बिहार में जब-जब 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी, तब-तब सत्ता पलटी; 17 चुनावों का एनालिसिस

बिहार में पहले चरण की 121 सीटों पर 64.46% वोटिंग हुई है। अगर दूसरे और आखिरी फेज की 122 सीटों पर भी इसी तरह वोटिंग हुई, तो यह बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल सकती है। कम से कम आंकड़े तो यही बता रहे हैं।

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64.46% वोटिंग एक रिकॉर्ड है। 2020 चुनाव के पहले फेज में सिर्फ 55.68% वोटिंग हुई थी, हालांकि तब चुनाव 3 फेज में हुआ था और पहले फेज में सीटें भी 71 थीं।

आजादी के बाद हुए कुल 17 विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ है कि जब-जब बिहार में 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी या घटी, तो राज्य में सत्ता ही नहीं सियासी दौर भी बदल गया। हालांकि, 4 में से 3 एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बार सत्ता तो नहीं, लेकिन सियासत पूरी तरह बदल सकती है।

सबसे पहले 1951 से हुए 17 विधानसभा चुनावों के नतीजों और उनके असर को देखते हैं-

जिन 4 चुनावों में 5% वोटिंग घटी या बढ़ी तब क्या हुआ…

1967 में पहली बार राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकार

1967 के चुनाव में वोटिंग में 7% की बढ़ोतरी हुई थी। तब राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। हालांकि, सरकार अस्थिर रही। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। जन क्रांति दल और शोषित दल ने कांग्रेस के वर्चस्व को तो तोड़ा, लेकिन अपनी एकजुटता नहीं रख पाए। कांग्रेस सरकार में आती-जाती रही। इस चुनाव के बाद कांग्रेस के कमजोर होने की शुरुआत हुई।

1980 में अपने बूते कांग्रेस सरकार की वापसी

1980 में 6.8% ज्यादा मतदान हुआ था। तब कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में लौटी और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने। उस वक्त जनता पार्टी के आपसी टकराव में कांग्रेस ने उसके हाथ से सत्ता छीन ली थी। हालांकि, कांग्रेस के अंदर की राजनीति के कारण सरकार 10 साल में ही कांग्रेस का शासन खत्म हो गया।

1990 में कांग्रेस राज खत्म, लालू यादव सीएम बने

1990 में 5.8% ज्यादा मतदान हुआ और कांग्रेस की सत्ता से विदाई हो गई। जनता दल की सरकार बनी। लालू यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद राज्य की राजनीति में मंडल की ऐसी छाप पड़ी की कांग्रेस दोबारा अब तक वापसी नहीं कर पाई। लालू यादव ने बिहार की पूरी राजनीति को बदल दिया। और 15 साल तक राज किया।

2005 में लालू-राबड़ी राज खत्म कर CM बने नीतीश

2005 में 16.1% कम वोटिंग हुई, लेकिन लालू-राबड़ी शासन का अंत हो गया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। इस बार सत्ता का बदलाव कम वोटिंग से हुआ था। नीतीश कुमार ने सुशासन की छवि बनाई और 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं।

चुनाव के बाद 3 तरह से बदलेगी बिहार की राजनीति

सिचुएशन-1ः नीतीश कुमार मजबूत होंगे, लौटेगा 10 साल पुराना रुतबा

एक्सपर्ट का मानना है कि नीतीश कुमार इस चुनाव में मजबूत होकर उभरेंगे। अगर ऐसा हुआ तो वह भाजपा के साथ रहते हुए 2010 वाले पुराने रुतबे में लौट आएंगे। तब नीतीश की पार्टी JDU को 115 सीटें मिली थीं। सरकार में भाजपा की दखलअंदाजी सीमित थी, लेकिन 2020 में JDU 43 सीटों के साथ तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। सरकार में भाजपा का दखल बढ़ गया।

सिचुएशन-2ः प्रशांत किशोर 10% वोट लेकर आए तो आगे सियासत बदल देंगे

पॉलिटिकल एनालिस्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘नीतीश कुमार की उम्र हो चुकी है और उन्होंने अब तक पार्टी के अगले नेता का ऐलान नहीं किया है। ऐसे में राज्य की तीसरी शक्ति के पोजिशन पर प्रशांत किशोर की नजर है। अगर जनसुराज ने 10% वोट हासिल कर लिए तो बिहार में उसकी पैठ मजबूत होगी। आगे चलकर जनसुराज थर्ड फ्रंट बन सकता है।

सिचुएशन-3ः तेजस्वी हारे तो महागठबंधन में नेतृत्व को मिलेगी चुनौती

अगर महागठबंधन को बहुमत नहीं मिलता है, तो तेजस्वी यादव को गठबंधन के भीतर चुनौती मिल सकती है। अभी से कांग्रेस का रूख तेजस्वी को लेकर बहुत पॉजिटिव नहीं बताया जा रहा है। आगे कांग्रेस अपना अलग रास्ता अख्तियार कर सकती है।

तेजस्वी पर IRCTC घोटाले का भी आरोप है। इसके बाद अगला चुनाव 5 साल बाद होगा, उस वक्त तक वह विपक्ष में रहे और केस में सजा हो गई तो राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

4 में 3 एक्सपर्ट बोले-नीतीश ताकतवर बनकर सत्ता में बने रहेंगे

1. अमिताभ तिवारी, Vote Vibe के फाउंडर : वोटिंग बढ़ने से फायदा और नुकसान दोनों हो सकता है। बिहार में महिलाएं घरों से निकलकर वोट देने पहुंची हैं। वहीं नीतीश कुमार के कोर-वोटर्स ने भी बड़ी तादाद में वोट दिया है। ये उनकी तरफ से नीतीश कुमार के लिए एक फेयरवेल की तरह है।

2. राकेश प्रवीर, बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट : वोटिंग के बढ़ने से सरकार के जाने की संभावना कम है। जमीन पर नीतीश कुमार के प्रति कोई नाराजगी नहीं> लोगों में उनको हटाने को लेकर भी उतावलापन नहीं दिख रहा। ऐसे में नीतीश दमदारी से वापसी कर सकते हैं।

3. अभिरंजन कुमार, बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट : वोटिंग बढ़ने का फायदा प्रशांत किशोर को होता दिख रहा है। हालांकि नीतीश सरकार के बदलने की गुंजाइश कम है। महिलाओं को 10 हजार रुपए देना नीतीश कुमार के लिए कारगर साबित हो रहा है। जब-जब नीतीश को कमजोर आंका गया, उनकी ताकत बढ़ी है। 2024 लोकसभा चुनाव इसका उदाहरण है।’

4. अरविंद मोहन, पॉलिटिकल एनालिस्ट : बिहार में इतनी एग्रेसिव वोटिंग सत्ता बदलने के लिए ही होती है। अगले फेज में अगर यही ट्रेंड रहा तो सरकार जा सकती है। कल तक नीतीश कुमार के प्रति लोगों की सिंपैथी दिख रही थी, लेकिन आज की वोटिंग उससे उलट लग रही है।

बिहार में वोटिंग बढ़ने की 4 वजह

  • महिलाओं से जुड़े वादे- NDA और महागठबंधन दोनों की ओर से महिलाओं के लिए योजनाओं का वादा किया गया है। NDA की नीतीश सरकार ने तो चुनाव से पहले ही महिला रोजगार योजना के तहत 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए की पहली किस्त डाल दी है। वहीं महागठबंधन के तेजस्वी यादव ने महिलाओं को हर साल 30 हजार रुपए देने का वादा किया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि NDA और महागठबंधन के वादों के कारण महिलाएं बड़ी तदाद में वोट देने के लिए आईं।
    • SIR- पॉलिटिकल एनालिस्ट अरविंद मोहन कहते हैं, ‘वोटिंग के बढ़ने का कारण SIR भी हो सकता है। महागठबंधन ने इसे वोट चोरी का मुद्दा बनाया, जिसके चलते पिछड़ा और अति पिछड़ा वोटर इस बार बढ़-चढ़कर वोट देने पहुंचा।’ हालांकि सीनियर जर्नलिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘मृत वोटरों के नाम कटने से संख्या घटी है। हर बार जितना वोट पड़ता है, उतना ही पड़ा है। 65 लाख लोगों का नाम कटने से परसेंटेज बढ़ गया है।’
    • जनसुराज पार्टी- पॉलिटिकल एनालिस्ट पवन कोराडा के मुताबिक, बिहार में वोटिंग बढ़ने की एक वजह प्रशांत किशोर की जनसुराज का आना भी है। पीके के आने से लोगों के अंदर एक उम्मीद जागी है।
    • छठ पर्व- 2010 के बाद इस साल छठ पर्व के बाद वोटिंग हो रही है। ऐसे में बाहर से आए लोग वोट देने के लिए रुक गए हैं। जनसुराज और महागठबंधन ने भी छठ के लिए बिहार आए लोगों से अपील की थी कि वोट देकर ही जाएं। एक्सपर्ट मानते हैं कि इस कारण भी कुछ वोट बढ़ा है।

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