नई दिल्ली। दिल्ली के लाल किले के पास सोमवार शाम हुए भीषण कार विस्फोट में 15 लोगों की मौत हो गई, और इस कांड की सबसे बड़ी सुराग बनी वो हरियाणा नंबर की कार– HR26-7674।
पुलिस के मुताबिक, धमाके के वक्त इस गाड़ी में लोग सवार थे, और यही वाहन विस्फोट का केंद्र बना। गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नदीम खान के नाम पर है, लेकिन असली मालिक सलमान था, जिसने डेढ़ साल पहले इसे दिल्ली के ओखला निवासी देवेंद्र को बेच दिया था।
अब सवाल ये है कि क्या ये गाड़ी आतंकी साजिश का हिस्सा थी, या सिर्फ एक पुराना वाहन जो गलत हाथों में पहुँच गया? विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि इसकी गूंज चार किलोमीटर दूर तक सुनाई दी।
लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 4 के पास खड़ी इस कार ने अचानक धधकते गोले का रूप ले लिया। छह वाहन चपेट में आए, 20 से ज़्यादा क्षतिग्रस्त हुए। घायलों को लोक नायक अस्पताल पहुंचाया गया, जहां 24 से अधिक लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, एनएसजी और आतंकवाद निरोधी दस्ता अब इस गाड़ी के मालिकाना हक, बिक्री के दस्तावेज और संदिग्ध यात्रियों की तलाश में जुटा है। क्या सलमान, नदीम या देवेंद्र का कोई आतंकी कनेक्शन है? या फिर ये गाड़ी चोरी होकर आतंकियों के हाथ लगी? जांच की हर धागा अब इसी HR26-7674 से जुड़ रहा है।
धमाके में मरने वालों और घायलों को आनन-फानन में लोकनायक (एलएन) अस्पताल लाया गया, वहां हर कोने में चीखें, सिसकियां और दौड़ते कदमों की आवाज गूंज रही थीं। अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में हर तरफ अफरा-तफरी का दर्दनाक माहौल था।
हर तरफ चीख-पुकार और डाक्टरों की भाग-दौड़। घायलों को स्ट्रेचर पर लाया जा रहा था, किसी के सिर पर गहरी चोट, किसी के कपड़े खून से सने हुए थे। डाक्टर और नर्सें पूरी शिद्दत से इलाज में जुटे थे। पर, मरीजों की संख्या इतनी अधिक थी कि एक-एक बेड के आसपास तीन-तीन घायल पड़े थे। किसी का हाथ नहीं था तो किसी का पैर उड़ गया था।
एक घायल की चेहरे का दाहिना हिस्सा ही उड़ गया था। आंख निकल कर बाहर आ गई थी। दो महिलाओं के पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए थे। उन्हें उनके स्वजन असपताल लेकर आए। अस्पताल की ओर जाने वाले हर रास्ते पर एंबुलेंस और पुलिस की गाड़ियों के सायरन लगातार गूंज रहे थे।
घायलों को अस्पताल लाने वाले एंबुलेंस चालकों गौतम और मोहम्मद फैजान ने बताया कि वह करीब पांच मृत शरीर को अस्पताल लेकर आए, जिनमें से किसी का भी शरीर पूरा नहीं था। हर किसी का कोई न कोई अंग गायब और क्षत-विक्षित था।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अस्पताल में कुल 28 लोग लाए गए। घायलों में दो महिलाएं भी थीं। कई घायलों की हालत नाजुक है, जिनमें से कुछ को आइसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया है। अस्पताल प्रशासन ने रातभर इमरजेंसी ड्यूटी बढ़ा दी है। एक वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया् ‘घायल ज्यादातर विस्फोट की तीव्र लहर और लोहे के छर्रों से बुरी तरह झुलसे हुए हैं। कई के अंग कट गए हैं। एक की तो आंख ही बाहर निकल आई हैं, चेहरा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त है। एक महिला की हालत भी बेहद नाजुक बताई जा रही है।’
अस्पताल के बाहर का दृश्य भी दिल दहला देने वाला था, स्वजन अपनों को खोजते हुए इधर-उधर भाग रहे थे, कोई नाम पुकार रहा था, कोई तस्वीर दिखा रहा था, कोई रोते हुए डाक्टरों और सुरक्षाकर्मियों से जवाब मांग रहा है। एक महिला दरवाजे के बाहर बेसुध बैठी थी, उसका बेटा धमाके की जगह पर ठेली लगाता था। वह बार-बार पूछ रही है, मेरा बेटा कहां है और कैसा मुझे बता दो पर, किसी के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।
भागीरथी पैलेस में दवा का व्यवसाय करने वाले जगदीश कटारिया अपने बेटे अमर की तलाश में अपने अन्य दो बेटों के साथ अस्पताल पहुंचे हुए थे, उन्हें अंदर नहीं जाने दिया जा रहा था। वह अपने बेटे की कुशलता जानने को परेशान थे। हर किसी से पूछ रहे थे कि उनके बेटे ने सफेद पैंट और काली जैकेट पहनी हुई थी, कोई उसके बारे में बता दो। पर, अस्पताल स्टाफ से लेकर सुरक्षाकर्मी उनकी मदद नहीं कर रहे थे।
अतिरिक्त डाक्टर व नर्स बुलाए गए, रक्त का भी किया इंतजाम
स्थिति के मद्देनजर अस्पताल प्रशासन ने अतिरिक्त डाक्टरों और नर्सों को ड्यूटी पर बुला लिया है। खून की कमी से जूझ रहे घायलों के लिए ब्लड बैंक में अतिरिक्त रक्त का इंतजाम किया गया। अस्पताल परिसर में जन औषधि केंद्र से सभी आवश्यक दवा और अन्य जरूरी सामान भी आनन-फानन में मंगा लिया गया।
घायलों के अस्पताल पहुंचते ही दिल्ली पुलिस ने अस्पताल परिसर को घेर लिया था। दिल्ली पुलिस स्पेशल ब्रांच और फोरेंसिक टीमें भी घटनास्थल और अस्पताल दोनों जगह मौजूद थीं। आम लोगों को प्रवेश से रोक दिया गया था। जिनके मरीज पहले से अस्पताल में भर्ती थे, उनके परिचय पत्र देख कर और भर्ती मरीज की पहचान करने के बाद ही अंदर जाने दिया रहा था।
रात 10 बजे तक एंबुलेंस के आने की की आवाजें आ रही थीं, धीरे-धीरे कर अस्पताल के बाहर और अंदर अपने करीबी की कुशलता जानने को स्वजनों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। हर चेहरा डर, बेचैनी और अनिष्ट की आशंका में डूबा हुआ था। दिल्ली एक बार फिर दर्द और दहशत के साये में थी, जहां लाल किले के धमाके के बाद एलएनजेपी की दीवारें आंसुओं और चीखों से भर उठी थीं।











