आकार पटेल: न्यूयॉर्क मेयर चुनाव में ज़ोहरान होने का मतलब!

हाल के दिनों की सबसे उल्लेखनीय लोकतांत्रिक घटनाओं में से एक इस महीने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में देखने को मिली। वहां भारतीय मूल के एक 33 वर्षीय युवा ने शहर के मेयर पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी का नामांकन जीता है। यह नामांकन एक तरह से सेमीफाइनल मुकाबला है, लेकिन चूँकि न्यूयॉर्क डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ ही झुकाव वाला शहर है, इसलिए वह इस साल के अंत में होने वाले चुनाव में सबसे आगे माने जा रहे हैं और संभावित विजेता हैं।

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ज़ोहरान ममदानी एक गुजराती मुस्लिम परिवार से हैं, और उनके पिता एक विश्वविद्यालय के विद्वान हैं, जिन्होंने अमेरिका पर हुए 11 सितंबर, 2001 के हमले के बाद ‘गुड मुस्लिम बैड मुस्लिम’ शीर्षक से एक प्रसिद्ध लेख लिखा था। ज़ोहरान की माँ फिल्मकार मीरा नायर हैं, जिन्होंने ‘मॉनसून वेडिंग’ और ‘सलाम बॉम्बे!’ जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया है। लेकिन ज़ोहरान की कहानी में उनकी पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है तो यह कि उन्होंने अपनी पार्टी के एक दिग्गज नेता, एंड्रयू कुओमो, जो न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर थे, के खिलाफ कैसे मुकाबला किया और उन्हें कैसे हराया।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यूयॉर्क के मेयर के पास काफी शक्तियां होती हैं। उसके अधिकार में करीब 100 अरब डॉलर से ज़्यादा के बजट को खर्च करना होता है, जो कि कई देशों के सालाना बजट से भी ज़्यादा है। उसके पास न्यायाधीशों, पुलिस आयुक्तों, 40 से ज़्यादा नगर एजेंसियों के प्रमुखों और बोर्ड व आयोगों के सदस्यों की नियुक्ति करने का भी अधिकार होता हैं। रूडी गिलिआनी जैसे लोग इसीलिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि वे इसी पद पर थे।

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प्रचार के दौरान ज़ोहरान का नारा समाजवाद रहा और वे खुद को एक लोकतांत्रिक समाजवादी कहते हैं। जैसा कि कई पाठकों को पता होगा, यह एक ऐसा शब्द है जो अमेरिका में गाली की तरह माना जाता है क्योंकि इसका इतिहास साम्यवाद के विरुद्ध रहा है। लेकिन ज़ोहरान समाजवादी शब्द को गर्व से अपनाते हैं और कहते हैं कि वे मज़दूर वर्ग, मज़दूरों और अप्रवासी न्यू यॉर्कवासियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए हैं, न कि धनी वर्ग का।

ज़ोहरान वादा करते हैं कि मेयर के तौर पर वे 20 लाख घरों का किराया स्थिर रखेंगे; शहर की बसें मुफ़्त करेंगे; बच्चों की देखभाल मुफ़्त करेंगे (एक तरह का आंगनवाड़ी कार्यक्रम); और वे सरकारी किराना दुकानों के साथ प्रयोग करेंगे, जिसकी शुरुआत न्यूयॉर्क के पांचों उपनगरों में एक-एक दुकान से होगी। यह हमारी राशन की दुकानों जैसा होगा, जिसका उद्देश्य खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी देना है। उनका कहना है कि वे इसके लिए आयकर में मामूली वृद्धि करेंगे, लेकिन केवल उन न्यूयॉर्कवासियों पर जिनकी वार्षिक आय 10 लाख डॉलर (8 करोड़ रुपये से अधिक) से अधिक है।

एक और जो महत्वपूर्ण बात है, वह है ज़ोहरान के प्रचार अभियान का तौर-तरीका। उन्होंने अपना प्रचार ज्यादातर टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चलाया गया। एक बेहद आकर्षक व्यक्तित्व वाले ज़ोहरान के छोटे-छोटे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें वे खुद शहर में घूम-घूम कर न्यूयॉर्कवासियों से उनकी चिंताओं के बारे में बात कर रहे हैं। ये वीडियो यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं और ये देखने लायक हैं कि एक कम खर्चीला, प्रभावी और अनोखा प्रचार अभियान कैसा हो सकता है।

इनमें से कुछ वीडियो में ज़ोहरान दक्षिण एशियाई और लैटिनो पृष्ठभूमि के लोगों को सीधे संबोधित करने के लिए साफ-सुथरी हिंदी, स्पेनिश और बंगाली बोलते हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के अन्य राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, दक्षिण एशियाई होने के नाते अपनी पहचान को लेकर उन्हें कोई समस्या नहीं है। इस प्रचार अभियान में बॉलीवुड का तड़का भी दिखता है, जिसमें इस्तेमाल किए गए टाइपफेस और वीडियो का संपादन भी शामिल है।

ज़ोहरान के बारे में तीसरी ख़ास बात यह है कि वह फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के लिए खुलकर बोलते हैं और इज़राइल की करतूतों की आलोचना करते हैं। यह एक बेहद असामान्य स्थिति है, क्योंकि इससे उन पर ऐसे लोगों द्वारा हमला करने का खतरा मंडराने लगता है जिसे जॉन मियर्सहाइमर जैसे विद्वान इज़राइली लॉबी कहते हैं। ज़ोहरान का साहस इस बात से ज़ाहिर होता है कि इतने बड़ी प्रतिष्ठा वाले चुनाव में खड़े होने के बावजूद भी वह पीछे हटने या अपना रुख़ नरम करने से इनकार करते हैं। आमतौर पर राजनेता ऐसा व्यवहार नहीं करते। अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जिसके लोकतांत्रिक उम्मीदवारों से दूसरे देश के प्रति उत्साही निष्ठा की अपेक्षा की जाती है।

जहां यह तथ्य है कि जहां न्यूयॉर्क टाइम्स सहित मीडिया के अन्य धड़ों द्वारा उन पर तीखे और अनुचित हमले किए गए, वहीं यह भी तथ्य है कि उन्होंने इस सबके बावजूद शानदार जीत हासिल की। इससे साफ है कि न्यूयॉर्क के रहने वाले उनके साहस का सम्मान करते हैं।

नामांकन हासिल करने के बाद भी, उनकी अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी का उन्हें बहुत कम समर्थन और साथ मिला है। आज उनके साथ कोई क्लिंटन, बाइडेन या ओबामा नहीं हैं, क्योंकि वे ज़ोहरान और उनके द्वारा कही जा रही बातों से जुड़ने से डरते हैं। अतीत में, समाजवादी नीतियों को बढ़ावा देने वाले बर्नी सैंडर्स जैसे डेमोक्रेट को लोग पसंद तो करते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया। लेकिन ज़ोहरान अलग हैं।

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उनकी जीत का मतलब है कि उनकी पार्टी को उनसे सीखना होगा, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप के उदय के बाद से डेमोक्रेट्स के बीच अव्यवस्था का आलम है। फिलहाल सरकार की तीनों शाखाओं, व्हाइट हाउस, प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर रिपल्लिकन का नियंत्रण है। डेमोक्रेट्स के पास ट्रंप के प्रभाव का फिलहाल कोई ठोस जवाब नहीं है और ज़ोहरान, मज़दूर वर्ग के अमेरिकियों के लिए अपनी सशक्त और स्पष्ट नीतियों के साथ, उन्हें वापसी का एक राष्ट्रीय रास्ता दिखा रहे हैं। अन्य बातों के अलावा यह भी एक तथ्य है कि गाजा में जारी नरसंहार के कारण फिलिस्तीन के मुद्दे पर अधिकांश अमेरिकियों का रुख बदल गया है। ज़ोहरान ही इस बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो उनकी पार्टी में बेज़ुबान नजर आ रहा है।

अगर ज़ोहरान इस साल के आखिल में होने वाले आम चुनाव जीतने में कामयाब रहे और फिर कुछ ही समय में  अपनी नीतियों के सार को लागू करने में कामयाब रहे, तो उनकी पार्टी उनके पास वापस जरूर आएगी। अमेरिका में अगले साल के अंत में महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनाव होने हैं और तब डेमोक्रेट्स के पास एक देसी हीरो होगा जो उन्हें सिखाएगा कि कैसे और किन मुद्दों पर चुनाव लड़ना है।

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