हेमंत राजौरा: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के हल्द्वानी कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण का विवाद पार्टी के लिए सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है। राहुल गांधी इसे दलित सम्मान, छुआछूत और सामाजिक बराबरी के बड़े सवाल से जोड़ रहे हैं और अब पार्टी देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। जातिगत जनगणना के तौर-तरीके पर राहुल और खरगे का पीएम को पत्र लिखना बताता है कि कांग्रेस दलित पिछड़े और सामाजिक न्याय के सवाल को राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान में बदलने की तैयारी में है।
राजनीतिक अवसर तलाश
यह रणनीति सिर्फ उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए नहीं है। राहुल का उद्देश्य सामाजिक न्याय को BJP के मुकाबले कांग्रेस के वैकल्पिक राष्ट्रीय नैरेटिव के रूप में स्थापित करना है। फिलहाल, कांग्रेस की आपत्ति है कि 2027 की जनगणना में प्रस्तावित जाति से जुड़ा सवाल OBC की वास्तविक संख्या बताने के लिए पर्याप्त नहीं है। खरगे और राहुल ने मौजूदा प्रश्नावली को बदलने और विस्तृत जातिगत जानकारी जुटाने की मांग की है।
इसके पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव का अनुभव भी है। तब यूपी में विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A ने 43 सीटें हासिल की। BJP 33 सीटों पर सिमट गई और उसकी सहयोगी रही RLD को दो और अपना दल (एस) को एक सीट मिली। लोकनीति-CSDS के पोस्ट पोल आंकड़ों में I.N.D.I.A को गैर-जाटव दलितों के करीब 56% वोट मिलने का अनुमान है। जाटवों में उसका समर्थन करीब 25% है। विभिन्न विश्लेषणों में भी 2024 में गैर-जाटव दलित वोट का एक हिस्सा BJP से खिसककर विपक्ष की ओर जाने को महत्वपूर्ण माना गया।
यहीं पर कांग्रेस राजनीतिक अवसर तलाश रही है। लेकिन, यह मौका कांग्रेस के वोट में तब्दील नहीं होने वाला है। कांग्रेस की नजर उन सीटों पर भी है जहां बहुजन समाज पार्टी (BSP) कमजोर हुई है। पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में BSP को एक भी सीट नहीं मिली थी और उसका वोट शेयर करीब 9.4% था। लेकिन, यह मानना अतिशयोक्ति होगी कि मायावती की सामाजिक विरासत खत्म हो गई है। जाटवों के बीच BSP अब भी मजबूत है।
सहयोगियों से भी मुकाबला
इस सामाजिक राजनीति का कांग्रेस का मुकाबला BJP के साथ-साथ अपने सहयोगियों से भी है। BJP ने पिछले दशक में दलित और गैर-यादव OBC के बीच मजबूत आधार बनाया है। दूसरी ओर, SP का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) फॉर्मूला भी उसी तबके को साधने के लिए है। अखिलेश यूपी में PDA को अपनी राजनीतिक ताकत बनाना चाहते हैं और कांग्रेस इसे राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय के व्यापक नैरेटिव में बदलना चाहती है।
राहुल नैरेटिव तो गढ़ सकते हैं, लेकिन उसे संगठन में तब्दील करना कांग्रेस के लिए चुनौती होगी। दलित-पिछड़ों का राजनीतिक आधार सिर्फ रैलियों और नारों से नहीं बनता, इसके लिए नेतृत्व, संगठनात्मक प्रतिनिधित्व और लगातार मौजूदगी चाहिए। इसलिए, हल्द्वानी विवाद को कांग्रेस राजनीतिक मुद्दा बनाती रहे, लेकिन उसकी असल परीक्षा दलितों के सम्मान मान से जुड़ी होगी। अगर कांग्रेस ऐसा कर पाती है, तो राहुल का यह दांव सिर्फ यूपी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में BJP के सामाजिक गठजोड़ के सामने कांग्रेस के नए सामाजिक गठबंधन की नींव रख सकता है।












