पुतिन की भारत यात्रा ने बढ़ाई अमेरिका की बेचैनी बढ़ाई, ट्रंप का टैरिफ हुआ बेअसर!

नई दिल्ली। अमेरिका और भारत के बीच पिछले 25 वर्षों में बने सबसे मजबूत सामरिक तालमेल पर अब अविश्वास, व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक दबावों की परतें चढ़ने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संबंधों की यह गिरावट ऐसे समय हो रही है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी कर रहे हैं।

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भारत के इस कदम ने अमेरिका के सियासी गलियारों में असहजता और बढ़ा दी है।सेंटर फार अ न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (सीनैस) में आयोजित चर्चा के दौरान रिचर्ड फोंटेन ने कहा कि पिछले ढाई दशक से दोनों देशों ने मिलकर संबंधों को चीन के प्रभाव से निपटने के लिए मजबूत करने में लगातार निवेश किया था, लेकिन अब हम बिल्कुल अलग स्थिति में पहुंच गए हैं।

सीनैस में हिंद-प्रशांत सुरक्षा कार्यक्रम की निदेशक और वरिष्ठ फेलो लीजा कर्टिस ने कहा कि दोनों देशों के संबंध बीते 25 वर्षों में सबसे बदतर आकार में हैं। ऐसे माहौल में मोदी-पुतिन मुलाकात “वाशिंगटन को गलत समय” पर होती दिखेगी, पर यह भी “स्वाभाविक” है क्योंकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता दिखा रहा है।

अमेरिका के दबाव में नहीं आएगा भारत

उन्होंने कहा कि पुतिन के जरिये भारत ने प्रदर्शित किया है कि वह अमेरिका से डरनेवाला नहीं है। ‘प्राकृतिक सहयोगी’ की धारणा कमजोरओआरएफ अमेरिका की लिडसे फोर्ड ने कहा कि दोनों तरफ अब ऐसे राजनीतिक नेता कम हो चुके हैं जो रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए निजी ऊर्जा लगाते थे।

उन्होंने कहा कि अमेरिका-भारत साझेदारी कभी भी स्वाभाविक या आसान नहीं रही। फोर्ड के अनुसार, चीन के उभार से पैदा हुआ दीर्घकालिक खतरा अब भी दोनों देशों को फिर से करीब लाने की मुख्य वजह है, लेकिन इसके लिए भरोसा बहाल करना आवश्यक है।

भारत का ‘विविधतापूर्ण माडल’ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की तन्वी मदान ने कहा कि भारत की रूस और चीन के साथ चालू कूटनीतिक गतिविधियां किसी “नई धुरी” की शुरुआत नहीं, बल्कि पुरानी ‘विविधताभरी रणनीति’ का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि मास्को के पाकिस्तान औरचीन के साथ बढ़ते तालमेल के कारण रूस-भारत संबंधों की अपनी सीमाएं भी हैं। राजनीतिक तनावों के बावजूद अमेरिका संग रक्षा अभ्यास और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में कार्यात्मक साझेदारी बनी हुई है।

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