नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 सितंबर को एक बार फिर भारतीयों से सोना न खरीदने की अपील की, जिससे यह कीमती पीली धातु एक बार फिर चर्चा में आ गई है। इसी साल मई के बाद पीएम की यह दूसरी ऐसी अपील है, जिसके कारण ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई है। माना जा रहा है कि त्योहारों और शादियों के अहम सीजन से ठीक पहले इस अपील से बिक्री पर बुरा असर पड़ सकता है। मध्य एशियाई देश किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक से मंगलवार को वीडियो मैसेज के जरिए की गई यह अपील ऐसे समय में आई है जब भारत ने इस तिमाही में उम्मीद से बेहतर 7.8% की आर्थिक वृद्धि दर्ज की है।
PM मोदी ने अब क्या कर दी बड़ी अपील
- भारतीय परिवारों के लिए सोना अक्सर सिर्फ गहनों से कहीं ज्यादा होता है। यह बचत, सुरक्षा और परंपरा तीनों का मेल है। फिर भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीयों से इसे खरीदने से पहले अच्छी तरह सोचने के लिए कह रहे हैं, जब तक कि इसकी सचमुच जरूरत न हो।
- इस साल की गई ऐसी दूसरी अपील के कारण ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट आई है, क्योंकि त्योहारों और शादियों के अहम सीजन से ठीक पहले इस कदम से बिक्री पर असर पड़ सकता है।
- मंगलवार को मोदी ने अपनी अपील दोहराते हुए लोगों से कहा कि वे सोने की गैर-जरूरी खरीदारी से बचें और इसके बजाय ‘स्वदेशी’ और आत्मनिर्भरता पर ज्यादा जोर दें।
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सोने का आयात और भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
- भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना इस्तेमाल करने वाले देशों में से एक है, लेकिन मांग के मुकाबले घरेलू उत्पादन बहुत कम है। इसलिए, ज्वेलरी और निवेश के लिए इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर सोने का आयात करना पड़ता है।
- द इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेल के बाद सोना भारत में सबसे ज़्यादा आयात की जाने वाली चीज है और यह व्यापार घाटे में बड़ी भूमिका निभाता है। अप्रैल से शुरू हुए वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में सोने का आयात पिछले साल के मुकाबले 32% से ज्यादा बढ़ गया, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा। जुलाई में व्यापार घाटा बढ़कर लगभग 32 अरब डॉलर हो गया, जो जनवरी के बाद सबसे ज्यादा है।
- पिछले साल के मुकाबले FY26 में भारत का सोना आयात बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 बिलियन डॉलर हो गया। 2023-24 में इंपोर्ट 45.54 बिलियन डॉलर और 2022-23 में 35 बिलियन डॉलर था।
भारतीय परिवारों के लिए यह कीमती धातु सिर्फ सजावट की चीज नहीं, बल्कि एक मुख्य फाइनेंशियल एसेट है, जो महंगाई और व्यापक आर्थिक अनिश्चितता से बचाव का काम करती है।सोने के इंपोर्ट का रुपये पर क्या असर पड़ता है?
जब सोने का इंपोर्ट बढ़ता है, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ता है। इससे रुपया कमजोर होता है। पश्चिम एशिया में युद्ध और उसके बाद कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पहले से ही दबाव में है।
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प्रधानमंत्री ने ऐसी अपील क्यों की?
- घरेलू मांग पूरी करने के लिए सोना आयात करना जरूरी नहीं है। इसके बजाय, इसे रीसायकल किया जा सकता है, बेचा जा सकता है या लोन के लिए गिरवी रखा जा सकता है।
- सरकार सोने के आयात को कम करने के लिए कई तरीके अपना रही है, जिसमें इस साल की शुरुआत में आयात शुल्क को 15 प्रतिशत तक बढ़ाना और आयात नियमों को सख्त करना शामिल है। पूरे साल, ज्वैलरी रिटेलर्स भारतीय घरों में रखे ‘बेकार पड़े सोने’ के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए पहल करते रहे हैं, क्योंकि सरकार आयात को रोकने के लिए आयात शुल्क बढ़ा रही है।
ज्वैलरी कंपनियों के शेयरों में गिरावट क्यों आई?
- मई में मोदी की अपील के बाद कि एक साल तक सोना न खरीदें, बड़ी ज्वैलरी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई। टाइटन, कल्याण ज्वैलर्स और सेंको गोल्ड जैसी कंपनियों पर इसका असर पड़ा और कई शेयरों में 10 प्रतिशत तक की गिरावट आई।
- नई अपील से भी कुछ ऐसा ही असर हुआ। टाइटन कंपनी के शेयर 1.12 प्रतिशत गिरकर 5,045.50 रुपये पर आ गए, जबकि कल्याण ज्वैलर्स के शेयर 4.50 प्रतिशत गिरकर 587 रुपये पर आ गए। ऐसी अपील से सोने के गहनों की मांग कम हो सकती है, जिससे बिक्री की मात्रा में गिरावट आ सकती है।
सितंबर से फरवरी तक का समय बेहद अहम
- सितंबर से फरवरी का समय ज्वैलरी इंडस्ट्री और बड़े रिटेल सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान त्योहारों का मौसम शुरू होता है और उसके बाद शादी-ब्याह का मौसम आता है।
- सोने की मांग में कमी या ज्यादा रीसाइक्लिंग से आयात कम करने में मदद मिल सकती है। इससे देश का व्यापार घाटा कम हो सकता है और डॉलर की मांग घट सकती है, जिससे रुपये पर दबाव कम होगा।
सितंबर से फरवरी का समय ज्वैलरी इंडस्ट्री और बड़े रिटेल सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान त्योहारों का मौसम शुरू होता है और उसके बाद शादी-ब्याह का मौसम आता है।पीएम की अपील में सोना ही क्यों?
- दरअसल, इस बात का जवाब भारत की आयातित सोने पर निर्भरता और उस पर खर्च होने वाली भारी विदेशी मुद्रा में छिपा है। भारत कम सोना खरीद रहा है, लेकिन खर्च बहुत ज्यादा कर रहा है। आयात के ताजा आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। वित्त वर्ष 2026 में भारत का सोने का आयात बिल रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के लगभग 58 अरब डॉलर से 24% से ज्यादा है। साथ ही, देश में आने वाले सोने की मात्रा में असल में लगभग 5% की कमी आई।
- आयात वित्त वर्ष 2025 में 757.09 टन से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 721.03 टन हो गया। तो कम मात्रा के बावजूद बिल इतनी तेजी से कैसे बढ़ा? इसका जवाब यह है कि सोने की कीमतें बढ़ गई हैं। भारत आयात किए जाने वाले हर टन सोने के लिए काफी ज्यादा कीमत चुका रहा है, जिससे कुल आयात बिल बढ़ गया है, भले ही खरीदी गई सोने की मात्रा कम हो गई है।
भारत आयात किए जाने वाले हर टन सोने के लिए काफी ज्यादा कीमत चुका रहा है, जिससे कुल आयात बिल बढ़ गया है, भले ही खरीदी गई सोने की मात्रा कम हो गई है।सोने का आयात इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत अपनी खपत का बहुत छोटा हिस्सा ही सोना पैदा करता है और विदेशी आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर है। जब भारतीय खरीदार आयातित सोना खरीदते हैं, तो इस लेन-देन के लिए आखिरकार अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करना पड़ता है, जो ज्यादातर अमेरिकी डॉलर में होता है।
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पीएम मोदी की सोना कम खरीदने की अपील का मतलब
- सोने की ज्यादा मांग का मतलब है विदेशी मुद्रा की ज्यादा जरूरत यानी डॉलर बचाना। भारत के लिए यह बात इसलिए अहम है क्योंकि देश को कच्चे तेल और कई औद्योगिक सामानों जैसे दूसरे जरूरी इंपोर्ट पर भी डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। नतीजतन, सोने की गैर-जरूरी खरीद कम करने से इस धातु पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- पश्चिम एशिया में युद्ध संकट की वजह से तेल के दाम चढ़े तो विदेशी मुद्रा भंडार में तेजी से कमी आने लगी, क्योंकि आयात का भुगतान भी डॉलर में ही करना पड़ रहा था। इससे रुपया कमजोड़ पड़ने लगा। यही वजह है कि पीएम मोदी को रुपये को सहारा देने के लिए दोबारा ऐसी अपील करनी पड़ी।
- मोदी का ‘स्वदेशी’ का बड़ा तर्क: प्रधानमंत्री का संदेश भारतीयों को घरेलू स्तर पर बने उत्पादों को चुनने के लिए प्रोत्साहित करने की एक व्यापक मुहिम का भी हिस्सा है। उनका तर्क मूल रूप से यह है कि इंपोर्टेड सामान पर खर्च किया गया पैसा देश से बाहर चला जाता है, जबकि भारत में बने उत्पादों की मज़बूत मांग घरेलू व्यवसायों, मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती है।
- इंपोर्ट किए गए सोने का एक बड़ा हिस्सा आखिरकार ज्वेलरी मार्केट में पहुंचता है, जहां इसे प्रोसेस करके घरेलू स्तर पर बेचा जाता है।











