आधी रात हो चुकी थी। अचानक बाहर कहीं से पटाख़ों के तेज़ धमाकों की गूंज सुनाई दी। एक के बाद एक, लगातार। नए साल के आगाज़ की ज़ोरदार मुनादी। शहर भर में जगह-जगह चल रहे जश्न में बुझा दी गई बत्तियां शायद अब जल उठी होंगी। शहर जाग रहा था, या कहें कि पूरा मुल्क ही। यों दुनिया भी कहां सो रही होगी! हमारा जागना, ये जश्न, मौज-मस्ती की ये महफ़िलें, मगर ‘बहुत पहले अपने मुकद्दर से किया वायदा’ पूरा करने का जोश थोड़े ही है। यह तो कैलेंडर बदलने का जश्न है।
तोपों की सलामी जैसे धमाकों, शोर-संगीत के बीच उलझा उल्लास, कुछ पहचाने और कुछ अनजाने चेहरों की मुबारकबाद वाले विज्ञापनों से भरे हुए अख़बार, इनबॉक्स संदेशों की भरमार, शुभकामनाओं के बेशुमार नोटिफ़िकेशन, सोशल मीडिया में छा जाने की होड़, यह सब जज़्बात से कहीं ज़्यादा एक ख़ास तरह की मशीनी पाबंदी जैसे मालूम होने लगते हैं। सोचता हूं कि कैलेंडर बदलने से सचमुच क्या तारीख़ भी बदलती है! दिलो-दिमाग़ और हमारे ग़ौर-ओ-फ़िक्र के दायरे पर भी इसकी कोई छाप पड़ती है क्या! इस सोच को उम्र का तक़ाज़ा मान सकते हैं, अख़बारनवीस का दिमाग़ी फ़ितूर या कि अभी हाल के कुछ वाक़ये, जिनसे हमारा शहर गुज़रा है और जिनकी नौइयत शहर के मिज़ाज, समाजी जज़्बात और ज़िंदगी में ख़लल डालने वाली लगती है।
ख़बरों के मामले में इंटरनेट की दुनिया ‘जंगल की आग की तरह’ वाले मुहावरे का पर्यायवाची है। सो 24 दिसंबर की शाम की यह ख़बर तेज़ी से आम हुई कि बरेली के सेंट अल्फोंसस कैथेड्रल के बाहर बजरंग दल के सदस्यों ने धरना दिया और हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। बजरंग दल के लोगों की दलील थी कि क्रिसमस के जलसे में स्कूली बच्चों के ज़रिये ऐसी नाटिका का मंचन हुआ, जिसमें कथित तौर पर हिन्दू धर्म औऱ समाज को ग़लत रौशनी में पेश किया गया था। इसकी वजह से बच्चों और उनके मां-बाप को ठेस पहुंची। क़रीब आधा घंटे तक धरने और नारेबाज़ी के बाद पुलिस को शिकायत देकर वे लोग लौट गए।
यह कैथेड्रल सिविल लाइंस से सटे कैन्टोमेंट के इलाक़े में बिशप कोनरॉड स्कूल कैंपस के भीतर बना हुआ है। क्रिसमस के मौक़े पर तीन दिन का मेला यहां की पुरानी रवायत है। चर्च के साथ ही पूरा कैंपस रंगीन रौशनी में नहा उठता है, खाने-पीने के स्टॉल बाहर दूर तक लग जाते हैं, सांस्कृतिक आयोजन होते हैं और इतनी भीड़ जुटती है कि पैदल चलना भी आसान नहीं होता, गाड़ियों की गुंजाइश तो ख़ैर होती ही नहीं। स्कूली बच्चों और उनके घर वालों के साथ ही यह शहरियों का मेला भी होता है, ख़ासकर नौजवानों का। मेला यानी कि मिलना-जुलना, खाना-पीना, मौज-मस्ती। याद नहीं पड़ता कि इस बार की तरह के ऐतराज की नौबत पहले कभी आई हो।













