S-400 के बाद S-500 और Su-57 लड़ाकू विमान पर भारत की नजर

नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर में S-400 की जबरदस्त सफलता के बाद भारत की रूस के S-500 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और SU-57 स्टील्थ फाइटर जेट पर निगाहें है। SCO समिट से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच भारत-रूस रक्षा सहयोग पर अहम बातचीत हो रही है। यह चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब भारत अपनी एयर डिफेंस क्षमता मजबूत करने और लड़ाकू विमानों की कमी को दूर करने की कोशिश कर रहा है।

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भारत के पास पहले से ही रूस का S-400 एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके प्रदर्शन को लेकर सामने आई रिपोर्ट्स के बाद इस सिस्टम की क्षमता पर चर्चा और तेज हुई है। S-400 को थिएटर-लेवल एयर डिफेंस सिस्टम माना जाता है और इसकी अधिकतम इंटरसेप्शन रेंज करीब 400 किलोमीटर है।

50 हजार करोड़ में हुई थी S-400 की डील

भारत ने 2018 में करीब 5.43 अरब डॉलर के समझौते के तहत पांच S-400 स्क्वाड्रन का ऑर्डर दिया था। इनमें से चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवां और अंतिम स्क्वाड्रन नवंबर 2026 तक मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा भारत सरकार पांच और S-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे चुकी है, जिसकी कीमत 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है।

S-500 क्यों है खास?

S-400 और S-500 एक-दूसरे के विकल्प के बजाय लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। S-400 जहां विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कुछ बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए है, वहीं S-500 को इससे भी ऊंचे स्तर की सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, S-500 की इंटरसेप्शन क्षमता करीब 600 किलोमीटर तक हो सकती है और यह लगभग 180-200 किलोमीटर की ऊंचाई तक लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम है। यानी इसकी पहुंच धरती के वायुमंडल से आगे के निकट-अंतरिक्ष क्षेत्र तक बताई जाती है। S-500 को खास तौर पर बैलिस्टिक मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों जैसे अत्याधुनिक खतरों से निपटने के लिए विकसित किया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में इसकी संभावित एंटी-सैटेलाइट क्षमता का भी जिक्र किया गया है।

S-400 और S-500 मिलकर बनेंगे भारत का रक्षा कवच

अगर भारत S-500 को अपनी एयर डिफेंस प्रणाली में शामिल करता है तो दोनों प्रणालियां अलग-अलग स्तर पर काम कर सकती हैं। S-500 ऊंचाई और लंबी दूरी से आने वाले बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक खतरों को रोकने की कोशिश करेगा, जबकि S-400 विमान, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे पारंपरिक हवाई खतरों से निपट सकता है। यानी S-500, भारत की मौजूदा S-400 क्षमता को दोहराने के बजाय एयर डिफेंस की एक अतिरिक्त और ऊंची परत जोड़ सकता है। रूस लंबे समय से भारत को S-500 की पेशकश करता रहा है। 2021 में तत्कालीन रूसी उप प्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव ने भी संकेत दिया था कि भारत इस सिस्टम का पहला विदेशी खरीदार बन सकता है।

Su-57 स्टील्थ फाइटर भी चर्चा में

मोदी-पुतिन बातचीत में रूस का Su-57 फिफ्थ-जेनरेशन स्टील्थ फाइटर भी अहम मुद्दा बन सकता है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने विमान की क्षमताओं की तारीफ करते हुए कहा है कि यह भारत के साथ चर्चा में शामिल है। रूस ने भारत में Su-57 के लाइसेंस के तहत उत्पादन और इसमें भारतीय हथियारों को इंटीग्रेट करने की संभावना भी जताई है। इससे दोनों देशों के बीच पहले से चल रहे रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है।

पहले क्यों नहीं बनी बात?

S-500 और Su-57 को लेकर भारत और रूस के बीच पहले भी चर्चा होती रही है, लेकिन तकनीकी, वित्तीय और लॉजिस्टिक मुद्दों के चलते कोई बड़ा समझौता आगे नहीं बढ़ सका। पिछले साल दिसंबर में हुए भारत-रूस शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त बयान में भी इन दोनों प्रणालियों का जिक्र नहीं था। इसके अलावा रूस से बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने को लेकर अमेरिका की चिंताएं भी भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती बनी हुई हैं।

Sukhoi-30MKI अपग्रेड पर भी नजर

मोदी-पुतिन बातचीत का एजेंडा सिर्फ S-500 और Su-57 तक सीमित नहीं रहने की संभावना है। दोनों देश सैन्य लॉजिस्टिक्स में सहयोग बढ़ाने और एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों तक पारस्परिक पहुंच जैसे मुद्दों पर भी चर्चा कर सकते हैं।

भारत के Sukhoi-30MKI बेड़े के बड़े अपग्रेड पर भी बातचीत जारी है। इसमें रडार, एवियोनिक्स और हथियार प्रणालियों में सुधार शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य विमानों की सेवा अवधि बढ़ाने के साथ उनकी मारक क्षमता और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करना है।

IAF की कम होती स्क्वाड्रन संख्या बनी चुनौती

Su-57 पर चर्चा की एक बड़ी वजह भारतीय वायुसेना की लड़ाकू विमानों की कमी भी है। IAF की ऑपरेशनल स्क्वाड्रन संख्या लंबे समय से स्वीकृत संख्या से काफी कम है और करीब छह दशक के निचले स्तर पर बताई जा रही है।

दूसरी ओर चीन तेजी से अपनी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ा रहा है और छठी पीढ़ी के विमानों पर भी काम कर रहा है। भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम अभी विकास के चरण में है और इसके 2035 के बाद सेवा में आने की संभावना बताई जा रही है। ऐसे में Su-57 भारत के लिए स्वदेशी फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर के आने तक एक संभावित अंतरिम विकल्प बन सकता है।

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