आकार पटेल: स्मार्ट सिटी मिशन के मलबे में दफ्न मोदी सरकार की नाकामी

मैं घर से निकलकर जब सड़क पर घूमते हुए इधर-उधर देखता हूं तो पाता हूं कि बीते 10 साल में कुछ भी तो नहीं बदला है, सिवाय इसके कि ट्रैफिक कुछ ज्यादा हो गया है।

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अभी दो-एक दिन पहले एक खबर की हेडलाइन थी, “करोड़ों खर्च, स्मार्ट सिटी मिशन सिर्फ बिल बढ़े, बुनियादी ढांचा एकदम सतही।” रिपोर्ट में वही बात कही गई है जो अपने आस-पास का जायज़ा लेने वालों को साफ़ दिखाई देती है: कि इस साल खत्म हुए 10 साल के कार्यक्रम का कोई असर कहीं नहीं हुआ। अब जब यह कार्यक्रम खत्म हो चुका है और दफ्न किया जा चुका है और इस पर आगे कोई वादा नहीं किया जाएगा, तो हम इसके मलबे को कुरेदने की कोशिश करते हैं।

स्मार्ट सिटी मिशन की स्थापना एक संकल्पना के साथ की गई थी, जिसमें कहा गया था कि इसका उद्देश्य ऐसे शहर बनाना है जो ‘हर निवासी को सभ्य जीवन का विकल्प’ मुहैया कराएं, जहां ‘किसी भी विकसित यूरोपीय शहर के बराबर उच्च गुणवत्ता वाला जीवन’ हो। स्मार्ट सिटीज़ पर शहरी मंत्रालय के संकल्पना पत्र में तो ऐसा ही कहा गया था। साथ ही बताया गया था कि ऐसा 2020 तक हो जाएगा।

अरुण जेटली ने 2014 में संसद को बताया था कि इन स्मार्ट शहरों की ज़रूरत मध्यम वर्ग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए थी, क्योंकि मोदी की आर्थिक नीतियों से सबसे ज्यादा फायदा मध्यम वर्ग को ही होगा। अगले साल, 2015 में, इस लक्ष्य को नर्म और मामूली बनाते हुए भाषा में थोड़ा बदलाव किया गया। इसमें बताया गया कि किसी यूरोपीय शहर की नकल करने के बजाय, भारत का स्मार्ट शहर नागरिकों को पर्याप्त पानी, सुनिश्चित बिजली, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन, गरीबों के लिए किफायती आवास, महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा प्रदान करेगा। वैसे ध्यान रहे कि इसमें ऐसा कुछ अलग नहीं था जिन पर सभी शहरों की नगरपालिकाएं ध्यान केंद्रित करती हैं।

समस्या केवल शहर का लोगो (प्रतीक चिह्न) और नामकरण की नहीं, बल्कि कड़े शासन की थी। शायद यही वजह है कि मोदी सरकार की इसमें रुचि लगभग तुरंत ही कम हो गई। 2021 में यह खबर आई थी कि ‘स्मार्ट सिटीज़ परियोजना शुरू नहीं हो पाई, और इस मिशन के लिए रखी गई आधी धनराशि खर्च ही नहीं हुई।’

रिपोर्ट में कहा गया कि इस परियोजना को 2020 तक अपनी सफलता की बुलंदियों पर पहुंच जाना चाहिए था, लेकिन हकीकत यह थी कि 2015-19 के बीच ‘स्वीकृत’ कुल 48,000 करोड़ रुपये में से 2019 तक, वास्तव में केवल आधा ही आवंटित किया गया था। इस आधे में से, केवल तीन-चौथाई ही वास्तव में जारी किया गया था, और जो जारी किया गया था, उसका भी केवल 36 प्रतिशत ही उपयोग किया गया था। 48,000 करोड़ रुपये ‘स्वीकृत’ होने के बावजूद, केवल 6,160 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए।

शहरी विकास पर संसद की स्थायी समिति ने कहा कि वह ‘मिशन के तहत ज़मीनी स्तर पर अब तक हुई वास्तविक प्रगति को लेकर हैरान है’ और उसने ‘एक एजेंसी द्वारा दूसरी एजेंसी के काम को बिगाड़ने के कई उदाहरण भी देखे हैं।’ 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 26 ने जारी धनराशि का 20 प्रतिशत से भी कम उपयोग किया था। यह ऐसी समस्या थी जो भारत में आम है, और जो इस मामले में भी सामने आई। स्थायी समिति ने कहा कि उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उपलब्ध तंत्रों के बावजूद, मिशन के तहत घटिया काम की शिकायतें समिति के सामने आ रही हैं। समिति ने सिफारिश की कि स्मार्ट सिटीज़ के तहत किए गए काम के दावों पर सवाल उठाने वाले स्थानीय सांसदों के सभी मामलों की शीघ्र जाँच की जाए और दोषियों पर कार्रवाई की जाए।

ऐसे मामलों में अभी भी रुचि रखने वाले संस्थानों की खबरों ने स्मार्ट सिटीज़ मिशन की कुछ बुनियादी खामियों की ओर इशारा किया। इसमें उच्च-स्तरीय बुनियादी ढांचे और तकनीक-आधारित निगरानी पर ज़ोर दिया गया, लेकिन पानी, स्कूल, सरकारी अस्पताल और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। क्षेत्र-आधारित विकास के कारण, इसका ज़्यादातर फोकस ऐसे शहरी केंद्रों के छोटे-छोटे हिस्सों पर खर्च करने पर केंद्रित था जो पहले से विकसित थे।

मिसाल के तौर पर, बेंगलुरु में स्मार्ट सिटी के लिए आवंटित धन का उपयोग चर्च स्ट्रीट के विकास पर किया गया – जो कि शहर के बाकी हिस्सों की तुलना में पहले से ही काफी विकसित है। इसी तरह इंफेंट्री रोड, कामराज रोड, टाटा लेन, वुड स्ट्रीट, कैसल स्ट्रीट, डिकेंसन रोड, केंसिंग्टन रोड, सेंट जॉन्स रोड, रेजीडेंसी रोड, कस्तूरबा रोड, बॉरिंग हॉस्पिटल रोड, मिलर्स रोड, लावेल रोड, मैकग्राथ रोड, कॉन्वेंट रोड, क्वींस रोड, हेस रोड, राजा राम मोहन रॉय रोड और रेसकोर्स रोड जैसे संभ्रांत इलाकों के विकास पर खर्च किया गया।

दिल्ली में, इसे नई दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आने वाले हिस्से में लागू किया गया, जो पहले से ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सबसे विकसित हिस्सा है। यह मिशन एक खास वर्ग यानी उच्च वर्ग, जो आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा था, को लक्षित था, न कि किसी नव-मध्यम वर्ग को, जिसे मोदी की आर्थिक नीतियों ने किसी भी सूरत में पैदा नहीं किया था।

अभिजात्यवाद यानी पैसे और रसूख वालों का ध्यान रखे जाने के मामले अन्य शहरों में भी दिखे। मसलन, पुणे, दिल्ली, भोपाल और कोयंबटूर सहित कई शहरों में सार्वजनिक साइकिल शेयरिंग परियोजना लाई गई। कंपनी की वेबसाइट पर साइकिल किराए पर लेने के निर्देश केवल अंग्रेजी में थे और यह केवल ऑनलाइन भुगतान स्वीकार करती थी। स्मार्ट सिटीज़ भारत के शहरी गरीबों को और हाशिये पर धकेल रही थीं। 2019 में ‘आवंटन’ 2018 के समान ही रहा। और, 2021 के बजट में, ‘स्मार्ट सिटीज़’ शब्द का प्रयोग तक नहीं किया गया।

शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र सिंह पंवार ने इसकी वजह बताते हुए कहा: “इन स्मार्ट शहरों को देश के दूसरे शहरों के लिए प्रकाश स्तंभ बनना था। लेकिन बजट में इस बाबत खामोशी है क्योंकि यह मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी में से एक बन गया है।”

यही कारण है कि आप शायद यह नहीं जानते थे कि कार्यक्रम का उद्देश्य क्या था (चमकदार नाम के अलावा), इससे वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ या यह कि कार्यक्रम समाप्त हो चुका है, जिसके बारे में फिर कभी बात नहीं की जाएगी।

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