नई दिल्ली: कमजोर रुपये को अक्सर इकोनॉमिक स्ट्रेस यानी आर्थिक तनाव का संकेत माना जाता है। हालांकि, भारत के निर्यातकों के लिए यह अप्रत्याशित फायदे के तौर पर उभर सकता है। सरकार की ताजा आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई है। लेकिन, वित्त मंत्रालय ने आगाह किया है कि यह फायदा तभी मिलेगा जब ग्लोबल डिमांड मजबूत बनी रहे। साथ ही महंगाई को कंट्रोल में रखा जाए।
रुपये को लेकर दूसरा नजरिया
मई महीने की अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में आर्थिक मामलों के विभाग ने तर्क दिया कि रुपये की हालिया गिरावट को केवल करेंसी की कमजोरी के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय, उसने कहा कि कई सालों तक विनिमय दर के ज्यादा होने के बाद इस बदलाव ने भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा को बेहतर बनाया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘करेंसी की गिरावट को अंदरूनी कमजोरी के संकेत के तौर पर देखने की सोच समझ में आती है। लेकिन, इसकी बारीकी से जांच होनी चाहिए।’
इसलिए दबाव में है रुपया
पिछले कुछ महीनों में भारतीय रुपया दबाव में आ गया है। इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का लगातार बाहर जाना और पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव शामिल है।
समीक्षा के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारत की मुद्रा में लगभग 10% की गिरावट आई। पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद यह 4.9% और कमजोर हो गई। 26 मई तक यह 95.7 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गई।
सरकार का यह है तर्क
फिर भी सरकार का तर्क है कि ज्यादा महत्वपूर्ण पैमाना नॉमिनल एक्सचेंज रेट नहीं, बल्कि रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) है। यह व्यापारिक साझेदारों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा का ट्रेड-वेटेड और इनफ्लेशन-एडजस्टेड पैमाना है।
अप्रैल 2026 में भारत का REER 92.72 था। यह एक दशक से भी ज्यादा समय में सबसे निचला स्तर था। 100 के मानक स्तर से यह काफी नीचे था। रिपोर्ट में बताया गया कि REER नवंबर 2024 में कई सालों के सबसे ऊंचे स्तर 108.03 पर पहुंच गया था। इससे हालिया सुधार से पहले वैश्विक बाजारों में भारतीय सामान कम प्रतिस्पर्धी हो गए थे।
समीक्षा में कहा गया है, ‘अब जब भारत का REER अपने लंबे समय के औसत से नीचे है तो भारतीय सामान और सेवाओं की कीमतें वास्तविक रूप से पिछले एक दशक में किसी भी समय की तुलना में ज्यादा प्रतिस्पर्धी हैं।’
सरकार इसे निर्यात के लिए एक संभावित बढ़ावा मानती है। खासकर ऐसे समय में जब भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
कमजोर करेंसी को लेकर चेतावनी भी
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपये में 1% की गिरावट से मध्यम अवधि में भारत के माल व्यापार (मर्चेंडाइज ट्रेड) संतुलन में 1.45% का सुधार हो सकता है।
हालांकि, समीक्षा में इस धारणा के प्रति भी आगाह किया गया है कि कमजोर करेंसी का मतलब अपने आप ही ज्यादा निर्यात होना है।
इसमें कहा गया है, ‘दूसरी शर्त ग्लोबल मांग है और शायद यह एक ज्यादा बड़ी बाधा है।’
- रिपोर्ट ने वित्त वर्ष 2013-14 के अनुभव की ओर इशारा किया।
- तब रुपये में तेजी से गिरावट आई थी।
- लेकिन, उसके बाद के सालों में निर्यात में कमी आई।
- कारण है कि कमजोर ग्लोबल डिमांड ने सस्ती करेंसी से होने वाले लाभ को बेअसर कर दिया था।
- गिरती कमोडिटी कीमतों ने भी इस पर पानी फेरा था।
इसमें आगे कहा गया है, ‘व्यापार अध्ययन लगातार यह पाते हैं कि निर्यात को बढ़ावा देने वाले फैक्टरों में एक्सचेंज रेट की तुलना में ग्लोबल डिमांड का पलड़ा भारी होता है।’
एक और चुनौती कच्चे तेल, उर्वरकों और पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर भारत की निर्भरता है। जहां निर्यातकों को आखिरकार कमजोर रुपये से लाभ हो सकता है। वहीं, आयात की लागत तुरंत बढ़ जाती है। इससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ता है।
महंगाई बढ़ी तो फायदा हो जाएगा कम
रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि अगर महंगाई बढ़ती है तो कच्चे तेल, LNG और खाद्य तेलों जैसी कमोडिटीज की ऊंची कीमतें प्रतिस्पर्धात्मकता से होने वाले फायदे के एक हिस्से को कम कर सकती हैं।
इसके बावजूद सरकार ने जोर देकर कहा कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है। 8 मई तक विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 697 अरब डॉलर था। यह लगभग 11 महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है। वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह रिकॉर्ड 94.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इसके अलावा, भारत का समायोजन व्यापक आर्थिक मजबूती की स्थिति से हो रहा है।’
मूल रूप से रुपये में गिरावट ने निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के उस स्तर को बहाल कर दिया है जो करेंसी के मजबूत होने के वर्षों के दौरान खो गया था। क्या यह मजबूत एक्सपोर्ट ग्रोथ में तब्दील होगा, यह विनिमय दर पर कम और ग्लोबल डिमांड, कमोडिटी कीमतों और घरेलू महंगाई की दिशा पर ज्यादा निर्भर करेगा।










