ताहा शाह बदुशा आधुनिक मर्दानगी पर अपने विचार रखते हुए मना रहे हैं जन्मदिन

मुंबई। हमेशा की तरह करिश्माई ताहा शाह बदुशा आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं, और हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि इस बार का जन्मदिन, उनके पिछले मनाए गए जन्मदिन से काफी अलग महसूस हो रहा है। वे कहते हैं, “पिछले सालों में मेरा फोकस हमेशा करियर पर रहा है, लेकिन इस वर्ष बात सिर्फ काम की नहीं है; यह अपने विकास, अपनी जागरूकता के साथ यूनिवर्स से जुड़ने के बारे में भी है।

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साथ ही मुझे यह भी लगता है कि ज़्यादा लोगों की बजाय सही लोगों को पास रखना ही असली मायने रखता है। यही वजह है कि इस बार मैं अपना जन्मदिन अपने कुछ ख़ास लोगों के साथ मना रहा हूँ, जो मेरे लिए मायने रखते हैं।” हालांकि ये एक ख़ूबसूरत संयोग है कि उनका जन्मदिन अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन पड़ता है। यह एक ऐसा दिन है, जो उन्हें पीढ़ियों के साथ बदलती मर्दानगी की परिभाषा पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।

इस बारे में वे कहते हैं, “पहले के दौर में, खासकर विभाजन के बाद के वर्षों में, पुरूष काफ़ी मज़बूत और कठोर हुआ करते थे, शायद वक्त ने उन्हें ऐसा ही बनाया था। फिर आया 2000 का दशक, जहां लड़के नए अनुभवों के साथ मर्द बने, लेकिन आज की पीढ़ी खुली, तरल और निरंतर बदलती हुई है। मर्द की परिभाषा बदल गई है। हालांकि मेरे लिए एक मर्द वही है जिसमें ईमानदारी हो, धैर्य हो, शांति हो, और समर्पण हो।” उनके अनुसार, यह बदलाव सिर्फ असल जीवन में नहीं, बल्कि पर्दे पर भी दिखाई देता है।

ताहा मानते हैं कि आज की ऑडियंस उन पुरुष पात्रों को पसंद करती है, जो अल्फा एनर्जी की बजाय अपनी नर्मी को अपनाते हैं और ‘हीरामंडी’ में उनका निभाया किरदार इसका उदाहरण है। ‘हीरामंडी’ में निभाए अपने उस किरदार के बारे में वे कहते हैं, “लोग फिर से रोमांस को तरस रहे हैं, कुछ ऐसा कोमल, जिसे देखकर वे फिर से प्यार महसूस कर सकें। हाल के कंटेंट में बहुत तीव्रता और हिंसा रही है, यही वजह है कि ‘हीरामंडी’ और ‘सैयारा’ सफल रही, क्योंकि प्यार अब एक दुर्लभ चीज़ बन चुकी है और लोग उसे महसूस करना चाहते हैं।”

ताहा आज के समय में पुरुषों की भावनात्मक नर्मी के भी समर्थक हैं, जिसे पहले अक्सर दबाया जाता रहा है। वे कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि एक पुरुष को अपनी कमजोरियों से दूरी बनानी चाहिए, बल्कि उसे उससे जुड़े रहना चाहिए क्योंकि आज की दुनिया में आपको मज़बूत भी होना है और संवेदनशील भी। हालांकि आज के पुरुष पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक भावनात्मक रूप से उपलब्ध हैं, लेकिन सीखने की गुंजाइश अभी भी है।

अब देखिए, हमारे पिता और दादाओं में धैर्य और आत्म-नियंत्रण था। उनके पास हमारे जैसे विचलित करने वाले साधन नहीं थे और हमें उनसे यही सीखना है, जिससे हम भी उनकी तरह अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन कर सकें।” फिलहाल विकास, संवेदनशीलता और आधुनिक मर्दानगी की बदलती भावना का स्वागत करते हुए अपने जीवन को अधिक मीनिंगफुल और सहज बनाने की चाह रखनेवाले ताहा शाह बदुशा 38वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तो आइए उनके जन्मदिन पर उनके विचारों का स्वागत करते हुए उन्हें उनके जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं दें।

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