दमनकारी सत्ता को भी चुनौती दी जा सकती है: नेहा बोरा

23 जुलाई को, आज़ाद भारत के सबसे काले दिनों में से एक के गुज़रने के दो दिन और कुछ घंटों बाद, नेहा बोरा जंतर-मंतर पर युवा भारतीयों की भीड़ को संबोधित करने के लिए खड़ी हुईं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में शोधार्थी और ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष, 29 वर्षीय नेहा ने अभी-अभी हाल ही में 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म की थी। लेकिन जिस जोशीले अंदाज में वह बात कर रही थीं, उससे उनके शरीर पर पड़े असर का अंदाज लगा पाना मुश्किल था।

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नेहा का वो जज़्बा भी उनके भाषण के रदीफ़  –‘सब याद रखा जाएगा’– की तरह ही याद रखा जाएगा। वह उस जरूरी संसद मार्च की बात कर रही थीं, जिसने सरकार का वह क्रूर चेहरा बेनकाब कर दिया था, जिसने दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और अज्ञात निजी मिलिशिया को प्रदर्शनकारियों पर जुल्म करने की खुली छूट दे दी थी। अगर किसी को सरकारी हिंसा के उस नग्न प्रदर्शन से जरा देर के लिए हार का एहसास हुआ भी होगा, तो नेहा के निडर हौसले ने उन्हें जरूर हिम्मत दी होगी।

बाद में अपने कुछ प्रशंसक मीडियाकर्मियों (हां, वे भी कॉकरोच की तरह बचे हुए हैं!) में से एक से बात करते हुए, उन्होंने अपने एक साथी की बात दोहराई कि उम्मीद को भी एक मांसपेशी (ताकत) की तरह इस्तेमाल करना चाहिए: “जब हमें उम्मीद नहीं मिलती, तो हम उस क्षमता का इस्तेमाल न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने आस-पास के लोगों के लिए भी कर सकते हैं।” नंदलाल शर्मा ने भविष्य की राह के बारे में जानने के लिए उनसे मुलाकात की। कुछ अंश:

आप इस विरोध को कैसे परिभाषित करेंगी? असल में यह किस बारे में था?

इसकी शुरुआत एक मुख्य मांग से हुई: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। लेकिन आपने देखा कि उसके बाद क्या हुआ।

सिस्टम इतना खराब हो चुका है कि अगर सरकार पेपर लीक रोकना भी चाहे, तो नहीं रोक सकती। यूजीसी-एनईटी के पेपर परीक्षा से पहले ही लीक हो गए थे। सीयूईटी के उम्मीदवारों को सर्वर फेल होने के कारण घंटों इंतजार करना पड़ा और बाद में उन्हें बताया गया कि उनकी परीक्षा दोबारा होगी, जबकि दूसरे छात्र उसी दिन अपनी परीक्षा दे रहे थे। सीबीएसई की मूल्यांकन में गलतियों के कारण गलत छात्रों को अंक दे दिए गए। यह कोई इक्का-दुक्का गलतियां नहीं हैं। यह पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाती हैं।

सरकारी भर्तियों में भी यही ढर्रा देखने को मिलता है। नोटिफिकेशन जारी किए जाते हैं, परीक्षाएं सालों तक टलती रहती हैं, पेपर लीक होते रहते हैं और नतीजे समय पर नहीं आते। छात्र अनिश्चितता के इस चक्र से तंग आ चुके हैं।

होना तो यह चाहिए था कि धर्मेंद्र प्रधान विफलताएं स्वीकार करते, उलटे उन्होंने तो विरोध कर रहे छात्रों को ‘आतंकवादी’ ही बता दिया। भाजपा नेताओं ने प्रदर्शनकारियों को ‘वायरस’ कहा। ऐसी भाषा बताती है कि छात्रों की दिक्कतों, उनकी चिंताओं के प्रति वे कितने संवेदनशील हैं!

आपने 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, जिससे प्रदर्शनकारियों के इरादे और भी मजबूत हो गए। उस दिन क्या हुआ था?

हमने अभी-अभी अपनी 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म की थी और जंतर-मंतर पर बैठे थे। हम कहीं भी मार्च करने की हालत में नहीं थे।

पुलिस ने खुद ही लोगों को संसद से दूर  जंतर-मंतर की तरफ भेजा। फिर, जब लोग वहां जमा हो गए, तो आंसू गैस छोड़ी गई और लाठीचार्ज किया गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को पीटा गया, कितनों की हड्डियां टूट गईं, सिर फट गए और उन्हें बुरी तरह जख्मी कर दिया गया। क्या इनमें से कुछ भी जरूरी था?

घायल छात्र लगातार हमारे टेंट में आ रहे थे, जहां वॉलंटियर डॉक्टरों द्वारा  उन्हें प्राथमिक उपचार दिया जा रहा था। इसी अफरा-तफरी के बीच आइसा टेंट के पीछे की एक दीवार गिर गई, जिससे भूख हड़ताल पर बैठे हमारे साथियों में से एक साथी घायल हो गया।

शुरुआत में अधिकारी इस बात से इनकार करते रहे कि पैलेट गन का इस्तेमाल भी किया गया था। आप ‘आउटलुक’ के पत्रकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी एवं ऑम्बेडकर यूनिवर्सिटी के उन छात्रों से पूछिए जो पैलेट की चपेट में आए थे। दिल्ली पुलिस का अपना रिकॉर्ड बताता है कि एक अधिकारी ने पैलेट गन के इस्तेमाल का आदेश दिया था। हमारे पास ऐसे दस्तावेज भी हैं जिनसे पता चलता है कि पैलेट गन जारी (इशू) की गई थीं।

अधिकारियों को एक सीधे-सादे सवाल का जवाब देना चाहिए: जिन लोगों की आंखें हमेशा के लिए खराब हो गईं, जिनकी सुनने की क्षमता चली गई या जिन्हें अन्य स्थायी किस्म का नुकसान हुआ, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कई छात्र अब भी अस्पताल में हैं, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है।

20 जुलाई के बाद, यह आंदोलन सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। उनका इस्तीफा आखिरकार मंजूर भी कर लिया गया, क्योंकि भाजपा और आरएसएस, दोनों ही समझ चुके थे कि जनता का गुस्सा अब प्रधानमंत्री तक पहुंच चुका है। पूरी भाजपा सरकार से ही जवाबदेही की मांग की जा रही थी, क्योंकि इतने व्यापक स्तर पर हिंसा ऊपर से मिले आदेशों के बिना नहीं हो सकती थी।

इसीलिए मैं कहती हूं कि असली जवाबदेही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की है।

सरकार ने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया था कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी…

हां। सरकार ने कहा था कि एनडीए और भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी मामले वापस ले लिए जाएंगे और गिरफ्तार सभी छात्रों को रिहा कर दिया जाएगा। बिहार और असम ने तो इसके लिए बाकायदा नोटिफिकेशन भी जारी किए थे। लेकिन पश्चिम बंगाल ने ऐसा नहीं किया।

और अब, नई शर्तें जोड़ी जा रही हैं; अदालतों में यह दलील दी जा रही है कि सिर्फ उन्हीं लोगों को रिहा किया जाए जिन पर पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। समझौता तो ऐसा नहीं था। सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि ‘सभी’ प्रदर्शनकारी रिहा किए जाएंगे और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। बिना शर्त वादा करने के बाद वे अब ‘चरित्र प्रमाण-पत्र’ बांटना नहीं शुरू कर सकते।

क्या अब आंदोलन केवल गिरफ्तार लोगों की रिहाई तक ही सीमित रह गया है?

नहीं। जंतर-मंतर पर धरना जरूर समाप्त हो गया है, लेकिन जब तक इन विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाला एक भी छात्र जेल में है या उस पर आपराधिक आरोप थोपे जा रहे हैं, तब तक यह आंदोलन जारी है।

जवाबदेही का सवाल अब भी कायम है। पेलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति कैसे दी गई? क्या दिल्ली में पेलेट गन का इस्तेमाल, या बिहार में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एके-47 के इस्तेमाल की खबरों को न्यू नॉर्मल मान लिया जाए?

योगेन्द्र यादव ने कहा है कि आंदोलन को सरकार से लिखित आश्वासन लेना चाहिए था। क्या आप इससे सहमत हैं?

हां। भूख हड़ताल के बाद मेरी तबीयत काफी खराब हो गई थी, इसलिए मैं मंच से की गई हर घोषणा सुन नहीं सकी। बाद में मुझे पता चला कि सरकार को लिखित जवाब देने के लिए 28 जुलाई तक का समय दिया गया था।

अब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि और ज्यादा दबाव डाला जाना चाहिए था। लिखित वचनबद्धता से हमारी स्थिति बहुत मजबूत होती और गिरफ्तार छात्रों की रिहाई की मांग करना कहीं ज्यादा आसान हो जाता।

इस आंदोलन का तालमेल कैसे बिठाया गया?

इसे किसी एक या दो व्यक्ति ने नहीं चलाया था। छात्र संगठनों और सीजेपी के प्रवक्ताओं ने मिलकर एक संयुक्त समन्वय समूह के तौर पर काम किया। हम हर बड़े फैसले से पहले नियमित बैठकें करते थे।

किसी को यह अंदाजा नहीं था कि 20 जुलाई को इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटेंगे। बातचीत लगभग पूरी तरह ठप हो गई। फोन नेटवर्क मुश्किल से काम कर रहे थे और इंटरनेट-आधारित मैसेजिंग तो लगभग नामुमकिन ही हो गई थी। ऐसे हालात में इतनी बड़ी भीड़ का तालमेल बिठाना बेहद मुश्किल काम था।

इसने हमें यह बताया कि भविष्य में बड़े पैमाने पर लोगों को एकजुट करने के लिए कहीं ज्यादा मजबूत तालमेल वाले सिस्टम की जरूरत होगी।

सरकार, और खासकर गृह मंत्री अमित शाह को जवाबदेह ठहराना कितना मुश्किल होगा?

यह बहुत मुश्किल होगा। देखिए, प्रधान का इस्तीफा लेना कितना मुश्किल था। अमित शाह तो गृह मंत्री हैं। पूरा सरकारी तंत्र वही संभालते हैं। उस पद पर बैठे व्यक्ति को जवाबदेह ठहराना बहुत मुश्किल काम है। यह एक ‘अपराधी राज्य’ है, जो अपने ही नागरिकों पर बेरहम हिंसा करता है और फिर मुकर जाता है कि ऐसा कभी हुआ भी था!

सार्वजनिक जीवन में आपकी पहचान काफी बढ़ी है। क्या आइसा और वामपंथ के प्रति मीडिया का नजरिया भी बदला है?

हर कुछ सालों में कोई न कोई यह कहता दिखाई देता है कि वामपंथ खत्म हो गया है। लेकिन फिर जनता का हर बड़ा आंदोलन कुछ और ही कहानी कहता है।

सीएए-विरोधी आंदोलन के दौरान वामपंथी विचारधारा वाले छात्र कार्यकर्ताओं ने अहम भूमिका निभाई। किसान आंदोलन के दौरान भी संयुक्त किसान मोर्चा में वामपंथी संगठन अहम हिस्सा थे। इस छात्र आंदोलन में भी ऐसा ही है।

असली संकट राजनीति को महज संसदीय राजनीति तक सीमित कर देने में है। संसद के अंदर का संघर्ष जरूरी है, लेकिन सामाजिक बदलाव हमेशा आंदोलनों से ही आए हैं- चाहे वह आठ घंटे काम करने का अधिकार हो, मातृत्व अधिकार हों, महिलाओं के अधिकार हों या मानवाधिकार।

अगर लोग मेरी बातों की तारीफ करते हैं, तो मुझे यह बताना होगा कि मेरी सोच सिर्फ मेरी अपनी नहीं है। अगर आप ऐसे युवाओं से मिलते रहते हैं, जिनके विचार आपको प्रभावित करते हैं, तो उन सपनों की जड़ें समानता और न्याय पर आधारित कम्युनिस्ट विचारधारा में होती हैं।

लोग कभी-कभी मुझसे कहते हैं कि अगर मैं किसी दूसरी पार्टी में होती, तो शायद और बड़ी नेता बन जाती। लेकिन वे असल बात नहीं समझ रहे हैं। अन्य पार्टियों में भी काबिल वक्ता हैं, जिनका अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है। लेकिन वे पूरे आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ क्यों नहीं उभर पाए? क्योंकि उनमें समाज की नब्ज समझने के लिए जरूरी राजनीतिक समझदारी की कमी है।

आइसा को आज जो पहचान और सम्मान मिला है, वह कैंपस में सालों तक लगातार काम करने, गिरफ्तारियों, चार्जशीट और यहां तक कि जेल की सजा झेलने के बाद मिला है। आंदोलन खड़ा करना हमने कोई पिछले कुछ महीनों में तो सीखा नहीं है।

क्या इस आंदोलन को छात्रों के मुद्दों से आगे बढ़कर लोकतंत्र से जुड़े व्यापक सवालों तक फैलाना चाहिए?

ये अलग-अलग लड़ाइयां तो हैं नहीं। ये सभी एक ही बड़ी लड़ाई का हिस्सा हैं: भारत के लोकतंत्र, इसके संविधान की भावना और समान नागरिकता के विचार की रक्षा करना। एसआईआर, नागरिकता, परिसीमन और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े सवाल लोकतंत्र के भविष्य से गहराई से जुड़े हैं।

शिक्षा के लिए संघर्ष हमेशा सिर्फ शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहा। यह एक वैकल्पिक राजनीति का भी प्रतीक था- ऐसी राजनीति जो लोगों को बांटने और ध्रुवीकरण के बजाय नौकरियों, सार्वजनिक शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक अधिकारों के आधार पर एकजुट करने की कोशिश करती है।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने लोगों का यह  भरोसा बहाल किया कि अगर नागरिक एकजुट हो जाएं, तो एक शक्तिशाली और दमनकारी सत्ता को भी चुनौती दी जा सकती है ।

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