क्या इतिहास के कठिन सवालों से अब भी घबराता है हमारा तंत्र

साल 1995 में पंजाब से एक ऐसी घटना सामने आई जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को उनके अमृतसर स्थित घर के बाहर से कथित तौर पर पुलिसकर्मी उठाकर ले गए। इसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटे। परिवार लगातार न्याय की गुहार लगाता रहा। मामला अदालतों तक पहुंचा, जांच हुई और वर्षों चली कानूनी प्रक्रिया के बाद इस प्रकरण में कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया।

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हालांकि, आज तक जसवंत सिंह खालड़ा का शव बरामद नहीं हो सका। यही अधूरा सच आज भी भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल खड़े करता है। जसवंत सिंह खालड़ा उस दौर में चर्चा में आए थे जब उन्होंने पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित तौर पर बड़ी संख्या में अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों पर दस्तावेजी जानकारी जुटाई थी। उनके दावों ने देश-विदेश में व्यापक बहस छेड़ दी थी।

यही कारण है कि उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘पंजाब 95’, जिसका नाम बाद में बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया, शुरू से ही विवादों के केंद्र में रही। चार वर्षों तक प्रमाणन और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझने के बाद जब फिल्म अंततः प्रदर्शित हुई, तो महज दो दिन बाद ही उसे भारत में मंच से हटा दिया गया। इसके साथ ही एक बार फिर वही पुराना सवाल उठ खड़ा हुआ—क्या भारत में इतिहास के संवेदनशील अध्यायों को सिनेमा के माध्यम से दिखाना आज भी आसान नहीं है?

जी5 ने आधिकारिक बयान जारी कर फिल्म को भारत में अनुपलब्ध करने की पुष्टि की और कहा कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे दोबारा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर उस बहस को जीवित कर दिया है, जो आजाद भारत में दशकों से चल रही है—क्या भारत में सिनेमा को इतिहास के कठिन अध्याय दिखाने की पूरी आजादी है, या फिर कुछ सच आज भी पर्दे तक नहीं पहुंच सकते?

किसी भी लोकतांत्रिक देश में सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता। वह समाज का आईना भी होता है, इतिहास का दस्तावेज भी और कई बार सत्ता से सवाल पूछने का सबसे प्रभावशाली जरिया भी। यही कारण है कि दुनिया भर में कई ऐसी फिल्में बनीं, जिन्होंने सरकारों को असहज किया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।

यदि केवल ‘सतलुज’ की बात करें तो यह विवाद नया नहीं है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब के उस दौर से प्रेरित बताई जाती है, जब आतंकवाद, फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों पर लगातार सवाल उठते रहे। निर्देशक हनी त्रेहान पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि फिल्म को प्रमाणन के दौरान अनेक संशोधनों की मांग का सामना करना पड़ा। शीर्षक बदलने से लेकर कई दृश्यों और संदर्भों पर आपत्तियां जताई गईं। सवाल यह नहीं है कि सेंसर बोर्ड को आपत्ति जताने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि क्या दर्शकों को स्वयं तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वे क्या देखना चाहते हैं?

दरअसल, ‘सतलुज’ पहली फिल्म नहीं है, जिसने ऐसी स्थिति का सामना किया हो। भारतीय सिनेमा का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है।

भारत की पहली बड़ी प्रतिबंधित फिल्मों में ‘आंधी’ (1975) का नाम लिया जाता है। गुलजार के निर्देशन में बनी इस फिल्म को आपातकाल के दौरान प्रदर्शन से रोक दिया गया था क्योंकि माना गया कि इसकी कहानी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छवि से मेल खाती है। बाद में सरकार बदलने के बाद फिल्म फिर से प्रदर्शित हुई और आज उसे भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है।

इसके बाद ‘किस्सा कुर्सी का’ (1977) का मामला सामने आया। यह एक राजनीतिक व्यंग्य फिल्म थी, जिसे आपातकाल के दौरान न केवल प्रतिबंधित किया गया बल्कि उसकी प्रिंट तक नष्ट कर दिए जाने के आरोप लगे। आज यह घटना भारतीय लोकतंत्र में सेंसरशिप के सबसे चर्चित अध्यायों में शामिल है।
‘बैंडिट क्वीन’ (1994) भी लंबे समय तक कानूनी विवादों में उलझी रही। फूलन देवी के जीवन पर आधारित इस फिल्म को अश्लीलता और मानहानि के आरोपों के कारण रोक दिया गया था। बाद में न्यायालय की अनुमति मिलने के बाद ही यह सिनेमाघरों तक पहुंच सकी।

इसी तरह ‘फायर’, ‘वॉटर’, ‘ब्लैक फ्राइडे’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘पद्मावत’, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरखा’ और ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्मों ने भी अलग-अलग कारणों से विरोध, कानूनी लड़ाई या सेंसरशिप का सामना किया। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी फिल्मों के विवादों के कारण अलग-अलग थे। कहीं धार्मिक भावनाओं का सवाल था, कहीं राजनीतिक संवेदनशीलता, कहीं मादक पदार्थों की समस्या तो कहीं सामाजिक विषयों की प्रस्तुति। लेकिन एक बात लगभग हर मामले में समान रही—विवाद ने फिल्मों को जितना रोका, उससे कहीं अधिक चर्चा दिलाई।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या किसी फिल्म को रोक देना वास्तव में समाधान है?

डिजिटल युग में किसी भी फिल्म या विचार को पूरी तरह रोक पाना लगभग असंभव हो चुका है। प्रतिबंध अक्सर जिज्ञासा बढ़ा देता है। जिन लोगों ने कभी उस फिल्म का नाम भी नहीं सुना होता, वे भी उसके बारे में जानने लगते हैं। ऐसे में प्रतिबंध कई बार अपने उद्देश्य के विपरीत परिणाम देता है।
यह भी समझना होगा कि सरकार और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अपना दृष्टिकोण होता है। उनका तर्क रहता है कि कुछ फिल्में कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द या संवेदनशील सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती हैं। यह जिम्मेदारी भी किसी लोकतांत्रिक शासन का हिस्सा है। लेकिन दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी भारतीय संविधान के मूल अधिकारों में शामिल है। इसलिए हर बार जब किसी फिल्म पर रोक लगती है, तो यह संतुलन फिर से चर्चा का विषय बन जाता है।

भारत में फिल्म प्रमाणन व्यवस्था पर लंबे समय से यह बहस चल रही है कि क्या सेंसर बोर्ड का काम फिल्मों में बदलाव करवाना होना चाहिए या केवल उन्हें आयु वर्ग के अनुसार प्रमाणित करना? अमेरिका, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में प्रायः फिल्में वर्गीकृत की जाती हैं। दर्शकों को बताया जाता है कि फिल्म किस आयु वर्ग के लिए उपयुक्त है, लेकिन सामग्री में हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम होता है। भारत में अभी भी कई मामलों में बोर्ड संशोधन, कट और संवाद बदलने जैसी शर्तें रखता है।

यदि कोई फिल्म इतिहास के किसी कठिन दौर, राजनीतिक घटनाओं या मानवाधिकार जैसे विषयों पर आधारित है, तो उससे असहजता होना स्वाभाविक है। लेकिन क्या इतिहास को केवल इसलिए नहीं दिखाया जाना चाहिए क्योंकि वह असुविधाजनक प्रश्न खड़े करता है? लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह कठिन सवालों से भागता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है।

सतलुज’ का मामला भी केवल एक फिल्म का मामला नहीं है। यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें यह तय होना बाकी है कि भारतीय दर्शकों पर कितना भरोसा किया जाए। क्या हम इतने परिपक्व नहीं हैं कि किसी फिल्म को देखकर अपनी राय स्वयं बना सकें? यदि किसी फिल्म में तथ्यात्मक त्रुटि है, तो उसका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। यदि कोई पक्षपात है, तो उसके विरोध में दूसरी फिल्म या दूसरा विमर्श सामने आना चाहिए। लेकिन बार-बार प्रतिबंध का रास्ता चुनना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक आत्मविश्वास—दोनों पर प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है।

आज जरूरत इस बात की नहीं है कि हर विवादित फिल्म का समर्थन किया जाए या हर सरकारी निर्णय का विरोध। जरूरत इस बात की है कि सेंसरशिप के फैसले अधिक पारदर्शी हों, उनके कारण स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किए जाएं और दर्शकों को अधिक परिपक्व मानते हुए उन्हें निर्णय लेने का अवसर दिया जाए।
क्योंकि इतिहास को छिपाने से इतिहास बदलता नहीं है। उसे समझने, उस पर बहस करने और उससे सीखने का अवसर जरूर कम हो जाता है। शायद यही वह सवाल है, जिस पर भारत को अब गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

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