नीतीश या तेजस्वी की स्कीम बनी गेमचेंजर, अब किसके सिर सजेगा ताज

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 121 सीटों पर मतदान हुआ। मतदान में बंपर वोटिंग हुई है। इससे कई समीकरण बन और बिगड़ सकते हैं। 2020 की तुलना में इस बार वोटरों में जबर्दस्त उत्साह देखने को मिला। खासकर महिला वोटर में। पहले चरण के कुल मतदाता 3 करोड़ 75 लाख थे, जिसमें पुरुष 1 करोड़ 98 लाख और महिला मतदाता 1 करोड़ 76 लाख थी। चुनाव आयोग के मुताबिक, पहले चरण में महिला मतदाताओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान में बढ़कर हिस्सा लिया।

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दरअसल बिहार में पहले चरण के तहत रिकॉर्ड 64.69 प्रतिशत वोटिंग हुई है। 2020 से तुलना करें तो तब इन सीटों पर पांच बजे तक 51.1 पर्सेंट ही वोट गिरे थे। इस बार मतदान प्रतिशत करीब 13 प्रतिशत बढ़ गया है। वोटरों का यह उत्साह सुबह से ही देखा जा रहा था। इस बंपर वोटिंग को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि इसकी वजह क्या है? यह बंपर वोटिंग किसके लिए खुशखबरी लेकर आ रहा है?

महिलाओं के बढ़े प्रतिशत के लिए किसकी स्कीम ने किया काम-तेजस्वी या नीतीश?

आमतौर पर ज्यादा वोटिंग का मतलब सत्ता विरोधी लहर से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन हर बार नहीं। वहीं महिलाओं का ज्यादा मतदान करना नीतीश कुमार या यूं कहें एनडीए के लिए फायदेमंद रहा है। इस बार भी बिहार में मामला थोड़ा अलग है। नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए 10 हजार वाली स्कीम शुरू की तो तेजस्वी यादव ने माई–बहन योजना के तहत महिलाओं को एकमुश्त 30 हजार देने की घोषणा की। बढ़े मतदान को लेकर सवाल उठ रहा है कि महिलाओं का ज्यादा मतदान में किसकी स्कीम काम कर रही है?

महिलाओं की बढ़ी भागीदारी से किसका बनेगा खेल?

राजनीतिक परंपरा रही है कि ज्यादा वोटिंग को सत्ता विरोधी लहर से जोड़ा जाता है। लेकिन बिहार में यह समीकरण हमेशा सही नहीं बैठता। यहां महिलाओं की सक्रियता अक्सर नीतीश कुमार और एनडीए के लिए फायदेमंद रही है। इस बार भी यह माना जा रहा है कि नीतीश सरकार की ‘10 हजार रुपये वाली स्कीम’ ने महिला मतदाताओं में भारी उत्साह पैदा किया है। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने करीब 1.5 करोड़ महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये डाले, जिससे लगभग 4.5 करोड़ वोटरों (प्रति परिवार चार सदस्य मानें) तक इसका असर पड़ सकता है।

पिछली बार महिलाओं के वोट से एनडीए को मिला था बड़ा फायदा

2020 के चुनाव में 167 सीटों पर महिलाओं ने बंपर वोटिंग की थी, जिनमें से 99 सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी। दिलचस्प यह कि जहां पुरुषों ने ज्यादा वोट डाले, वहां एनडीए पिछड़ गई थी। इसलिए इस बार भी महिला वोटरों की बड़ी भागीदारी एनडीए के लिए शुभ संकेत मानी जा रही है।

नीतीश की महिला वोटर पर पुरानी पकड़

राजनीति विश्लेषक रमाकांत चंदन कहते हैं कि महिलाओं के बीच नीतीश कुमार की पैठ नई नहीं है। 2005 से लेकर 2010 तक उन्होंने साइकिल योजना, शराबबंदी और महिला सुरक्षा जैसे फैसलों से महिलाओं में भरोसा जीता था। यही वजह है कि आज भी महिलाओं के बीच नीतीश की लोकप्रियता पीएम मोदी से भी ज्यादा दिखाई देती है।

तेजस्वी यादव और प्रियंका गांधी द्वारा इसी स्कीम पर बार-बार निशाना साधना भी इस बात का संकेत है कि विपक्षी खेमे को इस योजना से चुनावी नुकसान की आशंका है।

क्या ‘10 हजार स्कीम’ बन गई मास्टरस्ट्रोक?

विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की यह योजना वैसा ही असर दिखा सकती है जैसा किसानों के लिए पीएम मोदी की 6 हजार वाली स्कीम ने 2019 में दिखाया था। उस वक्त इस योजना ने विरोधी लहर को काफी हद तक शांत कर दिया था।

महिलाओं पर लगातार ध्यान देने, शराबबंदी और सुरक्षा के माहौल जैसे कदमों ने नीतीश सरकार को महिला मतदाताओं के बीच मजबूत आधार दिया है। ऐसे में 10 हजार रुपये की स्कीम ने इस आधार को और पक्का कर दिया है। हालिया सर्वे के मुताबिक, महिला वोटरों में नीतीश को तेजस्वी पर 32 प्रतिशत की बढ़त हासिल है। हालांकि तेजस्वी यादव भी ‘माई–बहन योजना’ के तहत महिलाओं को एकमुश्त 30 हजार देने की घोषणा की।

महिलाओं के बढ़े मतदान का किसको फायदा होगा? इसका सही पता चुनाव नतीजे आने पर ही पता लगेगा। बता दें, 14 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव का रिजल्ट सामने आएगा।

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