‘बाबू, कौनो रास्ता ही नहीं बचा था…’, सुलगती आंखों में स्वर्णिम नेपाल का सपना

बीरगंज। नेपाल में इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ जेन-जी आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ आग में बदल गया और पूरा नेपाल उसमें जलने लगा। गुस्से की इस दावानल का असर कमोबेश काठमांडू, बीरगंज या जनकपुर, कहीं भी पड़ा। लोगों के दिलों में आग है, आंखों में ज्वाला है, लेकिन इन सुलगती आंखों में सुनहरे नेपाल का सपना भी है। एक ऐसा सपना जो युवाओं के दम पर पूरा होगा, एक ऐसा सपना जो युवाओं के लिए पूरा होगा, लेकिन इस सपने को, इस आंदोलन को बुज़ुर्गों का भी पूरा समर्थन हासिल है।

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वजह ये है कि इंटरनेट मीडिया तो बस एक बहाना है, असल विरोध नेपाल की राजनीतिक रगों में समा चुके भ्रष्टाचार के खिलाफ है। पुलिस की गोलियों से छात्रों की मौत का है। नेपाल में रक्सौल के हरिया सिवान टोला से बीरगंज के वार्ड 17 अलौ सिवान टोला जाने वाले रास्ते पर जली हुई पुलिस पिकेट बता रही है कि ये विरोध पुलिस के खिलाफ भी है।

बाबू, कोई रास्ता नहीं बचा था, इतने बड़े नेता बन गए थे कि पूछो ही मत और सब अपनी जेबें भर रहे थे। उनके बेटे दो-दो लाख की घड़ियां पहनकर घूम रहे हैं और हमारे बच्चों को नहाने के लिए पानी तक नहीं मिलता। उसके बाद कहते हैं कि हम तो जनता के सेवक हैं।

हमें कोई मासिक वेतन नहीं मिलता। अगर हमें कोई मासिक वेतन नहीं मिलता तो हमने इतना कमाया कैसे। हमारे लोगों को लूटा जा रहा है। जो हुआ ठीक है। अब सब ठीक हो जाएगा। अब नेपाल सोने की तरह चमकेगा।

कुछ कड़वाहट, कुछ घृणा और उम्मीद से भरे ये उद्गार नेपाल के अलौन गांव निवासी 91 वर्षीय सत्य नारायण साह के हैं, जो अपने बरामदे में पड़ोसियों के साथ बैठे थे और जब बातचीत शुरू हुई तो वह अपने विचारों को दबा नहीं पाए।

उन्होंने कहा, हमने राजा का शासन देखा है। राजा का पेट भरा रहता था, वह सबका ख्याल रखते थे। वह जानते थे कि जब तक प्रजा है, तभी तक राजा है। अब छह सौ नेता और मंत्री हैं। सब लूटने में लगे हैं।

नेता खाद, पानी, विकास योजना सब खा जाते हैं। 60 वर्षीय रामप्रीत शाह तुरहा माथे पर शिकन लिए कहते हैं कि न हमें खाद मिलती है, न पानी और नेताओं को पैसा चाहिए। ऐसा ही है। पहले जेब में पैसा नहीं और पद मिलने के बाद 60-70 लाख की गाड़ी मिल जाती है। कहां से हो? लेकिन इसके बाद क्या..

इस पर 60 वर्षीय जीतन प्रसाद कानू या 45 वर्षीय परमा भगत सीधे तौर पर कहते हैं कि जब राजा थे तब ठीक था। राजा के लिए क्यों ठीक है? इस पर सत्यनारायण शाह कहते हैं, छोटे से देश में राजा का राज ठीक है। कानू कहते हैं, यहां के नेता खाद, पानी, विकास योजना सब खा जाते हैं। 700 भारतीय रुपये की खाद ब्लैक में 1500 रुपये की पड़ती है। नेपाली रुपये में यह 2500 होता है।

राजा के समय सब ठीक था

अलाऊ के 18 वर्षीय सुमन उपाध्याय कहते हैं कि बाबा बताया करते थे कि राजा के समय सबका ध्यान रखा जाता था। भ्रष्टाचार नहीं था। आंदोलन अच्छा था। 19 वर्षीय सुदीप शर्मा भी सुमन की बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि जब नेताओं के परिवार वाले ही सब कुछ ले लेंगे तो हमारा भविष्य कैसे होगा। आंदोलन जरूरी था।

अलाऊ सिवान टोला के मनमोहन माली कहते हैं कि सरकार के लोग सब कुछ अपने पास रख रहे थे। जब छात्र इंटरनेट मीडिया बंद होने के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे तो उन पर गोलियां चलाई गईं। नेपाल के मनियारी गांव के धर्मराज कहते हैं कि नेपाल में सात राज्य हैं। नेता बढ़ गए हैं और सब अपनी-अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। जनता क्या कर सकती थी?

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