से संबंधित मनमानी, अनुचित और असंगत दस्तावेजीकरण आवश्यकताओं को लागू कर रहा है। उनका तर्क है कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा प्रतिनिधि लोकतंत्र के सिद्धांतों को कमजोर करती है, जो संविधान की मूल संरचना के अभिन्न अंग हैं।

दूसरी ओर, वकील अश्विनी उपाध्याय ने चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करते हुए एक अलग याचिका दायर की है। उन्होंने कोर्ट से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का निर्देश देने की अपील की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सिर्फ भारतीय नागरिक ही राजनीति और नीति निर्धारण में भाग लें, न कि “अवैध विदेशी घुसपैठिए।”

सुप्रीम कोर्ट फर सभी की निगाहें टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या न्यायालय चुनाव आयोग के इस पुनरीक्षण प्रक्रिया पर रोक लगाता है, या इसमें किसी प्रकार के बदलाव का निर्देश देता है, या फिर इसे जारी रखने की अनुमति देता है। क्योंकि अदालत फैसला बिहार के लाखों मतदाताओं के मतदान के अधिकार और आगामी विधानसभा चुनावों पर सीधा प्रभाव डालेगा।

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