कौन हो उपराष्ट्रपति? संघ का स्वंयसेवक या संविधान समझने वाला

ए जे प्रबल

सभ्य, मिलनसार और विनम्र’…यह कुछ विशेषण हैं जो बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सी पी राधाकृष्णन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। लेकिन यही विशेषण विपक्ष के उम्मीदवार बी सुदर्शनन रेड्डी के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। लेकिन इन दोनों उम्मीदवारों के बीच जो भी समानताएं हैं, वह बस इतनी ही हैं। सी पी राधाकृष्णन पूरी तरह आरएसएस का समर्पित स्वंयसेवक हैं जो 16 साल की उम्र से संघ से जुड़े हैं। वहीं विपक्ष के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी 2011 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद भी लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने स्वतंत्र विशेषज्ञों के उस पैनल की अगुवाई की है जिसने तेलंगाना में जाति सर्वेक्षण किया है।

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एनडीए के उम्मीदवार ने नाम घोषित होते ही सबूत दे दिया कि वह कितने वफादार, आदेश पर झुकने वाले और आज्ञाकारी साबित होंगे। नाम की घोषणा के बाद उनकी सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट काफी चर्चा में रही जिसमें उन्होंने अंग्रेजी के ‘बीलवेड’ यानी अत्यधिक प्रिय और मोस्ट रेस्पेक्टेड यानी अत्यधिक सम्मानित शब्द का बार-बार प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा के साथ ही तमाम केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं का धन्यवाद दिया।

अगर वह चुने जाते हैं तो राज्यसभा के चेयरमैन के रूप में उनकी यह विनम्रता और सज्जनता विपक्षी सदस्यों के प्रति भी कायम रहती है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा। वैसे यह तो तय है कि निर्वाचित होने के बाद विपक्षी सांसदों को राज्यसभा में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की कमी ज़्यादा देर तक महसूस नहीं होगी। जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई, 2025 को अचानक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए रहस्यमयी तरीके से इस्तीफ़ा दे दिया था और उसके बाद से वे कहां हैं, किस हाल में हैं, इसका कोई अता-पता नहीं है। इसीलिए उनके इस्तीफे को लेकर सस्पेंस और बढ़ गया है। जरूरत से ज्यादा बातूनी रहे धनखड़ का मशहूर कथन था कि ‘झुकना मेरी फितरत है’, और अब देखना होगा कि एनडीए के ‘बीलवेड’ यानी ‘सबसे प्रिय’ उम्मीदवार का अभिवादन करने का क्या तरीका होगा।

उपराष्ट्रपति चुनाव में अब सांसदों को तय करना होगा कि वे एक और संवैधानिक पद पर एक अन्य आरएसएस स्वंयसेवक को देखना चाहेंगे या नहीं। क्या इतना ही काफी नहीं है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ही पदों पर आरएसएस स्वंयसेवक विराजमान हैं?

राज्यसभा में एक आज्ञाकारी सभापति हो, इसे लेकर सरकार की बेचैनी जगज़ाहिर है। यहां गौरतलब है कि सरकार ने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के ‘अच्छे काम’ को फिलहाल इतना अच्छा नहीं माना कि उन्हें पदोन्नत किया जा सके। स्वर्गीय चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो हरिवंश उनके मीडिया सलाहकार होते थे, और उस वक्त उन्होंने वही किया था, जो धनखड़ अगर संसद के मानसून सत्र में होते तो सदन का संचालन करते हुए करते। लेकिन जाहिर है कि उनकी स्वीकार्यता वैसी नहीं होगी क्योंकि वह ‘पूरी तरह आरएसएस’ से नहीं जुड़े हैं।

एनडीए उम्मीदवार सी पी राधाकृष्णन के सार्वजनिक जीवन में तमिलनाडु से दो बार सांसद के रूप में चुना जाना और झारखंड और महाराष्ट्र के राज्यपाल का पद संभालना शामिल है। वैसे भी उनका तमिलनाडु से होना भी उनके पक्ष में गया होगा क्योंकि तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन क्या यह योग्यता उपराष्ट्रपति बनने के लिए पर्याप्त है? हालांकि यह तर्क दिया जाता है कि यह पद काफी हद तक औपचारिक है, लेकिन राज्यसभा का अध्यक्ष पद महत्वहीन नहीं है। सवाल यह है कि राज्यसभा के सभापति के रूप में कौन बेहतर काम करेगा।

इसके बरअक्स रिटायर्ड जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी, अपने विविध अनुभव और कानून एवं संविधान के ज्ञान और समझ के साथ, राज्यसभा के सभापति पद के लिए कहीं अधिक उपयुक्त प्रतीत होते हैं। उन्होंने अपना नामांकन दाखिल करने के बाद एक बयान में कहा कि “भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में, कानून के छात्र के रूप में, और इस गणराज्य की लोकतांत्रिक परंपराओं में निहित एक नागरिक के रूप में सार्वजनिक सेवा में” उनके जीवन ने उन्हें सिखाया है कि “भारत की असली ताकत प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, संवैधानिक नैतिकता की रक्षा और हमारी विविधता में एकता में निहित है”। रेड्डी ने इसी बयान में आगे कहा, “राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति पर संसदीय लोकतंत्र की सर्वोच्च परंपराओं की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी है।”

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान, जस्टिस रेड्डी ने कई संवैधानिक मामलों की सुनवाई की। उनका सबसे महत्वपूर्ण फैसला 2011 में प्रसिद्ध नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का मामला था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम मिलिशिया पर प्रतिबंध लगा दिया था और निर्देश दिया था कि नक्सली विद्रोह का मुकाबला करने के लिए आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में इस्तेमाल करने की प्रथा को समाप्त किया जाए।

2011 में, वह सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच का भी हिस्सा थे जिसने विदेशी बैंकों में जमा धन को “शुद्ध और सीधी चोरी” करार दिया था और केंद्र सरकार को चुनौती दी थी कि वह जनहित में, ऐसे भारतीयों के खिलाफ सरकारी जांच की सामान्य जांच करने से रोके जिन्होंने “राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से लूटी गई भारी रकम” दुनिया भर के टैक्स हेवन में जमा कर रखी है। गौरतलब है कि उस समय कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सत्ता में थी।

रिटायरमेंट के बाद, उन्हें बीजेपी के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने गोवा का पहला लोकायुक्त नियुक्त किया था, लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए मात्र सात महीने में ही इस्तीफा दे दिया था। 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक “निगरानी प्राधिकारी” नियुक्त किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कर्नाटक में खनन कार्य खनन प्रभाव क्षेत्र के लिए व्यापक पर्यावरणीय योजना का पालन करें। यह परियोजना, बड़े पैमाने पर खनन से प्रभावित बेल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुर जैसे जिलों में भूमि के पुनर्स्थापन के लिए थी।

अपने गृह राज्य तेलंगाना में, जस्टिस रेड्डी ने राज्य जाति सर्वेक्षण के नतीजों का मूल्यांकन करने के लिए गठित स्वतंत्र विशेषज्ञ कार्य समूह का नेतृत्व किया। समिति ने जुलाई में मुख्यमंत्री को 300 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें राज्य में जातिगत गतिशीलता के बारे में अमूल्य जानकारी थी।

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