लाल किला विस्फोट एक चेतावनी? पाकिस्तान-बांग्लादेश की करीबी नया खतरा

लेखक:अजय साहनी
लाल किला मेट्रो स्टेशन की पार्किंग में 10 नवंबर को हुए विस्फोट पर सोशल मीडिया में भले ही तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हों, आधिकारिक तौर पर ठोस जानकारी बहुत कम है। इतना स्पष्ट है कि इस विस्फोट को आतंकवादी कृत्य की तरह लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे साजिश बताते हुए कह चुके हैं कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। देश की प्रमुख आतंकवाद रोधी एजेंसी एनआईए इस मामले की जांच की अगुवाई कर रही है।

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युद्ध की कार्रवाई: ऑपरेशन सिंदूर के बाद जिस तरह से सरकार ने यह लकीर खींच दी थी कि अब हर आतंकवादी कृत्य को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा, उसे देखते हुए यह अब सख्त कार्रवाई की संभावना है। प्राथमिक जांच के आधार पर लाल किला विस्फोट का मुख्य संदिग्ध पुलवामा के उमर उन नबी को बताया जा रहा है। जांच में फरीदाबाद और कई अन्य स्थानों पर बड़ी संख्या में मिले विस्फोटकों से इस मामले के संभावित जुड़ाव को भी परखा जा रहा है।

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खतरा बरकरार: साल 2013 में पटना में हुए बम विस्फोट के बाद से देश में कश्मीर के बाहर कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई थी। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या दिल्ली का 2025 का यह विस्फोट अपने आप में अकेली घटना है या इसे किसी व्यापक रणनीतिक बदलाव का संकेत मानना चाहिए?

ध्यान रहे, इस्लामी आतंकवाद से जुड़ी साजिशों के मामले में इस साल जम्मू-कश्मीर से बाहर कम से कम 82 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। 2024 में यह संख्या 80 थी। जाहिर है, देश भर में आतंकवादी हमलों के खतरे बने हुए हैं। हालांकि ज्यादातर साजिशों को नाकाम किया जा रहा है, लेकिन दिल्ली विस्फोट ने दिखाया है कि कोई भी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से अभेद्य नहीं होती।

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आतंकी रणनीति में बदलाव: जम्मू कश्मीर में घुसपैठ अब मुश्किल हो गई है और आतंकवादियों के लिए वहां स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद भू राजनीतिक हालात में आए बदलाव, खासकर अमेरिका और चीन के साथ पाकिस्तान की करीबी ने वहां बैठे आतंक के आकाओं का मन बढ़ा दिया है। ऐसे में संभव है कि वे 1997-2011 की अवधि वाले पैटर्न को फिर से शुरू करना चाहें जिसमें पाक समर्थित आतंकवादी समूहों के संयुक्त अभियानों को स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया-इंडियन मुजाहिदीन (SIMI-IM) के लोकल कॉडर की मदद से अंजाम दिया जाता था।

संगठित नेटवर्क तहस-नहस: हालांकि ऐसी कोई भी कोशिश उनके लिए आसान नहीं साबित होने वाली। वजह यह है कि इस बीच आतंकवादियों के समर्थन का संगठित नेटवर्क तहस-नहस किया जा चुका है, जम्मू कश्मीर के बाहर आतंकवाद के किसी ढांचे की मौजूदगी नहीं रह गई है और देश की आतंकवाद रोधी संरचना की क्षमता में जबरदस्त इजाफा हो चुका है।

भारत पर उठाई उंगली: इस संदर्भ में यह बात मायने रखती है कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘तेजी से न्याय करने’ की घोषणा के कुछ घंटों के अंदर 11 नवंबर को इस्लामाबाद के जिला न्यायालय में आत्मघाती आतंकी हमला हुआ, जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई। पाकिस्तान के पीएम शाहबाज शरीफ ने तत्काल इस ‘कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले’ के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया। दूसरी तरफ पाकिस्तानी मीडिया ने लाल किला वाली घटना को ‘रहस्यमय विस्फोट’ के रूप में पेश किया।

NIA delhi blastइस धमाके की जांच एनआईए के हवाले कर दी गई है

बांग्लादेश कनेक्शन: सीमा के दोनों तरफ यह तनाव ऐसे समय में बढ़ रहा है जब न केवल दुनिया की भू राजनीतिक स्थिति नाजुक दौर से गुजर रही है बल्कि दक्षिण एशिया में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के गहराते रिश्ते भारत की चिंता बढ़ा रहे हैं। ध्यान रहे, 90 के आखिरी और 2000 के शुरुआती वर्षों में चलाए गए ज्यादातर संयुक्त आतंकी अभियानों में हरकत-उल-जिहाद इस्लामी-बांग्लादेश की अहम भूमिका थी।

हालात हो सकते हैं बदतर: ऐसे में अगर लाल किला विस्फोट अपने आप में अकेली घटना साबित होता है तो भी इसके परिणामस्वरूप भारत-पाकिस्तान के बीच छद्म संघर्ष तेज होने के पूरे आसार हैं। भारत का नेतृत्व जिस तरह के तेवर दिखा रहा है, उसके मद्देनजर अगर जांच में पाकिस्तानी आतंकी तत्वों का हाथ सामने आया तो कड़े जवाबी कदम को टालना मुश्किल होगा। जाहिर है, मौजूदा हालात में लाल किला विस्फोट दर्शाता है कि इस्लामी आतंकवाद का खतरा न केवल बना रहने वाला है बल्कि इसके और बढ़ने के आसार हैं।
(लेखक इंस्टिट्यूट फॉर कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के एक्जीक्युटिव डायरेक्टर हैं)

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