मानव गंध ने छीना मां का आंचल, नन्हा हाथी झुंड से ठुकराया गया

अनुगुल। ओडिशा के अनुगुल जिले से एक भावनात्मक और सोचने पर मजबूर करने वाली घटना सामने आई है। यहां एक नन्हा हाथी का बच्चा, जिसे वन विभाग ने कीचड़ से निकालकर बचाया था, अपने झुंड में वापस नहीं लौट सका। हाथियों के झुंड ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया। वजह — उसके शरीर पर इंसानी गंध का आ जाना।

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खेत में फंसा था नन्हा हाथी

जानकारी के अनुसार, 8 नवंबर को 22 हाथियों का एक झुंड अनुगुल के श्यामसुंदरपुर गांव के पास से गुजर रहा था इसी बीच गांव के पास लगभग 15 दिन का हाथी का बच्चा धान के खेत में बने एक गड्ढे में फंस गया और हाथियों का झुंड आगे बढ़ गया और बच्चा वहीं संघर्ष करता रह गया।

सुबह जब ग्रामीणों ने बच्चे को कीचड़ में फंसा देखा और तुरंत वन विभाग को सूचना दी। वन कर्मी मौके पर पहुंचे और कई घंटे की मशक्कत के बाद बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाला। उसे प्राथमिक उपचार के लिए पुरनागढ़ के कुलसिंघा नर्सरी लाया गया, वन अधिकारियों ने बताया कि पूरी रात ठंड में रहने के कारण बछड़ा कमज़ोर हो गया था, और पशु चिकित्सा कर्मचारियों द्वारा उसे ठीक होने के लिए ग्लूकोज, आईवी फ्लूइड और अन्य दवाइयां दी गई।

वापस झुंड में मिलाने की कोशिश

वन विभाग की टीम ने बच्चे को उसकी मां और झुंड से मिलाने का काफी प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने बच्चे के शरीर पर हाथी के गोबर और मिट्टी का लेप लगाया ताकि मानव गंध खत्म हो जाए और झुंड उसे अपना ले।

लेकिन सभी कोशिशें नाकाम रहीं। झुंड ने बच्चे को अपनाने से इनकार कर दिया और उसे अपने करीब नहीं आने दिया।

मानव संपर्क बना दूरी की वजह

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बच्चे के शरीर में इंसानों के छूने और इलाज करने की गंध आ गई थी। हाथियों में सूंघने की क्षमता बहुत तेज होती है, इसलिए झुंड ने उसे बाहरी मानकर ठुकरा दिया।

अधिकारियों ने बताया कि हम बच्चे को अपनी मां से मिलाने का पुनः प्रयास करेंगे तथा अब बच्चे की देखभाल वन विभाग अपने संरक्षण में करेगा और जरूरत पड़ने पर उसे हाथी पुनर्वास केंद्र भेजा जाएगा।

वन विभाग की पहल, पर सबक भी

वन अधिकारी ने कहा कि उनकी प्राथमिकता बच्चे की सुरक्षा और स्वास्थ्य है। उसकी देखरेख पशु चिकित्सकों की निगरानी में की जा रही है।

इस घटना ने यह भी उजागर किया है कि मानव हस्तक्षेप कभी-कभी वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर देता है।

यह घटना सिर्फ एक बचाव-कहानी नहीं, बल्कि चेतावनी है कि प्रकृति के जीवों को बचाते समय भी हमें उनके प्राकृतिक स्वभाव और जीवन-परिस्थितियों का ध्यान रखना होगा। अनुगुल की इस घटना ने यह साबित किया है कि संवेदनशीलता और सावधानी, दोनों साथ चलनी चाहिए।

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